Thursday, 6 September 2018

फूलों की किताब--देवेन्द्र कुमार--कहानी बच्चों के लिए


फूलों की किताब—देवेन्द्र कुमार—कहानी बच्चों के लिए
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==कैसी होती है फूलों की किताब?क्या उसे भी दूसरी पुस्तकों की तरह पढ़ा जा सकता है? बच्चे इस किताब को पढना चाहते हैं,लेकिन पढ़ायेगा कौन?==  

       अमर हाउसिंग सोसाइटी में आज विशेष समारोह था। सब तरफ गहमागहमी और भागदौड़ थी| और क्यों न हो, हाल ही में अमर सोसायटी को विशेष पुरस्कार मिला था-- इलाके में सर्वश्रेष्ठ उद्यान के रख-- रखाव के लिए। इनाम में सरकार की तरफ से एक ट्राफी और नकद दिया गया था। सचमुच सोसाइटी के उद्यान की सुंदरता देखते ही बनती थी। करीने से कटी-छंटी हरी घास जो गुदगुदे कालीन जैसी लगती थी। सब तरफ क्यारियों व गमलों में रंग-बिरंगे फूलों की बहार थी।
       जब से सोसाइटी के उद्यान को पर्यावरण पुरस्कार मिला था, रामबरन की इज्जत बढ़ गई थी। वह सोसाइटी का मेहनती माली था जो हर समय घास और फूलों की देखरेख में लगा रहता था। उसे कड़ी धूप में पसीने से तर बतर काम में लगे देखा जा सकता था।
       लेकिन सोसाइटी के बच्चों के लिए यह पुरस्कार एक आफत ही बन गया जैसे। शाम को बच्चों की टोली बाग में रोज धमाचौकड़ी मचाया करती थी। वे फुटबाल और क्रिकेट भी खेला करते थे। पर उस शाम बच्चे बाग में आए तो वहां दो गार्ड मौजूद थे। जैसे ही बच्चों ने फुटबाल उछालनी शुरु की, गार्डों ने टोका-अब बाग में फुटबाल नहीं खेली जाएगी।
       क्यों?” अजय ने पूछा। वह बच्चों की टोली का लीडर था। बच्चे उस की अगुआई में रहते थे।
       क्यों का जवाब तो सोसाइटी के प्रेजीडेंट देंगे।एक गार्ड बोला- उन्हीं का हुक्म है।और उसने एक तरफ लगे बोर्ड की तरफ इशारा कर दिया। बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- बाग में फुटबाल खेलना मना है।
       यह बोर्ड शायद आज और अभी ही लगाया गया था। क्योंकि सुबह जब पुरस्कार समारोह हो रहा था, तब तो यह बोर्ड था नहीं।
       हम तो खेलेंगे।अजय ने गार्ड को झिड़क दिया और अपने साथियों को लेकर फुटबाल खेलने में जुट गया।
       गार्ड तो सोसाइटी के नौकर ठहरे। उन्होंने बच्चों से उलझना ठीक न समझा। जाकर सोसाइटी के प्रेजीडेंट से शिकायत कर दी। रमेश जी सोसाइटी के अध्यक्ष थे। कुछ देर बाद वह बाग में आ गए। उन्होंने कहा- बच्चो,
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 आपको स्कूल और घर-दोनों जगह नियमों का पालन करना चाहिए। अब हमारे उद्यान को पुरस्कार मिल गया है- इसलिए इसका विशेष ध्यान रखना होगा। फुटबाल खेलने से घास दब जाती है, क्यारियों में लगे फूल नष्ट हो जाते हैं। फुटबाल खेलनी है तो सोसाइटी से बाहर जाकर खेलो।
       वह अपनी बात कहकर चले गए। बच्चे समझ नहीं पाए कि वे क्या करें। क्योंकि अब तक तो वे हमेशा  बाग में ही खेलते आ रहे थे। हाँ, क्रिकेट खेलने पर जरूर झगड़ा होता था, क्योंकि बिजली की ट्यूब टूटती थीं और खिड़कियों के शीशे क्रैक हो जाते थे।
       बच्चे समझ गए कि अब वे बाग में फुटबाल नहीं खेल पायेंगे। वे फुटबाल बीच में रखकर झुण्ड के रूप में बैठ गये। तभी अमित ने कहा- ऐसे बात नहीं बनेगी। हमें कुछ करना होगा।
       क्या करना होगा?”-- रजत ने पूछा।
       सत्याग्रह करना होगा और क्या। पता है न बापू ने सत्याग्रह करके ही अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। हमें भी वही करना चाहिए।
       बस बच्चों का सत्याग्रह शुरु हो गया। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा, शोर नहीं मचाया, नारे भी नहीं लगाए, बस फुटबाल बीच में रखकर चुपचाप बैठ गए। बच्चों को इस तरह चुप बैठे देखकर सब हैरान थे। क्योंकि वे तो जितनी देर बाग में रहते थे, धमाचौकड़ी मचाते ही रहते थे, एक पल को भी खामोश नहीं बैठते थे।
       बच्चों को यों चुप बैठे देखा तो बाबू रामदास वहां चले आए। वह स्कूल के रिटायर्ड प्रिंसिपल थे। वे बच्चों से प्यार करते थे और बच्चे भी उनका सम्मान करते थे। रामदास बच्चों के पास आ खड़े हुए। बीच में रखी फुटबाल की ओर देखा। बोले-- आज तुम्हारी टोली खामोश क्यों है?”
       हमें खेलने से मना कर दिया है। इसलिए हम खेलेंगे नहीं।-- अमित ने कहा।
       तो क्या करोगे?”- - रामदास ने पूछा।
       सत्याग्रह।-- जवाब मिला। हम फुटबाल की शोक सभा कर रहे हैं।
       क्यों?”
       फुटबाल मर गई है इसलिए।-- बच्चों ने कहा।
       फुटबाल कभी नहीं मरेगी और बच्चे भी जरूर खेलेंगे।-- रामदास ने कहा।
       लेकिन कैसे?”-- अमित ने पूछा। रामदास की बात उसकी समझ में नहीं आ रही थी।
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       देखो, तुम फुटबाल लेकर कहीं भी जा सकते हो। दूर या पास के मैदान में कहीं भी, लेकिन फूलों के तो पैर हैं नहीं। वे चोट खाकर भी अपनी जगह खड़े रहने के लिए मजबूर हैं।
       फूल घायल, लेकिन कैसे?”-- कई बच्चों ने एक साथ जानना चाहा।
       आओ मेरे साथ।-- और रामदास बच्चों की टोली को बाग के कोने में ले गए। उन्होंने एक पौधे की तरफ इशारा किया। वहां एक पौधा झुका हुआ था, उसकी एक टहनी बीच से टूट गई थी। कई फूल भी टूटकर गिर गए थे।
       ‘’यह है तुम्हारी फुटबाल की करतूत।‘’-- रामदास ने कहा-- इसीलिए कह रहा हूँ कि फुटबाल को फूलों से दूर ले जाओ तो अच्छा रहेगा। तुम्हें खेलने से कोई नहीं रोकता। फूल बोल नहीं सकते इसलिए उनकी ओर से किसी को तो बोलना चाहिए।-- रामदास ने कहा और फूलों के पौधे के पास जमीन पर बैठ गए। फिर बोले-- अब जरा फूलों की फर्स्ट एड हो जाए।और हंस दिए।
       फूलों की फर्स्ट एड!-- बच्चों की आवाज में अचरज था| वे रामदास को देख रहे थे। रामदास ने जेब से एक डोरी निकाली, फिर जमीन पर पड़ी एक डंडी उठाकर उसके सहारे से टूटी हुई टहनी को बाँधकर सीधा कर दिया| फिर जमीन पर पडे़ फूलों को नीचे की मिट्टी में दबा दिया।
       अमित ने कहा-- सर, आपने ठीक कहा। कल जब हमने शाट मारा था तो फुटबाल इसी कोने में आकर गिरी थी। उसी की चोट से डाली झुक गई है। यह तो सचमुच गलत हुआ।
       रामदास ने कहा- बच्चो, जो बीत गया, उस पर पछताने से कुछ नहीं होगा। पर मैं चाहता हूँ तुम फुटबाल के शोक में सत्याग्रह न करो। कल शाम को मैं तुम्हें पीछे वाले मैदान में ले चलूंगा। बड़े मैदान में तुम मजे से फुटबाल खेल सकते हो। हां, एक बात और है।
       वह क्या?”- -बच्चों ने पूछा।
       तुममें से कुछ बच्चों ने स्कूल में फर्स्ट एड की ट्रेनिंग जरूर ली होगी। वैसा ही कुछ यहां भी करना होगा।
       पर वह फर्स्ट एड फूलों पर कैसे काम करेगी?”-- अमित ने कहा।
       उसी तरह जैसे मैंने किया है।रामदास बोले-- तुम फुटबाल मैदान में खेलो, पर फूलों का भी ध्यान रखो। तेज हवा में, किसी का पैर लगने से, कोई भारी चीज गिरने से फूलों को चोट लगती है। वे घायल हो जाते हैं, पर वे बोल नहीं सकते। इसलिए हम पौधों और फूलों की तकलीफ नहीं समझ पाते।
       बच्चों का झुण्ड चुपचाप रामदास जी की बात सुन रहा था।
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       रामदास ने फिर कहा- स्कूल में तुम किताबें पढ़ते हो, पर एक किताब फूलों और पौधों की भी होती है। उसे भी पढ़ना सीखो, और इसमें तुम्हारी मदद करेगा रामबरन माली। उसे पेड़-पौधों के बारे में बहुत सी बातें पता है। वह तुम्हें इनके बारे में नई-नई जानकारियां दे सकता है।
       बच्चों ने देखा अपना नाम सुनकर पास खड़ा माली रामबरन हंस रहा था।
       हम खाली समय में खेलेंगे और अपना थोड़ा समय फूलों को भी देंगे। क्यों रामबरन भैया?”-- अमित बोला।
       हां, बच्चा लोगों। अगर तुम चाहो तो मैं फूलों के बारे में बहुत सी जानकारी दे सकता हूँ।-- रामबरन माली ने कहा।
       बच्चों ने सत्याग्रह वापस ले लिया। अब उन्हें फुटबाल का शोक मनाने की जरूरत नहीं थी। अगली शाम मास्टर रामदास बच्चों को बड़े मैदान में ले गए। वहां उन्होंने जमकर फुटबाल के खेल का आनन्द लिया। सब बच्चे बहुत खुश थे।
       खेलने के बाद बच्चे सोसाइटी लौटे तो सीधे रामबरन माली के पास गए। बोले-माली काका, फुटबाल का पीरियड खत्म, अब आप हमें फूलों और पेड़-पौधों की किताब पढ़ाइए।
       जरूर पर आप सबको मुझे पेड़-पौधों का मास्टर कहना होगा।
       जरूर कहेंगे फूलों के मास्टर रामबरन भैया।-- बच्चों ने एक साथ कहा तो रामबरन और मास्टर रामदास हंस पड़े। बच्चे तालियां बजा रहे थे। उन्हें पढ़ने के लिए फूलों की किताब जो मिल गई थी।( समाप्त)  
      


Monday, 27 August 2018

पूरी बाबा --देवेन्द्र कुमार--कहानी बच्चों के लिए


पूरी बाबा---देवेन्द्र कुमार—कहानी बच्चों के लिए

===वे कौन से बच्चे हैं जो जूठन में अपने लिए खाना बीनते हैं? पहले लोग गरमागरम हलवा—पूरी की दावत उड़ायें और फिर बिखरी गंदगी के बीच बच्चे आपस में छीना झपटी करें ====    

आज रविवार है और धनराज हलवाई को एकदम फुरसत नहीं है। पहला कारण है रविवार को ज्यादातर घरों में नाश्ता धनराज की दुकान से आता है। और दूसरा उससे भी बड़ा कारण है हर रविवार को मोहल्ला समिति द्वारा लंगर का आयोजन। लंगर में परोसी जाने वाली पूरी-सब्जी और हलवा धनराज की दुकान पर ही तैयार होता है। लंगर में आसपास के रिक्शावाले, कामगार तथा और भी बहुत से लोग आ जुटते हैं। इसलिए रविवार के दिन धनराज की दुकान के आसपास भीड़ जमा हो जाती है।
लंगर या मुफ्त भोजन सुबह दस बजे से बारह बजे तक चलता है. उसके बाद एकदम सन्नाटा छा जाता है। दूर-दूर तक जूठन तथा प्लास्टिक  की गंदी प्लेटें बिखर जाती हैं। देखने में बुरा लगता है, पर कोई उपाय नहीं, क्योंकि सफाई करनेवाला शाम को ही आता है । बिखरी जूठन और गंदी प्लेटों के ढेर पर कुत्ते मुंह मारते हैं। कई बच्चे उनमें से अपने खाने का सामान जुटा लेते हैं-अधखाई पूरियां और बचा खुचा हलवा.  
रामदास बाबू पास ही रहते हैं। उन्हें हर रविवार को होनेवाले लंगर के बाद फैली गंदगी बुरी लगती है। उन्होंने कई बार धनराज से शिकायत की है। उन्होंने प्लेटों से जूठन चुगते बच्चों को भी डांटकर भगाया है, लेकिन सब कुछ वैसे ही चल रहा है।
पिछले रविवार को रामदास बाबू गली से निकले तो देखा कई बच्चे जूठन बीनकर खा रहे हैं और आपस में लड़ रहे हैं। ये बच्चे उन कामगारों के हैं जो सुबह काम पर निकल जाते हैं। एक छोटी बच्ची आपस में लड़ते बच्चों से दूर खड़ी रो रही थी। रामदास बाबू झुककर उसके पास बैठ गए। पूछा, ‘‘बेटी, रो क्यों रही हो?’’
बच्ची ने सुबकते हुए कहा, ‘‘उसने मेरी पूरी छीन ली। मुझे भूख लगी है।’’ वह बच्चों के झुंड की तरफ इशारा कर रही थी। वहां जूठन के लिए अभी भी छीना-झपटी चल रही थी। पता नहीं वह बच्ची किसकी शिकायत कर रही थी। रामदास बाबू बच्ची का हाथ पकड़कर धनराज हलवाई की दुकान पर ले गए। उससे कहा, ‘‘इस बच्ची को कुछ खाने के लिए दो।’’ धनराज ने एक पत्ते पर दो पूरियां और हलवा रखकर बच्ची को दे दिया। वह वहीं बैठकर खाने लगी। तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ आया और बच्ची के हाथ से पूरियां छीनकर भाग गया। बच्ची ने फिर से रोना शुरू कर दिया।
रामदास बाबू ने जूठन पर लड़ते बच्चों के झुंड की तरफ देखा, पर उस बच्चे का पता न चला जो पूरियां छीनकर भाग गया था। उन्होंने धनराज की तरफ देखा तो उसने बच्ची को फिर से दो पूरियां दे दीं। इस बार रामदास बाबू उसके पास सावधान खड़े रहे ताकि कोई दोबारा उसकी पूरियां न छीन सके। तभी धनराज हलवाई ने कहा, ‘‘बाबूजी, यह तो हर रविवार का तमाशा है। भीड़ में बच्चों की कोई नहीं सुनता, इसलिए ये बेचारे जूठन बीनकर ही संतोष कर लेते हैं। बच्चों की छोडि़ए, यहां तो बड़े लोग भी मारपीट, धक्का-मुक्की करते हैं मुफ्त की दावत के लिए।’’
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रामदास ने धनराज की बात का जवाब न दिया। उनकी आंखें अब भी जूठी प्लेटों में अपने लिए जूठन बीनते बच्चों की ओर लगी थीं। वह बढ़कर बच्चों के झुंड के पास जा खड़े हुए। बोले, ‘‘पूरी हलवा खाओगे?’’ उनकी बात सुनकर झुंड से आवाज आई, ‘‘पूरी हलवा-पूरी हलवा।’’
‘‘तो चलो हलवाई की दुकान पर, लेकिन पहले जूठन फेंक दो।’’ रामदास बाबू ने कहा। बच्चे दौड़कर हलवाई की दुकान पर जा खड़े हुए. वे चिल्ला रहे थे-‘‘पूरी हलवा-पूरी हलवा।’’’ रामदास बाबू ने धनराज से कहा,‘‘इन बच्चों के लिए गरम पूरियां बना दो।’’
धनराज पूरी बनाने लगा। रामदास बाबू ने कहा, ‘‘बच्चो, जरा देखो तो सब तरफ कितनी गंदगी फैली है। पहले हम सफाई करेंगे, फिर पूरी हलवा खाएंगे।’’ रामदास बाबू ने धनराज से दो बड़े काले बैग ले लिए और फिर जूठी प्लेटें उनमें डालने लगे। इस काम में बच्चों ने भी हाथ बंटाया। थोड़ी ही दूर में दूर-दूर तक फैली गंदी प्लेटें और जूठन उन थैलों में समा गई। अब वहां गंदगी नहीं थी।
‘‘पूरी हलवा, पूरी हलवा।’’ बच्चों का झुंड चिल्लाया।
रामदास बाबू ने कहा-‘‘क्या गंदे हाथों से पूरी-हलवा खाओगे। पहले हाथ साफ करो।’’ उन्होंने कहा तो दुकान का नौकर आकर बच्चों के हाथ धुलाने लगा। फिर उसने अपना अंगोछा आगे बढ़ा दिया। बच्चे धुले हाथ पोंछने लगे।
तब तक गरम पूरियां तैयार हो गई थीं। उन्होंने धनराज से कहा तो उसने नौकर से दरी मंगवा दी। दुकान के पास दरी बिछ गई। अब गरम पूरी और हलवे की बारी थी। बच्चे बैठकर चुपचाप भोजन कर रहे थे। आते-जाते लोग हैरानी से देख रहे थे। रामदास बाबू घूम-घूम कर बच्चों से पूछ रहे थे और धनराज का नौकर परोसता जा रहा था।
बच्चों की दावत खत्म हुई। अब वे एक तरफ खड़े रामदास बाबू की ओर देख रहे थे।
रामदास बाबू ने कहा, ‘‘बच्चो, जाने से पहले अपनी जूठन तो साफ करो।’’ बच्चों ने अपनी-अपनी जूठी प्लेट उठाई और काले बड़े बैग में डाल दी। इसके बाद दुकान के नौकर ने बच्चों के हाथ धुला दिए।
तभी एक बच्चे ने कहा, ‘‘अब पूरी कब मिलेगी?’’
रामदास बाबू हंस पड़े। उन्होंने कहा, ‘‘अगली दावत अगले रविवार को  होगी । लेकिन एक शर्त है-- तुम सब जूठी प्लेटों से अपने लिए खाना नहीं चुनोगे।’’
‘‘नहीं लेंगे। हम गरम पूरी खाएंगे।’’ बच्चों ने एक स्वर में कहा। वे हंस रहे थे। धीरे-धीरे बच्चे इधर-उधर बिखर गए। अब वहां न जूठी प्लेटें थीं, न जूठन चुगते हुए बच्चे। कहीं गंदगी नहीं थी।
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रामदास बाबू ने धनराज को पैसे दिए तो उसने कहा, ‘‘बाबूजी, यह आपने क्या मुसीबत मोल ले ली। अब हर रविवार को ये बच्चे आपको परेशान करेंगे।’’ रामदास बाबू ने कहा, ‘‘जब मोहल्ला समिति बड़ों के लिए लंगर लगाती है तो बच्चों की दावत क्यों नहीं? वे जूठी प्लेटों से जूठन क्यों बटोरें। और हां, तुम यहां एक बड़ा डस्टबिन रखवा दो। ग्राहको से कहो कि जूठे दोने डस्टबिन में डाला करें। मैं मोहल्ला समिति से बात करूंगा कि वे केवल भोजन का ही प्रबंध न करें, बाद में सफाई भी करवाएं। अगर यहां जूठन न बिखरी होती तो बच्चे अपनी भूख मिटाने के लिए  जूठी प्लेटों में कभी खाना न ढूंढ़ते?’’
अगला रविवार आया। सब कुछ पहले की तरह हुआ। लेकिन उस दिन वहां जूठी प्लेटें नहीं बिखरी थीं। बड़ों का लंगर खत्म होने के बाद रामदास बाबू ने बच्चों की दावत का आयेाजन किया। खाना खत्म होने के बाद उन्होंने बच्चों से पूछा, ‘‘दावत तो हो गई, अब क्या करोगे?’’
‘‘हम तो खेलेंगे।’’
‘‘ठीक है तो आज मैं भी खेलूंगा तुम सबके साथ।’’ रामदास बाबू बच्चों के झुंड को बाग में ले गए। वहां बच्चों का झुंड उन्हें घेर कर बैठ गया। वे बच्चों को कहानी सुनाने लगे। उन्हें बहुत सी कहानियां याद थीं। लेकिन सुनाने के लिए इतने सारे बच्चे तो पहली बार मिले थे। बच्चे कहानी में रम गए थे।
रामदास बाबू कुछ और भी सोच रहे थे-जैसे क्या इन बच्चों के लिए पढ़ाई का प्रबंध किया जा सकता है? उनके दिमाग में कई योजनाएं घूम रही थीं। हर योजना के बीच बच्चे थे-जिन्हें ये कभी जूठन में खाना नहीं ढूंढ़ने देंगे।
                                                                            ( समाप्त )
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Wednesday, 22 August 2018

रोटी ने कहा --देवेन्द्र कुमार-- कहानी बच्चों के लिए







रोटी ने कहा—देवेन्द्र कुमार—कहानी-- बच्चों के लिए
क्या रोटी भी बोलती है? क्या पता, मैंने तो कभी उसे बोलते हुए नहीं सुना,
तब भोलू के कानों ने किसकी आवाज़ सुनी थी ?   

ढाबे में सुबह से आधी रात तक हाड़ तोड़ मेहनत करते हुए भोलू लगातार एक ही बात सोचता रहता है-आखिर मालिक रामदीन उसी पर इतना गुस्सा क्यों करता है! भोलू को उसका चाचा रामदीन के पास छोड़ गया था. भोलू की माँ गाँव में अकेली रहती है. भोलू के पिता नहीं रहे, रोटी का जुगाड़ मुश्किल था. ऐसे में भोलू स्कूल जाने की जिद करता था. माँ ने भोलू के चाचा  से कहा, जो शहर में नौकरी करता था. चाचा उसे अपने साथ ले तो आया पर घर में नहीं रखा, सीधा रामदीन के ढाबे पर ले गया. उन दोनों में  क्या बात हुई कोई नहीं जानता. रामदीन को बिना पैसे का नौकर मिल गया. भोलू को सुबह से रात तक काम और सिर्फ काम करना पड़ता था. जब जो मिलता उसी से पेट भर कर ढाबे के अन्दर ही रात बिताता था.

भोलू का मन माँ से मिलने का होता तो रो कर काम में  लग जाता. उसका चाचा जब रामदींन से मिलने आता तो भोलू उससे माँ से मिलने की बात कहता. वह घुड़क कर चुप करा देता. कहता –‘तूने उसे बहुत परेशान कर रखा था, इसीलिए उसने तुझे यहाँ भेजा है. मन लगा कर काम किया कर.’ रामदीन उसकी शिकायत करता. भोलू ने एक- दो प्लेटें तोड़ दी थीं. उसने भोलू को बहुत मारा था. कहा था –‘ मैं तेरे पैसे भी तो नहीं काट सकता.’ कारण था कि पगार के  नाम पर तो भोलू को एक पैसा भी नहीं मिलता था. इसलिए किसी भी टूटफूट के दाम उसे पिट कर ही चुकाने पड़ते थे. ढाबे में और भी कई छोकरे काम करते थे. पर उन्हें इतना कष्ट नहीं सहना पड़ता था. क्योंकि उनसे हुए नुक्सान की भरपाई उनके वेतन से कटौती करके हो जाती थी. एक-दो लड़के काम छोड़ कर चले भी गए थे. इसलिए रामदीन उनसे ज्यादा कुछ  नहीं कहता था. भोलू ही अलग थलग पड़ गया था.

वह कुछ नहीं कर सकता था. एक दिन भोलू आटा गूंध रहा था, तभी रामदीन आकर उसे  मारने लगा. कोई कुछ नहीं समझ सका. असल में भोलू का चाचा आकर रामदीन से पैसे मांग रहा था. उसने कहा कि भोलू के बदले में कुछ तो मिलना ही चाहिए. रामदीन ने कह सुनकर चाचा को भगा दिया, और फिर आकर भोलू को पीटने लगा. बेचारा भोलू ! वह कुछ समझ नहीं सका. रोता हुआ आटा गूंधने का काम करता रहा. बहते आंसू टप टप आटे में टपकते रहे. फिर तो यह हरकत कई बार दोहराई गई. भोलू रोकर अपने मन को शांत कर लेता. एक दिन भोलू का चाचा फिर पैसे मांगने आया. उस दिन तो हद ही हो गई. रामदीन ने भोलू को खूब मारा. पिटने के  बाद भोलू आंसू पोंछ कर फिर से काम में लग गया. आंसू टपकते रहे.

खाना तैयार था, ग्राहक खाना खाने लगे. तभी ढाबे में शोर मच गया, ग्राहक खाना फेंकने लगे. वे कह रहे थे कि रोटियाँ कडवी हैं. रामदीन घबरा गया. उसने ग्राहकों को शांत करना चाहा, फिर खुद भी रोटी का एक
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 टुकड़ा खाकर देखा. अरे यह क्या! रोटी सचमुच बहुत कडवी थी. उसने नौकरों से तुरंत ताज़ी रोटियाँ बनाने को कहा. लेकिन ताज़ी रोटियां भी कडवी थीं. सारे  ग्राहक जोर जोर से चीखते, गालियाँ बकते हुए चले गए. बाज़ार में शोर मच गया. उस शाम रामदीन के ढाबे पर कोई ग्राहक नहीं आया. रामदीन बुरी तरह घबरा गया. उसने दूकान में रखा सारा आटा फिकवा दिया. आटे की नई बोरी लाया. फिर भोलू के गालों पर चपत लगाते हुए बोला-‘ शैतान, तूने जरूर कोई गलत चीज़ मिला दी होगी आटे में .’ उस दिन भोलू के बदले किसी और. नौकर ने आटा गूंधा. रोटियाँ बन कर तैयार हुईं तो सबसे पहले रामदीन ने एक टुकड़ा खाकर देखा. फिर तुरंत थूक भी दिया, मुंह कड़वा हो गया. देर तक पानी से कुल्ला करता रहा पर मुंह की कडवाहट दूर न हुई. रामदीन ने नई नई दुकानों से आटा मंगवा कर देख लिया पर वहाँ बनने वाली रोटियों का स्वाद कड़वा ही रहा.
भूत प्रेत का चक्कर समझ कर सारे नौकर भाग गए. खुद रामदीन का भी पता नहीं था. शाम हो गई. भोलू ढाबे में अकेला बैठा था. एक तरफ सुबह बनी रोटियाँ पड़ी थीं. भोलू ने दो दिन से कुछ नहीं खाया था. उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ कर मुंह में डाल लिया. अरे यह क्या! मुंह में अजीब मिठास घुल गया. वह खाता गया.ऐसी मीठी रोटी तो उसने इससे पहले कभी नहीं खाई थी. भोलू के मुंह से निकला –‘ पर रोटियां तो कडवी थीं! फिर यह मीठी  रोटी!’ कानों में आवाज़ आवाज़ आई- आंसू से गीले आटे की रोटियाँ तो कडवी ही होंगी.   भोलू को लगा जैसे आवाज़ रोटी में से आ रही हो. वह खाता रहा. पता नहीं उसने कितने दिनों से भर पेट  रोटी नहीं खाई थी. पेट भर गया था, अब उसे नींद आ रही थी. कितना समय बीत गया था अध् जागी नींद के साथ भोलू का.  ( समाप्त )     


रोटी ने कहा-- देवेन्द्र कुमार--कहानी बच्चों के लिए



देवेन्द्र कुमार ,
e- 403 प्रिंस अपार्टमेंट्स, प्लाट नं 54 , पटपड़ गंज, दिल्ली- 110092 ,  
मो.- 9910140071
रोटी ने कहा—देवेन्द्र कुमार—कहानी-- बच्चों के लिए
क्या रोटी भी बोलती है? क्या पता , मैंने तो कभी उसे बोलते हुए नहीं सुना, तो फिर भोलू के कानों ने किसकी आवाज़ सुनी थी ?
   
ढाबे में सुबह से आधी रात तक हाड़ तोड़ मेहनत करते हुए भोलू लगातार एक ही बात  सोचता रहता है-आखिर मालिक रामदीन उसी पर इतना गुस्सा क्यों करता है. भोलू को उसका चाचा रामदीन के पास छोड़ गया था. भोलू की माँ गाँव में अकेली रहती है. भोलू के पिता नहीं रहे,रोटी का जुगाड़ मुश्किल था. ऐसे में भोलू स्कूल जाने की जिद करता था. माँ ने भोलू के चाचा  से कहा जो शहर में नौकरी करता था. चाचा उसे अपने साथ ले तो आया पर घर में नहीं रखा, सीधा रामदीन के ढाबे पर ले गया. उन दोनों में  क्या बात हुई कोई नहीं जानता. रामदीन को बिना पैसे का नौकर मिल गया. भोलू को सुबह से रात तक काम और सिर्फ काम करना पड़ता था. जब जो मिलता उसी से पेट भर कर ढाबे के अन्दर ही रात बिताता था.

भोलू का मन  माँ से मिलने का होता तो रो कर काम में लग जाता. उसका चाचा जब रामदींन से मिलने आता तो भोलू उससे माँ से मिलने की बात कहता. वह घुड़क कर चुप करा देता. कहता –‘तूने उसे बहुत परेशान कर रखा था, इसीलिए उसने तुझे यहाँ भेजा है. मन लगा कर काम किया कर.’ रामदीन उसकी शिकायत करता.  भोलू ने एक दो प्लेटें तोड़ दी थीं . उसने भोलू को बहुत  मारा था. कहा था –‘ मैं तेरे पैसे भी तो नहीं काट सकता.’ कारण था कि पगार के  नाम पर तो भोलू को एक पैसा भी नहीं मिलता था. इसलिए किसी भी टूटफूट के दाम उसे पिट कर ही चुकाने पड़ते थे. ढाबे में और भी कई छोकरे काम करते थे. पर उन्हें इतना कष्ट नहीं सहना पड़ता था. क्योंकि उनसे हुए नुक्सान की भरपाई उनके वेतन से कटौती करके हो जाती थी. एक-दो लड़के काम छोड़ कर चले भी गए थे. इसलिए रामदीन उनसे ज्यादा कुछ नहीं कहता था. भोलू ही अलग थलग पड़ गया था वह कुछ नहीं कर सकता था. एक दिन भोलू आटा गूंध रहा था, तभी रामदीन आकर उसे  मारने लगा. कोई कुछ नहीं समझ सका. असल में भोलू का चाचा आकर रामदीन से पैसे मांग रहा था. उसने कहा कि भोलू के बदले में कुछ तो मिलना ही चाहिए. रामदीन ने कह सुनकर चाचा को भगा दिया, और फिर आकर भोलू को पीटने लगा. बेचारा भोलू ! वह कुछ समझ नहीं सका. रोता हुआ आटा गूंधने का काम करता रहा. बहते आंसू टप-- टप आटे में टपकते रहे. फिर तो यह हरकत कई बार दोहराई गई. भोलू रोकर अपने मन को शांत कर लेता. एक दिन भोलू का चाचा फिर पैसे मांगने आया. उस दिन तो हद ही हो गई. रामदीन ने भोलू को खूब मारा. पिटने के  बाद भोलू आंसू पोंछ कर फिर से काम में लग गया. आंसू टपकते रहे.

    खाना तैयार था, ग्राहक खाना खाने लगे. तभी ढाबे में शोर मच गया, ग्राहक खाना फेंकने लगे. वे कह रहे थे कि रोटियाँ कडवी हैं. रामदीन घबरा गया. उसने ग्राहकों को समझा बुझा कर शांत करना चाहा ,फिर खुद भी रोटी का  एक 
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टुकड़ा खाकर देखा. अरे यह क्या! रोटी सचमुच बहुत कडवी थी. उसने नौकरों  से  तुरंत ताज़ी रोटियाँ बनाने को कहा. लेकिन ताज़ी रोटियां भी कडवी थीं. सारे  ग्राहक जोर जोर से चीखते , गालियाँ बकते हुए चले गए. बाज़ार में शोर मच गया. उस शाम रामदीन के ढाबे पर कोई ग्राहक नहीं आया. रामदीन बुरी तरह घबरा गया. उसने दूकान में रखा सारा आटा  फिकवा दिया. आटे की नई बोरी लाया. फिर भोलू के गालों पर चपत लगाते हुए बोला-‘ शैतान, तूने जरूर कोई गलत चीज़ मिला दी होगी आटे में .’ उस दिन भोलू के बदले किसी और  नौकर ने आटा गूंधा, रोटियाँ बन कर तैयार हुईं तो सबसे पहले रामदीन ने एक टुकड़ा खाकर देखा. फिर तुरंत थूक भी  दिया. मुंह कड़वा हो गया,.देर तक पानी से कुल्ला करता रहा पर मुंह की कडवाहट दूर न हुई. रामदीन ने नई नई दुकानों से आटा  मंगवा कर देख लिया पर वहाँ बनने वाली रोटियों का स्वाद  कड़वा ही रहा.

     भूत प्रेत का चक्कर समझ कर सारे नौकर भाग गए. खुद रामदीन का भी पता नहीं था. शाम हो गई. भोलू ढाबे में अकेला बैठा था. एक तरफ सुबह बनी रोटियाँ पड़ी थीं. भोलू ने दो दिन से कुछ नहीं खाया था. उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ कर मुंह में डाल लिया. अरे यह क्या! मुंह में अजीब मिठास घुल गया .वह खाता गया. ऐसी मीठी रोटी तो उसने इससे पहले कभी नहीं खाई थी. भोलू के मुंह से निकला –- ''पर रोटियां तो कडवी थीं! फिर यह रोटी मीठी कैसे !’ कानों में' आवाज़ आई---' आंसू से गीले आटे की रोटियाँ तो कडवी ही होंगी.' भोलू को लगा जैसे आवाज़ रोटी में से आ रही हो. वह खाता रहा. पता नहीं उसने कितन दिनों से भर पेट रोटी नहीं खाई थी .पेट भर गया था अब उसे नींद आ रही थी.                                                                                     ( समाप्त )