Tuesday, 11 May 2021

मीठी मास्टरनी -मेरा बचपन-देवेंद्र कुमार ===

 

मीठी मास्टरनी -मेरा बचपन-देवेंद्र कुमार

 

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उम्र के इस पड़ाव पर खड़े होकर देखता हूँ -कितना कुछ पीछे चला गया है,लेकिन बचपन की स्मृतियाँ अभी तक मुझसे चिपकी हुई हैं या यह कहूं कि ऐसा कोई दिन नहीं होता जब मन भाग कर बचपन की गलियों में न पहुँच जाता हो. कैसे थे वे खट्टे मीठे अबोध दिन! समृतियों का कोलाज पूरी मुखरता से मेरे अंदर धड़कता रहता है हर पल.

 

मैंने अपने पिता को नहीं देखा। वह रामपुर में डाक्टर थे. मेरी माँ विद्या  भी बहुत समय तक मेरे साथ  नहीं रह सकीं. उनके हर विरोध के बावजूद उनकी दूसरी शादी कर दी गई -एक अधेड़ विधुर के साथ, जो पांच बच्चों का पिता था. नानी ने ऐसा किस मजबूरी में किया ,इसे मैं कभी नहीं समझ सका. मैं माँ की दूसरी शादी में बाधा न बनूँ इसलिए उन्होंने मुझे अपने पास रख लिया|

 

मेरी शिक्षा बाजार सीता राम के  कमलेश बालिका विद्यालय से आरम्भ हुई. शुरू शुरू में मैं नानी को अपने साथ बैठा कर रखता था.वह मुझे स्कूल छोड़ने जातीं तो मैं उन्हें आने न देता. वह छुट्टी के बाद मुझे साथ लेकर ही लौट पाती  थीं. वैसे हम बच्चों को घर से लाने और छोड़ने के लिए एक माई की ड्यूटी थी, पर मैं नानी के साथ ही स्कूल आता जाता था. इस पर मेरे सहपाठी मेरी हंसी उड़ाते थे

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मेरे जन्मदिन पर नानी ने कहा -' तेरा जन्मदिन स्कूल में मनाएंगे. .' आधी छुट्टी में हलवाई का आदमी नाश्ता लाया। सब बच्चों ने एक साथ मिल कर नाश्ता किया तो मुझे बहुत अच्छा लगा. दावत में अद्यापिकाएँ भी शामिल थीं। उनमें एक का नाम था--विद्या ,पर वह स्कूल में मीठी मास्टरनी के नाम से मशहूर थीं. वह हर दिन आधी छुट्टी के समय एक थाली में मीठी गोली,टाफी लेकर बैठ जातीं ,बच्चे उन्हें घेर लेते. बच्चों को मनचाही मीठी गोली या टाफी लेने की  छूट थी. मीठी मास्टरनी बच्चों से कोई दाम नहीं लेती थीं. हम बच्चे उन्हें बहुत पसंद करते थे। मैं सोचता था. आधी छुट्टी में मीठी मास्टरनी औरों की तरह नाश्ता क्यों नहीं करती थी ! क्या हम बच्चों की हंसी से ही उनका पेट भर जाता था!

 

उन्हें बच्चों से बातें करना अच्छा लगता था. हम बच्चे उन्हें जितना पसंद करते थे ,स्कूल के बाकी लोग उनसे चिढ़ते थे ,पता नहीं क्यों. कई बार मैंने स्टाफ को उनके बारे में बातें करते सुना था.

शायद विद्या जादू जानती है. इसीलिए बच्चे इसे पसंद करते हैं. यह तो ठीक नहीं. ' पता नहीं स्कूल की दूसरी अध्यापिकाएं उनके बारे में ऐसी गलत बातें क्यों करती थीं! क्या मीठी मास्टरनी सच में कोई जादू कर देती थीं कि हम बच्चे उनकी तरफ खिंचे चले जाते थे.

 

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        मेरे जन्म दिन की दावत वाले दिन से विद्या मास्टरनी मुझ पर कुछ ज्यादा ध्यान देने लगी थीं।उन्हे पता चल गया था कि उनका और मेरी माँ का नाम एक ही था.  जब भी मैं उनके पास जाता तो वह प्यार से मेरे बाल सहला देतीं, कहती-'तुम्हारे बाल और नाखून इतने बढे हुए क्यों हैं ? क्या ठीक से नहाते नहीं हो ! जब भी मैं उन्हें देखता या उनका नाम सुनता तो मुझे माँ याद आ जातीं, मैं  जैसे उड़ कर उनके पास पहुँच जाता, और मेरा मन उदास हो जाता.

 

          एक दिन की बात, नानी को काम से कहीं जाना था इसलिए मैं माई के साथ घर जाने वाला था. लेकिन मीठी मास्टरनी ने कहा-'देवन, आज मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूँगी.' लेकिन वह मुझे अपने घर ले गईं। मैंने कहा -'मुझे नानी के पास छोड़ दीजिये.'

 

           मीठी मास्टरनी ने कहा-थोड़ी देर में चलेंगे।'और उन्होंने मेरे बढे  हुए बाल और नाखून काटे,फिर मुझे रगड़ रगड़ कर स्नान  कराने के बाद पता नहीं किसके कपडे पहना दिए! अब मुझे डर लग रहा था. मैं तो रोज़ नहा कर ही स्कूल जाता  था. फिर उन्होंने मुझे दुबारा क्यों नहला दिया था. और पता नहीं किस बच्चे के कपडे पहना दिए थे!

 

   नानी के पास जाना है.'मैंने कहा,और तभी नानी वहां आ गईं। नानी ने मीठी मास्टरनी को खूब भला बुरा कहा और मेरा हाथ पकड़ कर दरवाजे की तरफ बढ़ी तो मास्टरनी ने कहा-' आपको जो कहना था आपने कह दिया,अब मेरी भी तो सुन लीजिये.''नानी ने मुड  कर मास्टरनी की ओर  देखा  तो उन्होंने कहा-'  पता नहीं आपने मेरे  बारे में क्या गलत सुन और सोच  लिया.

 

         तुमने देवन को मेरे पास क्यों नहीं छोड़ा, अपने साथ  क्यों ले  आईं, तुम चाहती क्या हो आखिर ?'

 

           केवल यही कि आपका देवन भी दूसरे बच्चों की तरह साफ़ सुथरा होकर स्कूल जाए.

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           'हम घर से इसे तैयार करके ही स्कूल भेजते हैं'-नानी ने कहा.

 

' क्या आपने  देवन के बढे बाल और गंदे नाखूनों पर कभी ध्यान दिया ?'

 

 नानी चुप खड़ी रही, मीठी मास्टरनी कहती रहीं -'स्कूल के दूसरे बच्चों की तुलना में देवन मुझे हमेशा गन्दा लगता था.इसीलिए आज मैं इसे अपने साथ ले आई| इसके बाल और गंदे नाखून काट दिए और  नहला कर अपने पोते विमल के नए कपडे पहना दिए. क्या मैंने कुछ गलत किया ?

 

 'कहाँ है तुम्हारा पोता विमल? '

 

मास्टरनी ने कहा -'मेरा बेटा परिवार के साथ दूसरे शहर में रहता है. और बार बार मुझे बुलाता रहता है ,पर मैं नहीं जाती,मुझे स्कूल के बच्चों के साथ रहना अच्छा लगता है.मुझे देवन की माँ विद्या के बारे में सब मालूम है. ,वह पास होती तो आपको देवन की चिंता न करनी पड़ती.

 

 नानी ने आगे कुछ नहीं कहा और मुझे घर ले आयीं।

 

इसके दो दिन बाद मीठी मास्टरनी को स्कूल से निकाल दिया गया. स्कूल में चर्चा हो रही थी कि विद्या मास्टरनी मीठी गोली देकर बच्चों पर जादू टोना करती थी इसीलिए उन्हें हटा दिया गया. पर मुझे इस पर जरा भी विश्वास  नहीं था. मैं सोच रहा था -क्या अब वह अपने बेटे के पास चली जाएंगी और मैं उन्हें फिर कभी नहीं देख सकूंगा.

लेकिन दो दिन बाद स्कूल से लौटते हुए , मैंने उन्हें स्कूल के पास वाली गली में चबूतरे पर बैठे देखा. उनके आगे गोली-टाफी से भरा थाल रखा था. और गली में  आते जाते बच्चों ने उन्हें घेर रखा था. वह मुझे देख कर मुस्कराईं तो मैंने उनके पास जाना चाहा,पर नानी ने मेरा हाथ कस कर पकड़ा हुआ था, वह मुझे जैसे खींचती हुई घर की तरफ ले गईं।शायद नानी को भी लगता था कि वह गोली -टाफी से लुभा कर बच्चों पर जादू करती थीं। मुझे नानी पर गुस्सा आ गया.मतलब वह भी लोगों की  झूठी बातों को सच मान बैठी थीं।

 

मैं नानी से लड़ना चाहता था ,लेकिन  इसकी जरूरत नहीं पड़ी. एक दिन नानी ने पूछा -'क्या अपनी मीठी मास्टरनी के पास चलेगा ?' सुनते ही मेरा मन  ख़ुशी से उछल पड़ा. यानि वह औरों की तरह मीठी मास्टरनी को बुरा नहीं समझती थीं। मैं नानी के साथ मास्टरनी के घर गया ,उस समय वह सिलाई  मशीन पर काम कर रही थीं।उन्होंने मुझे झट गोदी में भर लिया और प्यार करने लगीं। नानी से कहा -;आज मेरे मन का बोझ उतर गया. मुझे लगता था कि आप भी मुझे गलत समझती हैं. पर..'

 

नानी ने बीच में कहा-'उस दिन घर जाने के बाद मैंने सोचा और तब मुझे लगा कि देवन को सच में रोज उस तरह साफ़ सफाई से तैयार करना चाहिए जैसे तुमने किया था. सच कहूँ तो मैंने कभी किसी बच्चे को तुम्हारी तरह तैयार करके स्कूल नहीं भेजा.. 'फिर कहा-'तुम्हारी नौकरी तो छूट गई.अब क्या करोगी?'अच्छा हो अपने बेटे के पास चली जाओ.'

 

मीठी मास्टरनी ने इंकार में सिर हिला दिया –मैं एक विमल के लिए इतने सारे बच्चों का प्यार नहीं छोड़ सकती. इन सबमें मुझे अपना पोता विमल ही तो नज़र आता है. रोटी की परेशानी नहीं होगी. मुझे कपडे सीना अच्छी तरह आता है. जैसे तैसे गुज़ारा हो ही जाएगा.'

 

क्या सचमुच मीठी मास्टरनी बच्चों से इतना प्यार करती थी जो वैसे उनके कुछ न होकर भी सब कुछ थे. इसके बाद मैं कई बार नानी के साथ मीठी मास्टरनी के घर गया,वे दोनों आपस में खूब बातें करती थीं हर बार नानी उन्हें यही सलाह दिया करती थीं कि  वह अपने बेटे के पास चली जाएँ ,यहाँ अकेली न रहें . पता नहीं क्यों नानी की यह बात मुझे बुरी लगती थी.

 

और फिर  एक दिन मैं नानी के साथ उनके घर गया तो वहां ताला लगा था. पता चला  उनके बेटे की तबियत खराब है इसीलिए चली गई हैं. इसके बाद मैंने उनको  कभी नहीं देखा. मैं सोचता था-'क्या विमल के प्यार में वह हम बच्चों को भूल गई हैं. मेरा काफी समय गली लेहसवा में बीता. वर्ष १९९३ में मेरा परिवार पटपड़गंज आ गया, इतना समय बात जाने पर भी मैं मीठी मास्टरनी को आज तक नहीं भूल सका हूँ.( समाप्त)

Sunday, 9 May 2021

चिडि़यों की टोली- कहानी-देवेंद्र कुमार

 

चिडि़यों की टोली- कहानी-देवेंद्र कुमार

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  चिडि़यों की टोली उतरती है दोपहर में एक बजे। स्कूल बस ग्लोरी अपार्टमेंट्स के सामने रुकती है। सबसे पहले रजत की आवाज गूंजती है, ‘‘दादी, हम आ गए।’’ हम यानी ग्लोरी अपार्टमेंट्स के फ्लैटों में रहने वाले बच्चे भले ही अलग-अलग हैं, पर दादी सबकी एक हैं। उन्होंने ही बच्चों को नाम दिया है-चिडि़यों की टोली।

 

दादी यानी उमा देवी हंसती हुई सबको एक-एक थैली पकड़ाती हैं। ‘‘आज मैंने तुम्हारी मनपसंद मिठाई बनाई है। शाम को आना नई कहानी सुनाएंगे तुम्हारे बाबा।“

 

बच्चों के बाबा हैं उमादेवी के पति अजयसिंह। वह भी एक तरफ खड़े हंस रहे हैं।उमादेवी और अजयसिंह एक फ्लैट में अकेले रहते हैं। उनके दो बेटे हैं-श्यामल और सुरेश। दोनों अपने-अपने परिवार के साथ अमरीका जाकर बस गए हैं। बीच में जब भारत आते हैं तो माता-पिता से एक बार जरूर कहते हैं-‘‘यहां क्या रखा है? अमरीका चलकर रहिए न।’’ दोनों चुप रहते हैं-यानी उत्तर साफ है कि उन्हें कहीं नहीं जाना। दादी और बाबा चिडि़यों की टोली को कैसे छोड़ें! उनका यह मौन उत्तर घर के नौकर बिलासी  को भी अच्छा लगता है। आखिर वह कहां जाएगा उमादेवी और अजयसिंह के अमरीका जाने के बाद?

 

एक दिन उमादेवी ने बच्चों के लिए मिठाई के छोटे-छोटे लिफाफे तैयार किए। लेकिन तभी उनके पेट में दर्द शुरू हो गया। अजयसिंह तुरंत डॉक्टर से दवा लेने चले गए।

 

एक बजे स्कूल बस सोसायटी के मुख्य द्वार के सामने रुकी। रजत ने पुकारा, ‘‘दादी, हम आ गए?’’

 

‘‘दादी कहां हैं?’’ नागेश ने इधर-उधर देखते हुए कहा।

 

 

बच्चे कुछ देर अपार्टमेंट के मुख्य द्वार पर खड़े रहे, फिर धीरे-धीरे दादी के फ्लैट की तरफ बढ़े।

 

‘‘दादी, क्या बात है?’’ रजत की आवाज आई तो उमादेवी झट उठ बैठीं। ‘‘जरा पेट में दर्द हो गया। तुम्हारे बाबा जल्दी घबरा जाते हैं, झट डॉक्टर से दवा लेने चले गए।‘’ तभी अजयसिंह हड़बड़ाए से अंदर घुसे, ‘‘अब दर्द कैसा है?’’ देखा उमादेवी बच्चों से घिरी बैठी हंस रही हैं। वह भी हंस दिए, ‘‘तो यह क्यों नहीं कहा कि चिडि़यों की टोली को बुला लाओ। मैं डॉक्टर के पास न जाकर स्कूल चला जाता।’’

 

एक सप्ताह बाद की बात है। एक सुबह उमादेवी चाय पीकर प्याला रसोईघर में रखने गईं तो फिर बाहर न आई। अजयसिंह ने जाकर देखा, फर्श पर बेहोश पड़ी थीं। तुरंत बिलासी डॉक्टर को बुला लाया, लेकिन उमादेवी फिर न उठीं। बच्चों को दोपहर की मिठाई खिलाने से पहले ही सदा के लिए चली गईं।

 

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एक बजे स्कूल बस आकर रुकी। रजत ने आने की खबर दी, ‘‘दादी, हम आ गए!’’दादी के फ्लैट के नीचे भीड़ जमा थी। रजत ने देख लिया बाबा चुपचाप बैठे थे। दादी कहां है?’ वह सोच रहा था।

 

शाम को बच्चों ने दादी को सदा के लिए जाते देखा। वे सब एक झुंड में एक तरफ चुप खड़े थे।

बिलासी ने सब-कुछ बता दिया। ‘‘बाबू तो एकदम चुप हो गए हैं। किसी से कुछ नहीं बोलते।’’

 

‘‘खाना खाते हैं?’’ अणिमा ने पूछा।

 

बिलासी ने सिर हिला दिया। बोला, ‘‘सबके कहने पर थाली के सामने बैठ जरूर जाते हैं, पर खाते कुछ नहीं।’’

 

उस शाम रजत ने अपने साथियों को बुलाया और कहा, ‘‘हमें एक बार बाबा के पास जरूर जाना चाहिए।’’

 

रजत बिलासी से उनके बारे में पूछता रहता था। खुद बिलासी ही आकर बता जाता था कि ‘‘आज बाबू ने चाय नहीं पी, खाना भी नहीं खाया। रात को जब-जब आंख खुली तो उन्हें कमरे में अम्माजी की तस्वीर के सामने खड़े पाया, जैसे उनसे बात कर रहे हों।’’

 

एक सुबह बस बच्चों को लेकर ग्लोरी अपार्टमेंट्स से चली तो रजत ने चिल्लाकर कहा, ‘‘मैंने बाबा को देखा था। दरवाजे से दूर एक खंभे के पीछे खड़े हुए थे।’’

 

 ‘‘बाबा को भला छिपकर खड़े होने की क्या जरूरत है? क्या वह आकर दरवाजे पर खड़े नहीं हो सकते?’’ अनामिका ने रजत से कहा।

 

‘‘हमसे बात क्यों नहीं करते?’’ रमेश बोला।

 

‘‘अगर यह बात है तो हमने ही उनसे कब बात की है। वह अकेले हो गए हैं, परेशान हैं। हम ही उनके पास कितनी बार गए?’’ रजत ने कहा।

 

दोपहर में बस दरवाजे पर रुकी। रजत की तेज नजर ने बाबा को खंभे की आड़ में खड़े देख लिया था।

 

अजयसिंह सुबह बच्चों को स्कूल जाते समय और दोपहर में लौटते समय खंभे की ओट में छिपकर देखा करते थे।

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अगली सुबह बस घुरघुराती हुई चली गई। खंभे के पीछे खड़े अजयसिंह अंदर जाने के लिए मुड़े तो सब बच्चे उनके सामने मौजूद थे, एकटक देखते हुए।

 

अजयसिंह हड़बड़ा गए। इधर-उधर देखने लगे।

 

‘‘आज हमने चोरी पकड़ ली।’’ रजत ने रमेश की तरफ मुड़कर कहा।

 

 ‘‘चोरी!’’ अजयसिंह के मुंह से बस एक ही शब्द निकल सका। फिर बोले,‘‘लेकिन तुम सब आज स्कूल क्यो नहीं गए?

 

‘‘आपको पकड़ने के लिए ही हमने यह योजना बनाई थी, बाबा!’’ रजत ने कहा।

 

‘‘हां, आप दादी की तरह मेन गेट पर भी तो खड़े हो सकते हैं। यह लुका-छिपी क्यों?’’ अनामिका कह रही थी।

 

‘‘दादी की तरह...?’’ अजयसिंह की आंखों से आंसू बह चले।

 

 

बच्चे उन्हें घेरकर खड़े हो गए। ‘‘बाबा, आप रोते क्यों हैं?’’ नन्हे संतोष ने कहा और उनका हाथ पकड़कर हिलाने लगा। रजत ने कहा, ‘‘हमें पता है आप सुबह चाय भी नहीं पीते। रात को कमरे में घूमते रहते हैं...क्यों?’’ बाबा हैरान! बच्चे सच कह रहे हैं कि चाय छोड़ दी, खाने का मन नहीं करता और रात में नींद भी नहीं आती। पर बच्चों को यह सब कैसे पता? उन्हें क्या मालूम था कि बिलासी उनकी पूरी दिनचर्या का हिसाब बच्चों को बता देता था।

 

कुछ देर बाद दादी की चिडि़यों की टोली बाबा अजयसिंह के साथ बड़े कमरे में बैठी चहचहा रही थी, जहां दादी की हंसती हुई तस्वीर लगी थी।

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थोड़ी देर में अपर्णा अपनी सहेलियों के साथ चाय व नाश्ता बाबा के सामने ले आई।

 

‘‘और तुम लोग?’’ बाबा ने पूछा।

 

‘‘अब दादी तो हैं नहीं जो हमें मिठाई खिलाएं। आपको मिठाई बनानी नहीं आती तो...चाकलेट और टाफियां ही दे दीजिए हमें, लेकिन रोज देनी होंगी।’’ रजत मुस्करा रहा था।

 

‘‘कौन कहता है कि मैं मिठाई बनाना नहीं जानता, कुछ मिठाइयां तो तुम्हारी दादी को मैंने ही सिखाई थी,’’ कहकर बाबा हंस पड़े।

 

‘‘तो बनाकर खिलाइए।’’ अपर्णा ने कहा।

 

चिडि़यों की टोली चहचहा रही थी। रजत बोला, ‘‘बाबा, आप सुबह उठते ही चाय पीकर हमें स्कूल के लिए छोड़ने बाहर आएंगे।’’ अपर्णा बोली, ‘‘दिन में सही समय पर नाश्ता करेंगे।’’ संतोष बोला, ‘‘दोपहर में आप हमें दादी की तरह सोसायटी के दरवाजे पर मिलेंगे।’’ अणिमा बोली,‘‘दोपहर का भोजन हमारे साथ करेंगे आप।’’

 

‘‘और हां, इस तरह खंभे के पीछे छिपकर नहीं देखेंगे।’’ रजत बोला।

 

बच्चों की बातें सुन अजयसिंह जोर से हंस पड़े-शायद बहुत दिन बाद पहली बार. “ ठीक है, अब ऐसी गलती नहीं होगी।’’

 

‘‘बाबा मान गए...’’ शोर मचाते, धम-धम करते बच्चे नीचे उतर गए।

 

अगली दोपहर स्कूल बस आकर रुकी तो बस का दरवाजा बाबा ने खोला। चिडि़यों की टोली चहचहा रही थी, ‘‘रात का खाना खाया? नींद ठीक से आई?’’

 

बाबा मुस्करा उठे, उन्होंने जवाब देने के बाद सवाल दाग दिए, ‘‘नाश्ता किया? होमवर्क मिला? डांट तो नहीं खाई?’’

 

हर बच्चे को लिफाफा थमाते समय बाबा यह कहना नहीं भूले, ‘‘मिठाई मैंने अपने हाथों से बनाई है। बिलासी ने मेरी कोई मदद नहीं की।’’

 

दादी गई नहीं थी, बाबा में लौट आई थीं। ( समाप्त )