Friday, 7 August 2020

 

 रंगशाला—कहानी-देवेन्द्र कुमार

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दादी परेशान हैं। उन्हें नींद नहीं आती। रात में खाँसी परेशान करती है और दिन में फुटबाल नहीं सोने देती। दोपहर में जब वह सोना चाहती हैं तो बच्चे फुटबॉल खेलने लगते हैं। उनका खेल भी अजीब है। वे मैदान में नहीं दीवार पर खेलते हैं। बारी-बारी से फुटबॉल को दीवार पर फेंकते हैं। फुटबॉल दीवार से टकराती है, घुम्म खट् की आवाज होती है। यह आवाज होती रहती है लगातार। दादी को लगता है जैसे फुटबॉल दीवार से नहीं, उनकी आँखों से टकराती है और उनकी नींद भाग जाती है।

दादी का फ्लैट मैदान से सटकर बना हुआ है। जब पहले-पहल दादी फ्लैट में रहने आई थीं तो उन्हें अच्छा लगा था। सर्दियों में जब मैदान में धूप आती तो दादी नीचे उतर आतीं। गर्मियों में हर तरफ से हवा आती थी। दादी सबके सामने अपने फ्लैट की तारीफ करती थीं लेकिन अब नहीं। उन्होंने बच्चों से कई बार कहा कि कहीं और जाकर खेलें, लेकिन कुछ असर नहीं हुआ। थोड़ी देर जरूर खेल बंद रहा, लेकिन फिर उसी तरह चलने लगा।  

एक दिन उन्होंने देखा था-- पूरी दीवार पर फुटबॉल टकराने से गोल-गोल निशान बन गए थे। पूरी दीवार पर कुछ दिन पहले ही रंग करवाया था, सब बदरंग हो गया था। मिट्टी के गोल-गोल धब्बों के कारण दीवार देखने में बहुत खराब लगती थी।

लेकिन उपाय क्या था। एक दिन पूरी दोपहरी उन्होंने नीचे धूप में बिताई। हाथ में छड़ी लेकर बेंच पर बैठी रहीं। जैसे कह रही हों, देखूँ तो कौन खेलता है यहाँ। उस दिन बच्चे वहाँ नहीं आए। कहाँ गए किसे मालूम, लेकिन धूप में बैठे-बैठे दादी के सिर में दर्द हो गया। सिर को हाथों में दबाती हुई फ्लैट में चली गईं|

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   उनके अंदर जाते ही बच्चे जैसे किसी जादू के जोर से वहाँ प्रकट हो गए। फुटबॉल दीवार पर टकराने का खेल शुरू हो गया।

दादी ने बाबा से शिकायत की तो वह हँसने लगे। बोले, “कानों में रुई लगा लिया करो, फिर कोई परेशानी नहीं होगी। बच्चे कहाँ मानने वाले हैं।”

‘लेकिन दीवार का क्या करें। देखा है, कैसे गोल-गोल निशान छप गए हैं पूरी दीवार पर। सारा रंग खराब हो गया है।‘ दादी ने गुस्से से कहा।

गंदी दीवार बाबा ने भी देखी थी। देखने पर बहुत बुरी लगती थी। बाबा भी सोचते रहे, लेकिन कोई उपाय उनकी समझ में नहीं आया। दिन में वह स्वयं मैदान में बैठे देखते रहे। सचमुच जब फुटबॉल दीवार से टकराती थी तो बहुत आवाज होती थी। बाबा तो दिन में घर में रहते नहीं थे। लेकिन उस दिन लगा पत्नी की शिकायत एकदम सही है। शैतान बच्चों का इलाज करना होगा, लेकिन वह इलाज क्या हो?

उन्होंने घर में आकर दादी से कहा, “मैंने इस समस्या का इलाज सोचा है। तुम दूसरे कमरे में लेटा करो। वहाँ फुटबॉल टकराने की आवाज कम आएगी और जल्दी ही मैं दीवार पर  काला रंग करवा दूँगा। काली दीवार पर कोई भी निशान नहीं दिखाई देगा।”

लेकिन दादी किसी भी बात को मानने को तैयार नहीं थीं। उन्होंने कहा, “तुम्हारे कहने का मतलब है मैं बच्चों से हार मान जाऊँ। और हम अपनी दीवार को काली क्यों करवाएँ? नहीं, मैं ऐसा कभी नहीं होने दूँगी।”

“तब फिर फुटबॉल का खेल चलता रहेगा। बच्चों के साथ मारपीट करना तो ठीक नहीं.। मेरी तो अक्ल काम नहीं करती।” बाबा ने हथियार डालने के अंदाज में कह दिया। यानी बाबा ने साफ कह दिया कि फुटबॉल के विरुद्ध अपनी लड़ाई दादी को  खुद ही लड़नी होगी।

दादी ने सोचा- अगर एक दो बच्चों की पिटाई कर दें, तो बाकी बच्चे डरकर भाग जाएँगे, लेकिन बच्चों को मारने-पीटने की कल्पना से ही उनके मन में जैसे कुछ होने लगा। वह सोते हुए अतुल के बाल सहलाने लगीं। अतुल उनके बेटे प्रियदर्शन का बेटा यानी उनका पोता है। वह सोच रही थीं, भला बच्चों को कैसे पीटते हैं लोग? कैसे फूल से कोमल होते हैं बच्चे।

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उस रात दादी को खाँसी ने परेशान नहीं किया। लेकिन वह सोई नहीं, सोचती रहीं। सुबह उठते ही उन्होंने बाबा से कहा, “तुम दीवार को रंगवाने की बात कह रहे थे न!”

“हाँ काला रंग मँगवा लेता हूँ। यह ठीक रहेगा।” बाबा ने कहा।

“नहीं, काला नहीं, मुझे सफेद रंग करवाना है- ऐसा सफेद रंग जो दूर से ही   चमकता दिखाई दे।”

“सफेद रंग! लेकिन वह तो और भी जल्दी खराब हो जायेगा बच्चों की शरारत से ।” दादी की बात बाबा की समझ में नहीं आ रही थी।लेकिन     उन्हें दादी की बात माननी पड़ी| दो मजदूर बुलाए गए। पहले फुटबॉल के गोल निशान मिटाए गए, फिर दीवार पर चमकदार सफेद रंग पोत दिया गया। काम पूरा होने के बाद बाबा ने दादी को बाहर बुलाया और कहा, “अपनी सफेद दीवार को जी भरकर देख लो। कल दोपहर बाद यह ऐसी न रहेगी।”

सूरज पश्चिम में ढल रहा था। दादी सफेद चमकदार दीवार के सामने खड़ी थीं। उन्होंने कहा, “आज कोई बच्चा नहीं आया फुटबॉल लेकर।” फिर हँसने लगी। बाबा हैरान थे कि आज गुस्से की जगह हँसी कैसे आ रही है, तभी दादी ने कहा, “अभी दीवार रंगने का काम पूरा नहीं हुआ है।” और अंदर चली गईं। कुछ देर बाद बाहर आईं तो उनके हाथ में एक थाली थी। थाली दीवार के सामने रखकर कुछ करने लगीं।

बाब ने देखा और देखते रह गए। दादी ने सफेद दीवार पर लाल रंग से फुटबॉल के कई चित्र बना दिए थे। लग रहा था जैसे किसी ने दीवार पर लाल नई फुटबॉलें लटका दी हैं।

“यह क्या है?” बाबा ने पूछा।

“यह है मेरी रंगशाला, फुटबॉल का मैदान।” कहकर दादी हँसने लगीं। अगली दोपहर रोज की तरह बच्चे फुटबॉल लेकर खेलने पहुँचे तो हैरान रह गए। सफेद दीवार पर कई चमचमाती फुटबॉलें नजर आ रही थीं। दादी एक तरफ खड़ी हँस रही थीं। बच्चे फुटबॉल हाथ में लिए कुछ देर सहमे से खड़े रहे। दादी ने पुकारा, “फुटबॉल नहीं खेलोगे?”

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कोई जवाब नहीं आया। दादी ने बढ़कर एक बच्चे के हाथ से फुटबॉल छीन ली और उसे दीवार पर मारने लगीं। सफेद दीवार पर निशान उभरने लगे।

“दादी, दादी, प्लीज ऐसा मत कीजिए।” बच्चे एक साथ कह  उठे थे।

“तो फिर फुटबॉल कहाँ खेलोगे?”

“कहीं  भी खेलेंगे, लेकिन दीवार पर फ़ुटबाल मारकर नहीं खेलेंगे।” बच्चों का मिला-जुला स्वर उभरा। दादी दीवार के सामने खड़ी हो गईं।

“बच्चो, यह तुम्हारी रंगशाला है। मुझे तो चित्र बनाने आते नहीं, मैंने तो बस यूँ ही फुटबॉल के चित्र बना दिए हैं। तुम सब तो स्कूल में ड्राइंग करते हो। यहाँ भी कुछ बनाओ न!”

थोड़ी देर बाद बच्चे एक कतार में हाथों में रंग लिए दीवार के सामने खड़े थे। उनके हाथ चल रहे थे। बच्चे अँधेरा होने तक सफेद दीवर पर चित्रकारी करते रहे।

सुबह अद्भभुत दृश्य था। सफेद दीवार पर छोटे-बड़े चित्र बने दिखाई दे रहे थे। उस दोपहर को दादी ने देखा-बच्चों की टोली फिर चित्र बनाने में जुटी थी।

दादी बालकानी में खड़ी देख रही थीं। उन्होंने कहा, “आज फुटबॉल की याद नहीं आई?” और एक नई फुटबॉल बच्चों की तरफ उछाल दी। बच्चे फुटबॉल खेलने लगे, लेकिन आज फुटबॉल मैदान में जमीन के ऊपर पैरों से खेली जा रही थी। धूप में सफेद दीवार पर बने चित्र अनेक रंगों की छटा बिखेर रहे थे।(समाप्त)

 

Saturday, 6 June 2020

मत खाओ कहीं और जाओ-कहानी-देवेन्द्र कुमार


 मत खाओ—कहीं और जाओ-कहानी-देवेन्द्र कुमार
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     क्या ऐसा हो सकता है कि स्कूल और कूड़ा घर पास पास न हों। अगर हों तो कूड़ा घर में कूड़े के  ढेर न लगे हों जिनमें गायों के झुण्ड खाने की तलाश में मुंह मारते दिखाई दें। लेकिन जीवन के स्कूल की यही हालत है। स्कूल से निकलते समय कूडे से सामना होता है। स्कूल सड़क से परे मैदान में बना हुआ है लेकिन स्कूल को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली पगडण्डी कूड़ा घर से एकदम सट कर निकलती है। सुबह के समय तो कूड़ा घर लगभग खाली होता है लेकिन जब बच्चे दोपहर में छुट्टी के बाद निकलते हैं तो कूड़ा घर में कूड़े का अम्बार लगा होता है, गायों का झुण्ड खाने की खोज में कूड़े के ढेर में मुंह मारता दिखाई देता है और कुछ लड़के कूड़े में से काम लायक चीजें छांट रहे होते हैं। कूड़ा सड़क पर भी फैला होता है।    
     जीवन अपने पापा से कहता है कि उसे किसी दूसरे स्कूल में शिफ्ट करा दिया जाए। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। जीवन और उसके साथी दोपहर में स्कूल से निकलते समय कूड़े से उठने वाली दुर्गन्ध और वहां भोजन की तलाश में मुंह मारती गायों के झुण्ड के बारे में हर दिन बात करते हैं।आखिर इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है।
     एक दिन उन्हें कूड़ा घर के पास एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया— कूड़ा घर के पास खड़ा एक बूढा आदमी अपनी लाठी से  ठक ठक करते हुए जोर जोर से कह रहा था—गायों, कूड़ा मत खाओ,कहीं और चली जाओ।‘ उसके पास खड़ा एक बच्चा भी रह रह कर वही दोहरा रहा था। जीवन और उसके साथी तथा सड़क पर आते जाते कई लोग रुक कर देखने लगे, लोग बूढ़े की पुकार सुन कर हंस रहे थे। कुछ लोग बूढ़े को जानते थे। उसे आँखों से बहुत कम दिखाई देता था। वह पास ही रहता था। एक आदमी ने बूढ़े के पास जाकर कहा—‘ बाबा,क्या गायों का झुण्ड तुम्हारी बात समझ रहा है जो कूडे में मुंह मारना छोड़ कर कहीं और चला जाएगा! यह तुम्हें क्या सूझा!’
     बूढ़े ने कहा—‘ मैं रोज ही कूड़े में खाना तलाशती गायों के बारे में सुनता हूँ। मैं तो घर में ही रहता हूँ, मैंने सोचा इस बारे में कुछ करना चाहिए।इसलिए अपने पोते के साथ यहाँ चला आया।’
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      जीवन ने अपने साथियों से कहा—‘ असल में बूढ़े बाबा गायों से नहीं हम लोगों से कह रहे हैं कि गायों को कूडे से दूर रखने के लिए कुछ करो।’ उसके दोस्तों ने कहा—‘हां इस बारे में हमें जरूर कुछ तो करना चाहिए।‘ अगले दिन जीवन ने अपनी कक्षा में इसकी चर्चा की। सभी बच्चे एक स्वर में बोले—‘हम गायों को कूडा नहीं खाने देंगे।’             
       अगले दिन बच्चे स्कूल से निकले तो वही रोज वाला दृश्य सामने था। बूढ़े बाबा कूड़े में खाना खोजती गायों से कहीं और जाने को कह रहे थे। जीवन और उसके साथी कुछ सोच कर आये थे।हर बच्चे ने अपने लंच बॉक्स से  खाना निकाल कर कूड़ा घर से कुछ दूर फुटपाथ पर रख दिया फिर कुछ बच्चे हाथ में रोटी लेकर गायों को दिखाते हुए झुण्ड को खाने तक ले आये। गायों का झुण्ड फुटपाथ पर रखे भोजन को खाने में जुट गया। यह देख कर बच्चे मुस्कराने लगे। उनकी योजना सफल हो गई थी। जीवन की पूरी क्लास ने उस रोज आधा भोजन खाया था। अगले दिन दूसरी क्लास के बच्चों ने पिछले दिन वाला प्रयोग दोहराया। फिर तो यह प्रयोग रोज होने लगा। बच्चे देखते थे, गायों का झुण्ड कूड़ा घर से दूर वहां प्रतीक्षा करता था जहाँ उन्हें अब रोज भोजन मिलने लगा था।
       क्या समस्या हल हो गई थी? नहीं, कुछ दिन बाद गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली थीं। क्या तब गायों का झुण्ड फिर से कूड़े में भोजन खोजने लगेगा ? बच्चों ने स्कूल के प्रिंसिपल से कहा तो उन्होंने नगर निगम को पत्र लिखा कि कूड़ा घर को वहां से हटा दिया जाए। फिर स्कूल के छात्र प्रिंसिपल के साथ निगम के बड़े अधिकारी से मिलने गए। एक साथ इतने छात्रों को देख कर अधिकारी चौंक गए। उन्होंने स्कूल के पास बने कूड़ा घर को हटवाने का आश्वासन दिया। और सच में बच्चों की छुट्टियों से पहले कूड़ा घर को बंद कर दिया गया। सफाई करवाने के बाद कूड़ा घर के बाहर दीवार बना दी गई।वहां एक बोर्ड लगा दिया गया, उस पर लिखा था—यहाँ कूड़ा डालना मना है। फिर एक दिन कुछ लोग बंद कूड़ा घर के बाहर फूलदार पौधों के गमले रख गए।
       बच्चे छुट्टियों से लौटे तो उन्होंने आपस में कहा—‘ इन पौधों का ध्यान हम मिल कर रखेंगे। दोपहर में स्कूल से बाहर आकर बच्चे पौधों में पानी डालते थे। सामने की हाउसिंग सोसाइटी के माली ने बिना कहे पौधों की जिम्मेदारी संभाल ली। कूड़ाघर के ऊपर तक फूलदार बेलें फ़ैल गईं।छोटे बड़े अनेक हरे भरे गमले देख कर यह कल्पना करना कठिन था कि कुछ समय पहले यहां गन्दा कूड़ा घर हुआ करता था।(समाप्त) 
 


Wednesday, 3 June 2020

बस स्टैंड-कहानी-देवेन्द्र कुमार

बस स्टैंड -कहानी-देवेन्द्र कुमार
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  मैं स्टैंड पर बस की प्रतीक्षा का रहा था।  तभी मैंने एक आवाज़ सुनी और उस तरफ देखा-एक युवती एक बच्चे से कह रही थी-‘चुप शैतान,नहीं तो वह दादा जी तुझे काली कोठरी में बंद कर देंगे। ’ वह मेरी तरफ इशारा कर रही थी। उसकी बात मुझे बुरी लगी।  मैं बच्चे के पास जाकर बोला-‘ बेटा,  तुम्हारी मम्मी गलत कह रही हैं।  मैं तो बच्चों से प्यार करता हूँ, उन्हें चाकलेट देता हूँ। ’ फिर मैंने उसकी माँ से पूछा- ‘क्या तुम मुझे जानती हो?’
  ‘जी नहीं। ’-उस ने कहा।
  ‘ तब तुम मुझे बच्चे की नजर में गिरा क्यों रही हो। मैं तो बच्चों को हँसाता हूँ-गुदगुदाता हूँ।  उन्हें हंसी की गोली खिलाता हूँ। ’      
   सुन  कर माँ-बेटा जोर से हंस पड़े, पूरा बस स्टैंड खिलखिलाने लगा।  बच्चे ने कहा-‘ दादाजी  हंसी की गोली मेरी मम्मी को भी खिला दीजिये,यह मुझे सदा डांटती रहती हैं। ’
  ‘ बेटा, मैंने तुम्हारी मम्मी के साथ साथ यहाँ खड़े सभी लोगों को हंसी की गोली खिला दी है।  तभी तो सब हंस रहे हैं। ’ मैंने बच्चे से कहा तो वहां खड़े फिर से हंसने लगे।  तभी बस आ गई, लोगों के साथ माँ-- बेटा भी चले गए।              
    तभी आवाज आई-‘ भगवान के नाम पे कुछ मिल जाये....’-यह चरण की गिडगिड़ाती आवाज थी।  वह बस स्टैंड के पास बैठ कर भीख माँगा करता है।  कई बार पुलिस उसे वहां से भगा चुकी है पर कुछ दिन  बाद वह दोबारा लौट आता है।  पूछने पर कहता है-‘और क्या करूं,कोई काम देता ही नहीं।‘ यानि उसने मान लिया है कि वह भीख के लिए हाथ फ़ैलाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता।                                     
  बस की प्रतीक्षा कर रहा एक लड़का चरण को डांटने के बाद मुझसे बोला-‘ अंकल, क्या आपके पास ऐसी भी कोई गोली है जो इसका इलाज कर दे, यह सबको भीख मांग कर परेशान  करता है। मैं रोज  यहाँ से कालिज के लिए बस लेता हूं, आते ही इसकी पुकार सुनाई देती है। दिन  की ऐसी शुरुआत मुझे अच्छी नहीं लगती। ’
  यह एक कड़वी सच्चाई थी, भीख मांग कर लोगों को परेशान  करने की आदत के कारण चरण  जैसे एक लाइलाज रोग बन  गया था।  हर कोई उससे छुटकारा पाना चाहता था। तो क्या मैं कुछ कर सकता था। मैंने कुछ सोचा और चरण  के सामने जा खड़ा हुआ। इससे पहले कि वह मेरे सामने हाथ फैलाता,मैंने कहा-‘ जानते हो आज तुम्हारा जन्मदिन  है और जिसका जन्मदिन  होता है वह किसी से मांगता नहीं,  मेहमानों को उपहार देता है। ’
  ‘मेरा जन्म दिन.... मैं.... ’चरण  हडबडा गया। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था।
  'हाँ, आज तुम्हारा जन्म दिन  है। ’ फिर मैंने बस स्टैंड में खड़े लोगों से कहा’-‘आज चरण का  जन्म  दिन  है| और इसने कसम खाई है कि अब से यह किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगा,मतलब यह कि हमारे चरण ने अपने  जन्म दिन  के शुभ अवसर पर कुछ नया काम करने का निश्चय कर लिया है। ’चरण मुंह बाए देखता खड़ा था। उसने धीरे से कहा-‘तो मैं क्या करूंगा अब?’
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  यह तो चरण  ने सही कहा था।  मैंने उसे भीख न  मांगने की कसम तो दिला दी थी,लेकिन  इसके बाद वह क्या करेगा,कहाँ जाएगा, इसका इंतजाम कौन  करेगा। क्या मैं इस बारे में कुछ कर सकता था?जब मैं यह सोच रहा था तब चरण वीर सिंह के पास बैठा कुछ खा रहा था।  वीर सिंह बस स्टैंड के पास चने-चबैने का टोकरा लेकर बैठता है। वह चरण को कई बार समझा चुका है कि वह भीख माँगना छोड़ दे।  और चरण की इसी गंदी आदत के कारण उससे नफरत करता है। लेकिन  आज एकाएक सब कुछ बदल गया है।  वीर सिंह ने उसे कुछ खाने को दिया है और दोनों घुल मिल कर बातें कर रहे हैं।
  तभी मैंने प्रीतम को वहां से जाते हुए देखा और उसे पुकार लिया।  प्रीतम मेरे घर में अखबार डालता है।  मैंने उसे चरण के बारे में बताया।  कुछ देर तक चुप रहने के बाद उसने कहा-‘चरण के बारे में आप से मैं सहमत हूँ पर...’  
   मैंने प्रीतम से कहा था कि क्या वह चरण को बेचने के लिए रोज अखबार दे सकता है?मैं समझ गया  कि वह कुछ डर रहा है। मैंने उसे भरोसा देते हुए कहा-‘प्रीतम,मैं तुम्हारी आशंका समझ रहा हूँ पर तुम्हारे किसी भी नुक्सान  की जिम्मेदारी मेरी होगी। चरण के लिए  जो प्रयोग मैं करना चाहता हूँ उसमें तुम मेरी बहुत मदद कर सकते हो। ’
  आखिर प्रीतम ने मुझे सहयोग देने का वादा किया और कुछ देर में आने की बात कह कर चला गया। वह कुछ देर बाद लौटा तो उस दिन  के अखबार लेकर। प्रीतम ने एक प्लास्टिक शीट बिछा  कर उस  पर हिंदी और अंग्रेजी के अखबार करीने से रख दिए। तब तक मैं चरण को बता  चुका था कि उसे क्या करना है, बाकी उसे प्रीतम ने समझा दिया।  चरण अखबारों के सामने बैठा रहा,पर किसी ने भी अखबार नहीं खरीदा।
  मैंने कहा-‘चरण, आज पहला दिन  है,लोग तुमसे अखबार खरीदेंगे लेकिन  उससे पहले तुम्हें अपना हुलिया ठीक करना होगा। ’और मैं घर से एक जोड़ी कुरता पजामा ले आया। मैंने उसे कुछ पैसे दिए कि जाकर बाल कटवाने के साथ दाढ़ी भी साफ़ करा ले। फिर नहा कर कपडे बदल ले।  कुछ देर बाद चरण आया तो पहचाना ही नहीं जा रहा था। मैंने पूछा-‘आज तो तुमने कुछ खाया नहीं होगा। ’ और उसे सड़क पार मदन  के ढाबे पर ले गया। एकाएक मदन  उसे पहचान  ही नहीं पाया।  फिर मैंने उसे पूरी बात बताई तो मदन  हंस कर बोला-‘यह तो कोई दूसरा ही चरण बन  गया है। रोज इसे देखते ही डांट कर भगा देता हूँ। पर आज तो इसकी दावत करने का दिन  है। ’        
  चरण कुर्सी पर बैठते हुए सकुचा रहा था लेकिन  मदन  ने कहा-‘ आज तुम्हारा नया जन्म हुआ है। तुम मेरे मेहमान  हो। ’ मैंने चाय पी और मदन  ने चरण को भर पेट खिलाया।  चरण फिर से अखबारों के सामने बैठ गया। मैं संतुष्ट भाव से घर चला आया।  शाम को दरवाजे की घंटी बजी,बाहर चरण खड़ा था।  उसने मुझे कई नोट थमा दिए।  
  बोला-‘ ये पैसे आपके हैं।  प्रीतम ने दिए हैं,कह रहा था कि अखबार बेचने का कमीशन है। ’
  ‘पर यह तो तुम्हारी मेहनत की कमाई  है।  तुम्हें खुश होना चाहिए कि ये भीख के पैसे नहीं हैं।  किसी ने तुम पर दया नहीं की है।  और यह कमीशन तुम रोज कमा सकते हो। ’
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  ‘क्या सच!’-चरण की आवाज से ख़ुशी फूटी पड रही थी। इसके बाद मैं उसे मदन के ढाबे पर ले गया। मैंने हंस कर कहा-‘मदन, आज चरण अपनी कमाई  के पैसो से डिनर करने आया है। ’जितनी देर चरण ने खाना खाया मैं और मदन बातें करते रहे।
  मदन ने कहा –‘आपकी तरह मैंने भी चरण के लिए कुछ सोचा है।  अखबार तो दोपहर तक ही बिकते हैं।  उसके बाद तो चरण खाली ही रहता है। अगर वह चाहे तो दोपहर के बाद मेरे ढाबे पर काम कर सकता है। मैं एक दो दिन में ही उसे पूरा काम समझा दूंगा।  दोनों समय का खाना और साथ में कुछ पैसे भी दूंगा।  और हाँ मेरे कुछ आदमी रात में सफाई के बाद यहीं सोते हैं। उनके लिए मैंने नहाने –धोने  का इंतजाम भी कर रखा  है।  चरण को सडकों  पर सोने की आदत है। उसे कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। ’
   चरण को भला और क्या चाहिए था।  उसकी रातें तो सडक पर ही गुजरती थीं , जहाँ से पुलिस कई बार भगा दिया करती थी।  अब चरण सचमुच बदल गया था। सुबह अखबार बेचना और दोपहर बाद मदन के ढाबे में काम करना उसकी दिनचर्या बन गई थी।
  एक शाम मैं मदन के ढाबे पर गया तो चरण काम में लगा हुआ था।  मुझे देख कर वह मेरे पास चला आया। मदन ने बताया कि अब तक उसके पास चरण के काफी पैसे जमा हो गए हैं।  ‘ मैं जब भी लेने के लिए कहता हूँ तो यह कह देता है  कि  इसे कोई जरूरत नहीं। ’ मैंने चरण की और देखा तो वह बोला-‘ आसपास मेरे जैसे और भी कई  चरण जरूर मिल जायेंगे आपको।  इन पैसों को अगर आप उन्हें सुधारने पर खर्च करें तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी। ’ मैंने देखा यह कहते हुए उसकी आँखों में गीलापन झलमला रहा था। (समाप्त)