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Sunday, 5 May 2019

बूढी बुहारी-बाल गीत-देवेन्द्र कुमार


बूढ़ी बुहारीदेवेन्द्र कुमार बाल गीत
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बूढ़ी बुहारी आफत की मारी
घूरे पर पड़ी हुई रोती है चुप-चुप
कौन पोंछे आंसू, किससे कहे दुख
जीवन में इसने पाया न सुख

सीकें घिसकर टूट गईं
बंधी डोरी टूटकर गिर गई
पर कभी थी सुंदर, चमकदार
लड़ती थी कूड़े से बार-बार

काम था घर को साफ सुथरा बनाना
फिर थक हार कर कोने में चले जाना
घिसते घिसते घिस कर टूट गई
तो फेंक दी गई घर से बाहर

चलो एक म्यूजियम बनाएं
बूढ़ी बदरंग झाड़ुओं को उसमें सजाएं
लोगों से कहें बूढ़ों को भूल मत जाओ
उन्हें परेशान देखो तो झट हाथ बढ़ाओ
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Monday, 15 April 2019

मम्मी व्याकुल--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


मम्मी व्याकुलबाल गीत—देवेन्द्र कुमार

                                                                                                                           
सड़क अंधेरी बत्ती गुल
घर में हैं मम्मी व्याकुल

पापा अब तक घर न आए
मां को धीरज कौन बंधाए
बार-बार बाहर जाती हैं
अगले पल अंदर आती हैं

मैं समझाऊं, आंख दिखाएं
बहना को भी वह धमकाएं
लो इतने में पापा आए
मम्मी को थैले पकड़ाए

मम्मी ने पूछा तो बोले
कब से रुका हुआ था पुल
हम सब खूब हंसे खिलखिल
सड़क अंधेरी बत्ती गुल
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Sunday, 14 April 2019

सिर के बल--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


सिर के बलबाल गीत—देवेन्द्र कुमार
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पापा कहते बड़े बनो
मम्मी की हर बात सुनो
लेकिन अपना मन चाहता है
बालक बनकर रहा करें

देखो मेरा जूता छोटा
सब कहते हैं मुझको खोटा
बिना बात क्यों बड़ा बनूं मैं
लोग भले ही कहा करें

जब खेलूं तो रोका जाता
बिना बात ही टोका जाता
सब चाहते हैं यह बच्चा तो
बस सिर के बल खड़ा रहे

कोई मुझसे कुछ न बोले
मैं बैठा हूं आंखें खोले
यह दुनिया बच्चों की भाई
बच्चे क्यों चुप रहा करें
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Saturday, 23 March 2019

मुफ्त मिले--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


मुफ्त मिले---देवेन्द्र कुमार –बाल गीत
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महंगाई के इस मौसम में
मुफ्त मिले बस मां का प्यार

जब-जब देखे प्यार जताए
अच्छी अच्छी बात बताए
खुद न खाकर हमें खिलातीं
पल पल करती रहे दुलार

कभी कभी गुस्सा भी आता
होंठों से मुस्कान भगाता
माथे पर बल पड़ जाते हैं
अब कैसे हो बेड़ा पार

पर दिल मां का बहुत नरम है
गुस्सा तो एक झूठ भरम है
हमें उदास देखकर भर ले
अपनी गोदी में हर बार

महंगाई के इस मौसम में
मुफ्त मिले बस माँ का प्यार
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Friday, 22 February 2019

बढ़िया सवारी--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


बढि़या सवारी—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार
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कुत्ते ने बिल्ली को
बिल्ली ने चूहे को
चूहे ने दोनों को
देखा तो भागा।

बिल्ली पर कुत्ता
चूहे पर बिल्ली
चूहा बच निकला
झाड़ी के पीछे

बिल्ली जा उलझी
झाड़ी के कांटों में   
कुत्ता भी रपट गया
कीचड़ में लथपथ

म्याऊं और भौं भौं
मुश्किल में भारी
चूहे की निकली
बढि़या सवारी
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Wednesday, 13 February 2019

बेच रहे गुब्बारे --बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


बेच रहे गुब्बारेबाल गीत—देवेन्द्र कुमार
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बच्चे बेच रहे गुब्बारे
रंग-बिरंगे प्यारे प्यारे
फटे पुराने कपड़े पहने
कौन नए सिलवाएगा

सब बच्चे पढ़ने जाते हैं
छुट्टी हो तो घर आते हैं
ये क्यों सड़कों पर रहते हैं
कौन हमें समझाएगा

ऐसे बच्चे कितने सारे
बेघर हैं पर फिर भी प्यारे
इनका बचपन किसने छीना
कौन इन्हें बतलाएगा

कुछ सड़कों पर कुछ ढाबों में
घर में नौकर, कुछ खेतों में
पुस्तक, खेल, खिलौने गायब
वापस कौन दिलाएगा

क्यों न हम सब मिलकर सोचें
ये क्यों अपना बचपन बेचें
कहां छिपी हैं इनकी खुशियां
कौन खोजकर लाएगा
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बेच रहे गुब्बारे--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


बेच रहे गुब्बारेबाल गीत—देवेन्द्र कुमार
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बच्चे बेच रहे गुब्बारे
रंग-बिरंगे प्यारे प्यारे
फटे पुराने कपड़े पहने
कौन नए सिलवाएगा

सब बच्चे पढ़ने जाते हैं
छुट्टी हो तो घर आते हैं
ये क्यों सड़कों पर रहते हैं
कौन हमें समझाएगा

ऐसे बच्चे कितने सारे
बेघर हैं पर फिर भी प्यारे
इनका बचपन किसने छीना
कौन इन्हें बतलाएगा

कुछ सड़कों पर कुछ ढाबों में
घर में नौकर, कुछ खेतों में
पुस्तक, खेल, खिलौने गायब
वापस कौन दिलाएगा

क्यों न हम सब मिलकर सोचें
ये क्यों अपना बचपन बेचें
कहां छिपी हैं इनकी खुशियां
कौन खोजकर लाएगा
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