Wednesday, 4 January 2023

बचपन की गलियां—कहानी—देवेन्द्र कुमार

 

       बचपन की गलियां—कहानी—देवेन्द्र कुमार

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  तीनों सखियाँ—रचना,जया और रंजना सोसाइटी के पार्क में बैठीं धूप का आनन्द ले रही थीं। छुट्टी का दिन, सर्दियों का मौसम—बच्चे घास पर उछल- कूद करते हुए खिलखिला रहे थे। हिरणों की तरह दौड़ते बच्चों को देख कर तीनों मुस्करा उठीं। रचना ने कहा—‘ इन खिलंदड बच्चों को देख कर अपना बचपन  याद आ जाता है,जिसे हम भूल चुके हैं।’

   जया बोली—अपना बचपन सुंदर सपने जैसा लगता है। काश, हमारा बचपन लौट आये, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही।’ रचना ने कहा –‘ छुटपन में हम गर्मियों की छुट्टियों में माँ के साथ नाना जी के गाँव जाया करते थे। हरदम मस्ती और खेलकूद! आज भी याद करती हूँ तो मुंह में मिठास घुल जाता है।

  पर रंजना अब एकाएक चुप हो गई थी,उसके चेहरे पर उदासी थी। रचना और जया ने कुछ अचरज के भाव से कहा-‘ क्या बात है रंजना, बचपन की बात होते ही तुम्हारे मुख पर यह उदासी क्यों छा गई है ! कहीं तुम्हारा बचपन...’

     रंजना ने उनकी बात पूरी  होने से पहले ही कहा –‘नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, मेरा बचपन भी सामान्य बच्चों जैसा था। मौज मज़ा और मस्ती में थिरकता बचपन। लेकिन उन दिनों की मीठी यादों में एक कडवी स्मृति भी है, जो मुझे अपनी गलती की याद दिलाती रहती है, और मेरा मन उदास हो जाता है।’

      ‘कडवी यादें! किस गलती की बात कह रही हो रंजना!’—जया और रचना ने पूछा।
      रंजना कहने लगी—‘मैं भी तुम्हारी तरह गर्मी की छुट्टियों में माँ के साथ ननिहाल जाया करती थी।सचमुच बहुत मज़ा आता था।
एक दिन माँ ने कहा कि आज नानाजी के पास चलना है। सुन कर मन ख़ुशी से झूम उठा। मैंने अपना बैग लगा लिया। फिर कहा-‘माँ, जल्दी चलो।’ माँ बोली-‘ अभी तो घर के कई काम निपटाने हैं,उसके बाद चलेंगे। तेरे पापा भी तो जायेगे, उनके ऑफिस से आने के बाद ही जा सकते हैं।’ पर मेरा मन कह रहा था कि तुरंत उड़ कर नाना-नानी के पास पहुँच जाऊं, लेकिन पापा के दफ्तर से लौटने तक तो इंतजार करना ही था। मम्मी घर के कामों में व्यस्त हो गईं और मैं टी वी देखने लगी। तभी किसी लड़की की चीख सुनाई दी। मैं झट पहचान गई, वह तो शशि की आवाज़ थी।                                       1

मैंने जोर से कहा—‘ मम्मी,शशि क्यों चीख रही है?’और गलियारे में निकल आई, वहां घर का कूड़ादान रखा रहता था। शशि रोज कूड़ा उठाने आया करती थी।लेकिन मम्मी वहां पहले पहुँच गई थीं,उन्होंने शशि का दायाँ पैर पकड़ा हुआ था। शशि के पैर से खून बह रहा था।फर्श पर भी काफी खून फैला था।माँ ने कहा—‘रंजना,जल्दी से रिक्शा बुलाओ,शशि को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना होगा।’ कुछ ही देर में माँ शशि को डाक्टर के पास ले गई।मैं भी साथ थी।

   ‘ शशि को क्या हुआ था ?’—रचना ने पूछा।

    ‘वह रोज हमारे घर का कूड़ा उठाने आया करती थी।’-रंजना ने बताया।’कूड़ा उठाते समय उसका पैर कांच के टूटे टुकड़े पर पड़ा और खून बह चला।’

     ‘फिर’—जया ने पूछा।

    ‘ उसके पैर में गहरा घाव हो गया था। डाक्टर ने घाव की मरहम पट्टी कर दी। शशि के पैर में कई टाँके लगे थे।  डाक्टर ने  उसे १५ दिन तक घर पर आराम करने की सलाह दी थी। उसकी हालत देख कर मुझे रोना आ गया। माँ ने पूछा—‘रंजना, तुम क्यों रो रही हो।शशि जल्दी ठीक हो जायेगी। पर मुझे नहीं लगता कि वह जल्दी काम पर लौट सकेगी।’

 ‘ तो फिर तुम माँ के साथ नानी के पास चली गईं।’ रमा ने पूछा।

  ‘नहीं उस दिन नानी के पास जाना न हो सका।क्योकि माँ शशि को लेकर उसके घर चली गईं।मैं भी साथ थी। और उसी दिन क्यों, बाद में भी ननिहाल नहीं जा सकी। एक दिन पापा ने चलने के लिए  कहा भी पर मैंने ही मना कर दिया।’

    ‘क्यों भला!’—रचना ने पूछा,’   

    ‘ इसलिए कि मेरी गलती से ही शशि का पैर इतनी बुरी तरह घायल हुआ था।’

      ‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो।’—रचना और जया ने एक स्वर में पूछा।

       रंजना ने उदास स्वर में कहा-‘मैंने टूटा हुआ शीशे का गिलास कूड़े  में डाल दिया था, जबकि मुझे टूटे गिलास को अलग रखना चाहिए था| उसी के नुकीले टुकड़े से शशि का पैर इतनी बुरी तरह घायल हो गया था। इस गलती के लिए मुझे सदा पछतावा रहेगा। मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं रोज शशि को देखने जाया करूंगी। स्कूल से लौट कर मैं शशि के पास चली जाया करती थी। मुझे देखते ही

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शशि हंसने लगती। और कहती— त्तुम्हे देखते ही मेरे पैर का दर्द छूमंतर हो जाता है।’ फिर कस कर मेरा हाथ थाम लेती। पर मैं देख रही थी कि शशि का पैर सूजा हुआ था। पर वह मेरे सामने मुस्करा कर ठीक  होने का दिखावा करती थी। मेरे मन में एक कसक उठती थी, मन कहता था कि अपनी गलती के बारे में शशि को सच बात बता दूं। लेकिन कभी हिम्मत न जुटा सकी। इसी तरह कई दिन बीत गए।

   एक रात नींद खुल गई और मैं रोने लगी। मन कह रहा था कि गलती मेरी थी और मैं सच कहने का साहस नहीं जुटा पा रही थी।तभी माँ मेरे पास आ गईं और मेरा सिर सहला कर पूछने लगीं—‘क्या बात है, रो क्यों रही हो?’

     माँ के इतना कहते ही मेरी रुलाई और भी जोर से फूट पड़ी।मैंने कहा—‘ शशि को मेरी गलती से ही इतनी गहरी चोट लगी है।’ और उन्हें टूटे गिलास के बारे में बता गई। माँ ने मुझे गोदी में भर लिया और कहा—‘बेटी, गलती किसी से भी हो सकती है।पर उसे स्वीकार करने का साहस हर किसी में नहीं होता,अब आराम से सो जाओ, तुमने मुझे अपनी गलती बता कर मन पर रखा बोझ उतार दिया है। बाकी बात कल करेंगे।’

    ‘ तो अगली सुबह क्या हुआ?’—जया ने पूछा

     ‘अगली दोपहर जब मैं शशि से मिलने के लिए चली तो माँ भी मेरे साथ थी। माँ को देख कर शशि के घर वाले कुछ अचकचा गए। क्योंकि कई दिनों से मैं अकेली ही शशि के पास जाया करती थी। शशि की माँ ने कहा—‘ आपने क्यों तकलीफ की।शशि तो अब पहले काफी ठीक है। और वैसे भी रंजना तो रोज शशि से मिलने आती ही है।’

     मम्मी ने कहा—‘मुझे एक विशेष कारण से आना पड़ा है। रंजना अपने मन पर बोझ लिए फिर रही है, उसके हाथ से एक भारी गलती हुई है,इसके कारण ही शशि का पैर बुरी तरह घायल हुआ है।’ और फिर माँ ने टूटे गिलास वाली बात शशि की माँ को बता दी।

      कमरे में कुछ देर मौन छाया रहा, शशि की माँ ने कहा—‘बहनजी, हमारा काम ही कुछ ऐसा है, उसमें चोट लगती ही रहती है।कई बार चोट गंभीर भी होती है। लेकिन आज तक किसी ने भी आगे आकर यह नहीं कहा कि चोट उसकी गलती से लगी थी। आपकी बेटी बहुत हिम्मती है,जो अपनी गलती स्वीकार करने के लिए आगे आई है।’

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   माँ ने कहा—‘ रंजना को लगता है कि सच पता लगने पर कहीं शशि उससे नफरत न करने लगे।’ माँ के इतना कहते ही शशि ने मेरा हाथ थाम लिया। उसकी आँखों से आंसू बह चले। मैं भी अपनी रुलाई न रोक सकी। इसके कुछ देर बाद हम अपने घर लौट आये।मेरा मन हल्का हो चुका था।’

     जया ने कहा—‘ अंत भला तो सब भला। तब फिर आज उस घटना को लेकर तुम्हारा मन परेशान क्यों है?’

      इसका कारण है उस दिन के बाद मेरा शशि से कभी न मिल पाना,’’—रंजना ने उदास स्वर में कहा।

      ‘आखिर ऐसा क्या हुआ कि तुम शशि से फिर कभी नहीं मिल पाई।’ –जया और रचना ने जानना चाहा।      

    ‘उसी शाम पापा दफ्तर से घर आये तो उन्होंने बताया कि उनका ट्रान्सफर हो गया है। यह कोई नई बात नहीं थी।मम्मी तुरंत सामान की पैकिंग में लग गई। पापा भी अपना सामान समेटने लगे। अगला पूरा दिन भी इसी हड़बड़ी में चला गया। शशि के पास जाना न हो सका। हमने दो दिन बाद उस शहर को छोड़ दिया। शशि से आखिरी बार मिलने की इच्छा अधूरी ही रह गई, जो आज तक पूरी न हो सकी।

    रचना और जया चुपचाप सुन रही थीं। रंजना कहती रही—‘ फिर तो वर्ष तेजी से भागते रहे। मेरी पढाई पूरी हुई और फिर शादी हो गई। पर शशि से मिलने की इच्छा बनी  ही रही। कुछ वर्ष पहले पुराने शहर जाना हुआ। अब सब कुछ बदल गया था। मैं उस बस्ती में गई जहाँ शशि का परिवार रहता था,पर वहां ऊँची इमारतें बन गई थीं। मैंने लोगों से पूछा पर कुछ पता न चला। मैं निराश मन से लौट आई।’

     जया ने कहा—‘ तुम्हारी तरह शशि की भी शादी हो चुकी होगी। हमें आशा करनी चाहिए कि वह अपने परिवार के साथ स्वस्थ और सुखी हो।’  

      रंजना ने कहा –‘ईश्वर करे ऐसा ही हो। जब भी बचपन का ध्यान आता है शशि वाली घटना एकदम सामने  आ जाती है और

       रचना बोली—‘ बचपन की गलती का बोझ इतने वर्षों तक साथ लेकर चलना ठीक नहीं। बचपन की गलियों में न जाने कितना कुछ घट जाता है। तुमने अपनी भूल मान ली, क्या यही काफी नहीं,अब मुस्करा भी दो। बच्चों की ख़ुशी में शामिल हो जाओ।‘ पार्क में बच्चे खिलखिला रहे थे। रंजना मुस्करा दी।( समाप्त)

 

 

                                   

Saturday, 31 December 2022

चोट की दावत-कहानी -देवेंद्र कुमार

 

 

                चोट की दावत-कहानी -देवेंद्र कुमार    

                                               

 

   दोपहर का समय –- बच्चे स्कूलों से लौट रहे हैं। एक के बाद दूसरी बस आकर रूकती है,बच्चे शोर मचाते,हँसते-मुस्कराते उतरते हैं और प्रतीक्षा करते घर वालों के साथ चले जाते हैं। कुछ समय तक शोर और हड़बड़ी के बाद वातावरण शांत हो जाता है। सुबह और दोपहर में रोज यही क्रम चलता है। लेकिन वह दोपहर कुछ अलग थी। सोसाइटी के गार्ड रामबरन ने देखा गेट के बाहर वाली मुंडेर पर एक रोटी रखी है और उस तरफ नजरें गडाए एक लड़का खड़ा है।

     वह लड़का सोनू था। गार्ड सोनू को खूब जानता है। वह सड़क पर समय गुजारने और रात में फुटपाथ पर कहीं भी सो जाने वाले लड़कों में से है। सोनू कहाँ से आया था इस बारे में रामबरन भी औरों की तरह कुछ नहीं जानता। इन छोकरों के बारे में जानकारी जुटाने की जरूरत उसे कभी महसूस नहीं हुई। उसने सोनू को वहां आकर रुकने वाली कारों के शीशों पर झाडन फिरा कर कुछ मांगते और डांट खाकर पीछे हटते हुए कई बार देखा है। ऐसे में एक प्रश्न मन में उठता है—क्या इन बच्चों का कोई नहीं है।

     लेकिन इस समय सोनू मुंडेर पर रखी रोटी के पास पहरेदार की तरह क्यों खड़ा है भला। उसने पूछा —‘’ अरे इस रोटी की पहरेदारी क्यों कर रहा है? खाता क्यों नहीं?’’  

      ‘’ रोटी मेरी नहीं किसी और की है।’’

       ‘’किसकी?’’

      ‘’बालन की।’’

      बालन को भी जानता है रामबरन। बालन भीख मांगता है। और कुछ ऐसे वैसे काम भी करता है, जिन्हें कोई भी ठीक नहीं मानता। सोनू ने जो कुछ बताया उसका मतलब था—अभी  कुछ देर पहले स्कूल बस से उतरते हुए कोई बच्चा गिर पड़ा। तब सोनू और बालन वहीँ खड़े थे। बालन के हाथ में रोटी थी। उसने रोटी मुंडेर पर रखी और बढ़ कर रोते हुए बच्चे को उठा लिया, फिर सोसाइटी के अन्दर की तरफ चल दिया। बच्चे की माँ भी आगे आगे चल रही थी। बालन ने सोनू से रोटी का ध्यान रखने को कहा और जल्दी लौटने की बात कह कर अन्दर चला गया। बालन को अन्दर गए काफी देर हो गई थी और वह अब तक नहीं लौटा था|

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       रामबरन ने कहा —‘’ तू उसकी रोटी की पहरेदारी कब तक करेगा। इसे खा ले,  मेरे खाने के डिब्बे में एक रोटी बची हुई है, मैं उसे दे दूंगा।’’ तभी न जाने कहाँ से एक बच्चा दौड़ता हुआ आया और मुंडेर पर रखी रोटी उठा कर भाग गया। सोनू ‘चोर चोर’ चिल्लाता हुआ उसके पीछे दौड़ गया। रामबरन को हंसी आ गई। तभी उसने बालन को आते देखा। उसके हाथ में एक थैली लटक रही थी। मुंडेर पर रखी रोटी और सोनू को गायब देख कर वह चिल्लाया—‘’ चोर कहीं का। मेरी रोटी लेकर भाग गया।’’

      रामबरन ने बालन को पूरी बात बता दी। कहा—‘’उसका कोई कसूर नहीं है। ‘’

      बालन ने हाथ की थैली अखबार के पन्ने पर उलट दी। हंस कर बोला—‘‘अपनी तो दावत हो गई’’। वह ठीक ही तो कह रहा था। अखबार पर ढेर सारी पूरियां और मिठाई दिख रही थीं। रामबरन कुछ पूछता इससे पहले ही बालन पूरी कहानी सुना गया। उसने कहा—‘’बच्चे की चोट मामूली थी। माँ ने दवा लगा दी। मैं चलने लगा तो उन्होंने यह पूरी--मिठाई मुझे दे दी। साथ ही दस का नोट भी  दिया। ’’

       ‘’ वाह तेरे तो मजे आ गए।’’-- रामबरन ने कहा।’’ बच्चे को चोट लगी और तुझे पूरी,मिठाई और बख्शीश भी मिल गई।’’

       ‘’वह सब तो ठीक, पर बच्चे को चोट नहीं लगनी चाहिए थी।’’ तभी सोनू भागता हुआ आ गया।उसकी मुट्ठी मैं रोटी का टुकड़ा झाँक रहा था। बोला-- ‘’ मैंने भी रोटी- चोर को पकड़ कर ही दम लिया। छीना-- झपटी में आधी रोटी उसके हाथ में ही रह गई।’’

      बालन ने हंस कर उसका कन्धा थपथपा दिया,बोला—‘’ छोड़ रोटी की बात।ले पूरी और मिठाई खा।’’ दोनों ने छक कर खाया फिर भी काफी खाना बच गया। बची हुई भोजन सामग्री को थैली में डालते हुए हंस कर बोला—‘ऐसा पहली बार हुआ कि दिन में छक कर खाने के बाद रात का भी इन्तजाम हो गया हो।’’

       ‘’क्या ऐसा रोज नहीं हो सकता?’’सोनू ने पूछा|

       ‘’कम से कम भीख से तो कभी नहीं।’’—कहते हुए बालन सोनू का हाथ थाम कर चल दिया।

       ‘’तो फिर कैसे?’’

        सोनू को अपने सवाल का जवाब नहीं मिला। बालन एक पेड़ के नीचे बने छोटे से मंदिर के सामने हाथ जोड़ आँखें बंद कर खड़ा था। ‘’तुम भगवान से भी मांगते हो।’’—सोनू बोला।

     ‘’अपने लिए कुछ नहीं, बच्चों के लिए माँगा।’’

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     ‘’क्या?’’

     ‘’यही कि सब बच्चे ठीक रहें,किसी को चोट न लगे।’’

     ‘’लेकिन अगर बच्चे को चोट न लगती तो दावत कैसे होती।’’

    बालन ने सोनू के गाल पर चपत लगा दी, चिल्ला कर बोला—‘’फिर कभी ऐसी गलत बात मत कहना,’’ सुन कर सोनू सहम गया। वह सोच रहा था—‘आखिर मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया। दावत की बात खुद बालन ने ही तो कही थी।’ पूरे दिन बालन और सोनू साथ साथ घूमते रहे।सोनू कुछ समझ नहीं पा रहा था। रात हुई तो भूख सताने लगी। रोज तो वह कारों के शीशे साफ़ करके या बोझ ढो कर रोटी का जुगाड़ कर लेता था,लेकिन उस दिन मौका नहीं मिला। लेकिन एक आशा थी कि जब बालन सुबह का बचा हुआ भोजन खाने बैठेगा तो उसे भी दावत में हिस्सा जरूर देगा। लेकिन उस रात भूखे ही रहना पड़ा। क्योंकि बालन ने भी कुछ नहीं खाया। क्या सोनू को पता था कि उसने बचे भोजन की थैली कूड़े मैं फैंक दी थी।

       सुबह दोनों सोसाइटी के गेट पर खड़े थे। बच्चे हँसते मुस्कराते हुए स्कूल बसों में चढ़ रहे थे। बालन खुश था। दोपहर में बच्चों के लौटते समय भी बालन सोनू का हाथ थामे हुए वहीँ मौजूद था। बच्चों के सोसाइटी में चले जाने के बाद सोनू ने कहा—‘’ आज किसी बच्चे को चोट नहीं लगी।’’

          ‘’मैंने भगवान से यही तो माँगा था।’’—बालन ने हंस कर कहा।

        ‘’ तो आज तुम्हारी दावत नहीं होगी। ’’—- कहते हुए सोनू भी हंस रहा था।

          ‘’आज से दूसरे के आगे हाथ फैलाना बंद।’

           ‘’तो खाना कैसे मिलेगा?’’—सोनू ने जानना चाहा।

           ‘’कोई और काम करेंगे।’’

           ‘’ क्या काम?’’

            ‘’सुबह और दोपहर बच्चों को देखेंगे। ‘’

           ‘’ बच्चों को देखना---यह कैसा काम है?’’

            ‘’इससे ख़ुशी मिलेगी तो आधा पेट अपने आप भर जाएगा।’’

        ‘’और बाकी आधा?’’—सोनू ने पूछा

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           ‘’आधी भूख मिटाने के लिए काम करेंगे।’’    

         ‘’ हाँ काम करेंगे, किसी से कुछ मांगेगे नहीं। ‘’

         अगली और उसके बाद आनेवाली हर सुबह और दोपहर के समय बालन और सोनू हँसते मुस्कराते बच्चों को देखते खड़े रहते थे। पता नहीं उन्हें कोई काम मिला या नहीं।पर बच्चों की  देख भाल का काम उन्होंने किसी से पूछे बिना संभाल लिया था। (समाप्त )

           

 

Friday, 30 December 2022

घड़ी का बहाना -कहानी- देवेन्द्र कुमार

 

                                                     

                                    घड़ी का बहाना -कहानी- देवेन्द्र कुमार     

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   अमल और मीना अपने बाबा रामदयाल से बहुत गुस्सा हैं। उस दिन दोनों दौड़े दौड़े चाकलेट की फरमाइश लेकर आये पर बाबा किसी दूसरे मूड में थे। उन्होंने डपट कर भगा दिया-‘ कोई चाकलेट वाकलेट नहीं मिलेगी।’ अमल और मीना ने माँ उमा से बाबा की शिकायत की,पिता सुरेश से भी कहा। ऐसा पहली बार हुआ था जब बाबा ने अमल और मीना को डांट दिया था।

   असल में उस दिन बाबा को  बचपन के मित्र जय  शंकर के बारे में परेशान करने वाली खबर मिली थी-जय शंकर बहुत बीमार थे। बाबा जय शंकर से तुरंत मिलना चाहते थे, पर यह इतना आसान नहीं था। शंकर  दूसरे शहर में रहते हैं।बाबा पिच्चासी वर्ष  के हो गए हैं, ,अकेले जाना संभव नहीं। बेटा सुरेश बहुत व्यस्त रहता है, उससे साथ चलने को कैसे कहें। वह इसी सोच में बैठे थे, तभी अमल और मीना चाकलेट की फरमाइश लेकर आ गए  और बाबा ने डांट  कर भगा दिया। उसके बाद उन्होंने फोन पर जय शंकर से काफी देर तक बात की, तब बैचैनी कुछ कम हुई । उन्होंने अमल और मीना को नाराज़ कर दिया था। उन्हें मनाना जरूरी हो गया था।

  उन्होंने अमल और मीना को कई बार आवाज़ दी,पर दोनों नहीं आये। बाबा अच्छी तरह समझ गए कि बच्चों को मनाने का कोई नया उपाय खोजना होगा।कुछ देर सोचने के बाद बाबा अलमारी से  पुरानी पिटारी लेकर आँगन में कुर्सी पर आ बैठे।फिर उसमें से पुरानी हाथ घड़ियाँ  निकाल कर मेज़ पर रखने लगे। बच्चे पास नहीं आ रहे थे पर उनकी नज़रें बाबा पर टिकी थीं। बाबा ने जैसे अपने को सुनाने के लिए कहा-‘हर पुरानी घडी में एक कहानी बंद है।’

   ‘ हर घडी में एक कहानी बंद है’ इस वाक्य ने अमल और मीना की उत्सुकता को बढ़ा दिया, कुछ सकुचाते हुए दोनों बाबा के निकट चले आये।अमल ने पूछा-‘क्या कहानी घडी में बंद हो सकती है?’

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   बाबा ने कहा—‘घडी में ही क्यों, कहानी तो कहीं भी रह सकती है।लेकिन वह सब बाद में,पहले यह बताओ कि तुम दोनों ने अपने बाबा को माफ़ किया या नहीं।’और यह कहते हुए उन्होंने अपने कान पकड़ लिए  और ऐसा मुंह बनाया कि अमल और मीना खिलखिला उठे। बाबा ने झट  दो बड़ी चाकलेट उन्हें थमा दीं। मीना ने कहा-‘ बाबा,अब आप हमें इस घडी में बंद कहानी  सुनाइए।’ और उसने एक घडी हाथ  में उठा ली। उस घडी का डायल टूटा हुआ था,उसकी सुइयां भी गायब थीं।     

    बाबा बोले-‘इसमें बंद कहानी का हीरो तो मैं ही हूँ।’उन्होंने बताया-‘यह मेरे बचपन की बात है, तब मैं अमल जितना था। एक दिन की बात है,मेरे  पापा यानी तुम्हारे पड़ बाबा ऑफिस जाते समय अपनी रिस्ट वाच मेज पर भूल गए। बस मैंने घड़ी कलाई पर पहन ली और छत पर चला गया।तभी न जाने कहाँ से एक बंदर वहां आ गया, मैं बंदर से बचने के लिए भागा तो सीढ़ी पर फिसल गया। चोट तो ज्यादा नहीं आई पर रिस्ट वाच की जो हालत हुई वह तुम्हारे सामने है।’

  ‘तब तो आपके पापा ने खूब डांट लगाई होगी आपको,’अमल ने मुस्करा कर कहा।

  ‘ नहीं,उलटे मुझे खूब प्यार किया। उन्होंने कहा था-‘ रिस्ट वाच तो और आ जायेगी,पर तुझे चोट लगती तो मुझे बहुत दुःख होता।’

  अमल ने दूसरी रिस्ट वाच दिखा कर पूछा –‘और इसमें  कौन सी कहानी बंद है ?’

   बाबा कहने लगे '- यह घटना कोई दो वर्ष पहले की है।एक सुबह मैं चाय पी रहा था, साथ ही अखबार पर भी नज़र डाल लेता था।तभी फोन की घंटी बजी,मैं फोन में व्यस्त हो गया। फिर  दूध वाला आ गया, उसका नाम  विनय था। वह दूध की थैली रख कर चला गया। पर थोड़ी देर बाद विनय दुबारा आ गया।  अखबार वाले ने उसकी कलाई पकड़ी हुई थी। बोला ‘आपके घडी-चोर को पकड़ कर लाया हूँ।’ और मेरी रिस्ट वाच मुझे थमा दी।

  मैंने मेज पर नज़र डाली-अरे! सचमुच मेरी रिस्ट वाच अपनी जगह नहीं थी। यानि अखबार वाला ठीक कह रहा था। विनय ही मेरी घडी उठा कर ले गया था। अखबार वाले ने बताया कि उसने विनय को तेजी से जाते देखा था।उसकी मुट्ठी में रिस्ट वाच थी, उसने विनय से पूछा तो विनय ने मान लिया कि घडी उसकी नहीं है।’इसे पुलिस को देना चाहिए।’यह सलाह देकर अख़बार वाला चला गया।

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   पुलिस का नाम सुन कर विनय रोने लगा, बोला-‘मैंने चोरी की है यह सुन कर तो मेरी माँ जीते जी ही मर जायेगी।पता नहीं मुझे क्या हो गया था जो आपकी घडी उठा कर ले गया।’

  ‘तो आपने घडी चोर को पुलिस को दे दिया होगा।’अमल ने पूछा।

  ‘नहीं क्योंकि वह चोर नहीं था। रिस्ट वाच के पास ही मेरा पर्स भी रखा था,जिसमें काफी रकम थी।’बाबा ने कहा।

  ‘तो फिर वह आपकी रिस्ट वाच क्यों ले गया था?’

  बाबा ने कहा -‘विनय ने बताया कि वह गाँव से शहर काम की तलाश में आया था। वह ऐसी जगह नौकरी कर रहा है जहाँ नियम बहुत कड़े हैं।अगर पहुँचने में दस मिनट की देर  हो जाए  तो आधे दिन  का वेतन काट लिया जाता है।वह समय पर पहुँचने की  बहुत कोशिश करता है पर फिर भी कई बार उसका वेतन कट चुका है। वह कब से घडी लेने की सोच रहा था पर इतने पैसे जमा ही नहीं होते। वह गाँव में अकेली रहती माँ को  एक बार भी पैसे नहीं भेज पाया है। मैंने कहा-‘ घबराओ मत,मैं पुलिस को नहीं बुला रहा हूँ। लेकिन इस तरह मेरी  घडी चुराना तो ठीक नहीं। अपनी माँ की कसम लो कि फिर  इस तरह का विचार मन में नहीं आने दोगे।’

   ‘फिर विनय का क्या हुआ?’ दोनों ने एक स्वर में पूछ लिया।

   अगली सुबह विनय के बदले कोई दूसरा लड़का दूध देने आया,मैंने पूछा तो पता चला कि विनय बाहर खड़ा है। मैं ने उससे विनय को अंदर भेजने को कहा।विनय आया और चुपचाप खड़ा हो गया। मैंने कहा—तुम कायर हो इसलिए मुझसे मुंह चुरा रहे हो।क्या इसी तरह माँ के  सपने पूरे करोगे।’ फिर मैंने उसके हाथ में एक नई रिस्ट वाच रख दी। कहा-अब समय पर दफ्तर पहुंचा करना। मैंने घडी पिछली शाम को ही मंगवा ली थी। उसने कहा-‘यह तो बहुत महंगी होगी।’ मैंने कहा कि घडी एक हज़ार रूपए की है। तुम धीरे धीरे इसकी कीमत चुका देना,तुम तो रोज हमारे घर दूध देने आते हो ,जब जितने दे सको दे देना।’

  मीना ने कहा-‘आप कंजूस और क्रूर हो।आप नई घडी की जगह पुरानी  रिस्ट वाच भी दे सकते थे उसे।’

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   ‘न मैं क्रूर  र्हूँ और न ही कंजूस। लेकिन मैं घडी मुफ्त में देकर उसके स्वाभिमान को चोट नहीं पहुंचाना चाहता था।’बाबा ने कहा फिर एक लिफाफे में रखे कुछ नोट दिखा कर बोले-‘उसने अब तक सौ रूपए वापिस किये हैं।

हम भी मिलना चाहेंगे आपके विनय से।’ मीना ने कहा।

   ‘अब विनय केवल मेरा नहीं हम तीनों का है। इस बारे में किसी से कुछ न कहना।’कह कर बाबा मुस्करा दिए।

    अमल ने एक और घडी हाथ में उठा कर पूछा-‘और इस घडी की क्या कहानी है?’

    बाबा ने कहा-‘आज यहीं पर बस।तुम्हारा बूढा बाबा थक गया है।लेकिन तुम दोनों को एक वादा करना होगा।’

     ‘कैसा वादा?’

    ‘यही कि मुझसे नाराज नहीं होगे।’

     ‘कभी नहीं।लेकिन आप भी हमें चाकलेट के लिए कभी मना नहीं करेंगे।’कहते हुए मीना और अमल घर से बाहर दौड़ गए।बाबा कमरे में जाकर पलंग पर लेट गए और मुंदी  पलकों के पीछे विनय का चेहरा उभर आया। लगा विनय माँ की गोद में सिर रखे लेटा है और माँ उससे लाड लड़ा रही है ।(समाप्त)