Saturday, 4 August 2018

बच्चे फूल हैं--देवेन्द्र कुमार--बाल कहानी


सुबह का समय। छुट्टी का दिन था। अभी सूरज पूरी तरह उगा नहीं था। सैलानी बाग में सैर कर रहे थे। हल्की हवा बदन पर अच्छी लग रही थी। पेड़-पौधों के पत्ते और टहनियों पर झूलते सुंदर सुगंधित फूल धीरे-धीरे हिल-डुल रहे थे जैसे आपस में बातें कर रहे हों। फूलों की मीठी-मीठी खुशबू हवा में तैर रही थी।
दो व्यक्ति एक क्यारी के पास रुककर वहां खिले फूलों को देखने लगे। बहुत सुंदर दृश्य था। एक ने दूसरे से कहा-‘‘अद्भुत। अति सुंदर।’’
दूसरे ने जवाब दिया-‘‘आपने ठीक कहा। फूल ऐसे लग रहे हैं जैसे सुंदर-सलोने बच्चों के झुंड।
-‘‘हां, बच्चे इन फूलों जैसे सुकोमल होते हैं।’’ दोनों व्यक्ति कुछ देर  फूलों की क्यारी के पास रुककर इसी बारे में बातें करते रहे---फूलों जैसे बच्चों और बच्चों जैसे फूल।
फूल भी उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे। उन दोनों के जाने के बाद एक फूल ने दूसरे फूल से कहा-‘‘तुमने सुना इन दोनों ने क्या कहा।‘’
‘‘हां, सुना। वे बच्चों की तुलना हम फूलों से कर रहे थे।’’
‘‘लेकिन बच्चे तो मनुष्य की संतान हैं। वे हम फूलों जैसे कैसे हो सकते हैं।’’
दूसरा फूल बोला-‘‘यह सब मैं नहीं जानता। लेकिन अक्सर ही मां-बाप कहते हैं-मेरा बच्चा फूलों जैसा कोमल है, नाजुक है।’’
खामोशी छा गई। हवा का झोंका आया तो फूल फिर से डालियों पर हिलडुल करने लगे। फूल ने हवा से पूछा तो हवा ने भी वही कहा। फूल बोला-‘‘मैं भी देखना चाहता हूं उन बच्चों को जिनकी तुलना उनके मां-बाप  हमसे  करते हैं। लेकिन मैं भला कैसे कहीं जा सकता हूं। मैं तो टहनी से जुड़ा हूं।’’ तभी हवा का दूसरा तेज झोंका आया और पौधे को हिला गया। एक कोमल टहनी पौधे से अलग हो गई। टहनी पर एक फूल खिला हुआ था। हवा फूलवाली टहनी को उड़ा ले  चली ।
‘‘वाह!’’ फूल ने कहा। उसे लग रहा था जैसे वह बंधन मुक्त हो गया है। अब कहीं भी जा सकता है। हवा फूल को उडाए लिए जा रही थी। आगे कूड़े का बड़ा ढेर पड़ा था . हवा कूड़े के ढेर के ऊपर से गुजरी तो बदबू से सामना
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 हुआ। फूल ने देखा दो बच्चे कूड़े के ढेर में जैसे कुछ खोज रहे थे। कूड़े में से निकालकर कुछ चीजें पास में रखी एक बड़ी बोरी में डालते जा रहे थे।
फूल ने हवा  से पूछा-‘‘क्या इन बच्चों को हम फूलों जैसा कहा जा सकता है?’’
हवा बोली-‘‘भले ही ये दोनों बच्चे गंदे और मैले-कुचैले हैं, पर शायद इनके मां-बाप को इनका चेहरा फूलों जैसा सुंदर लगता होगा।’’
फूल ने कहा-‘‘ये तो बहुत गंदे हैं। देखो तो सब तरफ कितनी बदबू फैली है।’’
हवा बोली-‘‘ये गरीब हैं न। घर गंदा, बस्ती गंदी। पेट भरने के लिए इन बच्चों के मां-बाप कूड़े के ढेर में से काम लायक चीजें चुनकर बेचते हैं, तब इनका घर चलता है। ये बच्चे इस काम में अपने मां-बाप की मदद करते हैं। लो, इनसे बात करो। इनका हाल-चाल पूछो।’’ इतना कहकर हवा ने फूल को बच्चों के पास कूड़े के ढेर पर छोड़ दिया और आगे चली गई। अब फूल कूड़े के बड़े ढेर पर पड़ा हुआ सोच रहा था-‘‘यह मैं कहां आ गया!’’
दोनों बच्चों के नाम थे किशोर और कमल। कूड़े के ढेर में काम लायक चीजें ढूंढ़ते हुए एकाएक कमल के हाथ रुक गए। उसने गहरी सांस ली। उसके मुंह से निकला-‘‘वाह! कितनी अच्छी खुशबू है।’’
किशोर ने कमल की ओर देखा। बोला-‘‘इस बदबू के बीच खुशबू कहां से आ गई।’’ फिर उन दोनों की नजर एक साथ फूल पर जा टिकीं। लाल रंग का सुंदर फूल। इसी में से भीनी-भीनी  खुशबू आ रही थी। दोनों ने फूल को उठाने के लिए हाथ  बढ़ाए फिर रुक गए। दोनों की हथेलियां गंदगी से काली हो रही थी।
‘‘फूल को मत छुओ। उसे देखो। देखो न हमारे हाथ कितने गंदे हैं।’’ कमल बोला। मेरी मां कहती है फूल कोमल होते हैं। उन्हें तो दूर से देखना चाहिए। छूना या तोड़ना नहीं चाहिए।’’
किशोर ने कहा-‘‘अरे हमने इस फूल  को तोड़ा कहां है। यह तो हवा में उड़कर अपने आप हमारे पास आ गया है। मैंने तो कभी किसी फूल को छूकर नहीं देखा है।’’ कहते-कहते किशोर ने फूल को उठाकर अपने गंदे गाल से लगा लिया। गाल कालिख से काला हो रहा था।
‘‘अरे ये फूल गंदा हो जाएगा। शीशे में अपना मुंह तो देख ले जरा।’’ कमल ने उसे चिढ़ाया। पर किशोर फूल को इसी तरह अपने गाल से सटाए खड़ा रहा, फिर जोर-जोर से सूंघने लगा। ‘‘वाह, कितनी अच्छी खुशबू है।’’
‘‘क्या फूल की सारी खुशबू तू खुद ही सूंघ लेगा। जरा मुझे भी तो  छूने  दे इस फूल को।’’ कमल ने याचना भरे स्वर में कहा।
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‘‘जरा अपना मुंह और अपनी हथेलियां तो देख।’’ कहकर किशोर मुस्कराया और उसने फूलदार टहनी कमल को थमा दी। ‘‘सचमुच बहुत अच्छी खुशबू है। न जाने गंदगी के इस ढेर पर इतना सुंदर सुगंधित फूल कहां से आ गया।’’ कमल ने कहा। फिर दोनेां बारी-बारी से फूल को छूते और सूंघते रहे। वे गंदगी के ढेर से काम लायक चीजें ढूंढ़ने का अपना काम भूल चुके थे।
‘‘इस तरह हम फूल को बार-बार छुएंगे तो यह मुरझा जा जाएगा। इसकी खुशबू खत्म हो जाएगी।’’ किशोर ने कहा।
‘‘चलो, यहां से चलें और साफ-सुथरी जगह पर बैठकर इस फूल से इसका हाल-चाल पूछे।’’ कमल बोला।
‘‘मगर बोरी नहीं भरी तो बप्पा नाराज हो जाएंगे।’’ किशोर ने कहा.
पर  कमल ने जैसे किशोर की बात सुनी ही नहीं थी। उसकी आंखें कूड़े के ढेर पर कुछ खोज रही थी। कुछ दूरी पर एक टूटा हुआ गमला पड़ा था। कमल ने गमले को उठा लिया, फिर मिट्टी डालकर फूलदार टहनी को गमले में बिठा दिया।
‘‘ अब बन गई बात!’’ किशोर ने कहा।‘’ कई बार बाग से गुजरते हुए गमलों में लगे फूल देखे हैं मैंने  पर यह गमला तो टूटा हुआ है। फूल इसमें कैसे टिकेगा?’’
‘‘मैं इसे घर ले जाऊंगा।’’  कमल  बोला-‘‘और इसे मां को दे दूंगा। वह इसे संभालकर रखेगी। कुछ दिन बाद टहनी पर और भी फूल आ जाएंगे।‘
‘‘दम घुट जाएगा  बेचारे फूल का तुम्हारी झोपड़ी में। फूलों को हवा और धूप चाहिए।‘’—किशोर बोला
‘‘तब क्या करें?’’
‘‘फूल को यही रहने दो। बोरी भरने का काम भी तो पूरा करना है वरना डांट पड़ेगी।’’ कमल ने अपने भरी बोरी को हिलाकर देखा। वह फूल को भूल जाना चाहता था। पर आंखें थी कि उस तरफ से हट ही नहीं रही थी।
किशोर और कमल फिर से अपने काम में लग गए। पास में टूटे गमले में फूल हवा में हिलडुल रहा था।
‘‘मैं तो फूल से बात करूंगा।’’ कमल ने बोरी को एक तरफ रखते हुए कहा , ‘’ काम तो हम  रोज ही करते हैं।’’
‘‘आओ फूल से बातें करें।’’
‘‘हां, दोस्ती करें। इस काम में हाथ गंदे करते हुए सारा दिन बीत जाता है।
‘‘सुबह-शाम कुछ पता ही नहीं चलता।’’
‘‘मैं बप्पा से कहूंगा कि कूड़े में हाथ गंदे न करें। कमल ने कहा।
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‘‘मैं भी यही कहूंगा।’’ किशोर ने हां में हां मिलाई। ‘‘लेकिन वह तो कूड़े वाला काम ही जानते हैं। हमसे भी यही करवाते हैं।’’
‘‘मैं तो फूलों का काम करूंगा।’’
‘‘फूलों का काम! कैसा काम!’’
‘‘कोई भी काम...फूलों के बीच रहूंगा। फूलों से बात करूंगा। कूड़े से नफरत है मुझे।’’
‘‘मुझे भी...आओ अपने इस दोस्त से बात करें।’’ और दोनों टूटे गमले को बीच में रखकर बैठ गए। कूड़े के विशाल ढेर से बदबू आ रही थी। नीले आकाश में परिंदे शोर कर रहे थे। टूटे गमले में लगा फूल खुश था| उसे दो नए दोस्त मिल गए थे। तीन फूल हंस रहे थे। ( समाप्त )

बच्चे फूल हैं--देवेन्द्र कुमार--बाल कहानी


बच्चे फूल हैं---देवेन्द्र कुमार—बाल कहानी
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क्या सचमुच बच्चे फूल होते हैं? अपने चारों ओर देखता हूँ तो इस वाक्य पर संदेह होने लगता है. --क्यों न उन दोनों बच्चों से पूछ लिया जाए, जो कुछ और ही नजर आ रहे हैं.

सुबह का समय। छुट्टी का दिन था। अभी सूरज पूरी तरह उगा नहीं था। सैलानी बाग में सैर कर रहे थे। हल्की हवा बदन पर अच्छी लग रही थी। पेड़-पौधों के पत्ते और टहनियों पर झूलते सुंदर सुगंधित फूल धीरे-धीरे हिल-डुल रहे थे जैसे आपस में बातें कर रहे हों। फूलों की मीठी-मीठी खुशबू हवा में तैर रही थी।
दो व्यक्ति एक क्यारी के पास रुककर वहां खिले फूलों को देखने लगे। बहुत सुंदर दृश्य था। एक ने दूसरे से कहा-‘‘अद्भुत। अति सुंदर।’’
दूसरे ने जवाब दिया-‘‘आपने ठीक कहा। फूल ऐसे लग रहे हैं जैसे सुंदर-सलोने बच्चों के झुंड।
-‘‘हां, बच्चे इन फूलों जैसे सुकोमल होते हैं।’’ दोनों व्यक्ति कुछ देर  फूलों की क्यारी के पास रुककर इसी बारे में बातें करते रहे---फूलों जैसे बच्चों और बच्चों जैसे फूल।
फूल भी उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे। उन दोनों के जाने के बाद एक फूल ने दूसरे फूल से कहा-‘‘तुमने सुना इन दोनों ने क्या कहा।‘’
‘‘हां, सुना। वे बच्चों की तुलना हम फूलों से कर रहे थे।’’
‘‘लेकिन बच्चे तो मनुष्य की संतान हैं। वे हम फूलों जैसे कैसे हो सकते हैं।’’
दूसरा फूल बोला-‘‘यह सब मैं नहीं जानता। लेकिन अक्सर ही मां-बाप कहते हैं-मेरा बच्चा फूलों जैसा कोमल है, नाजुक है।’’
खामोशी छा गई। हवा का झोंका आया तो फूल फिर से डालियों पर हिलडुल करने लगे। फूल ने हवा से पूछा तो हवा ने भी वही कहा। फूल बोला-‘‘मैं भी देखना चाहता हूं उन बच्चों को जिनकी तुलना उनके मां-बाप  हमसे  करते हैं। लेकिन मैं भला कैसे कहीं जा सकता हूं। मैं तो टहनी से जुड़ा हूं।’’ तभी हवा का दूसरा तेज झोंका आया और पौधे को हिला गया। एक कोमल टहनी पौधे से अलग हो गई। टहनी पर एक फूल खिला हुआ था। हवा फूलवाली टहनी को उड़ा ले  चली ।
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‘‘वाह!’’ फूल ने कहा। उसे लग रहा था जैसे वह बंधन मुक्त हो गया है। अब कहीं भी जा सकता है। हवा फूल को उडाए लिए जा रही थी। आगे कूड़े का बड़ा ढेर पड़ा था . हवा कूड़े के ढेर के ऊपर से गुजरी तो बदबू से सामना हुआ। फूल ने देखा दो बच्चे कूड़े के ढेर में जैसे कुछ खोज रहे थे। कूड़े में से निकालकर कुछ चीजें पास में रखी एक बड़ी बोरी में डालते जा रहे थे।
फूल ने हवा  से पूछा-‘‘क्या इन बच्चों को हम फूलों जैसा कहा जा सकता है?’’
हवा बोली-‘‘भले ही ये दोनों बच्चे गंदे और मैले-कुचैले हैं, पर शायद इनके मां-बाप को इनका चेहरा फूलों जैसा सुंदर लगता होगा।’’
फूल ने कहा-‘‘ये तो बहुत गंदे हैं। देखो तो सब तरफ कितनी बदबू फैली है।’’
हवा बोली-‘‘ये गरीब हैं न। घर गंदा, बस्ती गंदी। पेट भरने के लिए इन बच्चों के मां-बाप कूड़े के ढेर में से काम लायक चीजें चुनकर बेचते हैं, तब इनका घर चलता है। ये बच्चे इस काम में अपने मां-बाप की मदद करते हैं। लो, इनसे बात करो। इनका हाल-चाल पूछो।’’ इतना कहकर हवा ने फूल को बच्चों के पास कूड़े के ढेर पर छोड़ दिया और आगे चली गई। अब फूल कूड़े के बड़े ढेर पर पड़ा हुआ सोच रहा था-‘‘यह मैं कहां आ गया!’’
दोनों बच्चों के नाम थे किशोर और कमल। कूड़े के ढेर में काम लायक चीजें ढूंढ़ते हुए एकाएक कमल के हाथ रुक गए। उसने गहरी सांस ली। उसके मुंह से निकला-‘‘वाह! कितनी अच्छी खुशबू है।’’
किशोर ने कमल की ओर देखा। बोला-‘‘इस बदबू के बीच खुशबू कहां से आ गई।’’ फिर उन दोनों की नजर एक साथ फूल पर जा टिकीं। लाल रंग का सुंदर फूल। इसी में से भीनी-भीनी  खुशबू आ रही थी। दोनों ने फूल को उठाने के लिए हाथ  बढ़ाए फिर रुक गए। दोनों की हथेलियां गंदगी से काली हो रही थीं।
‘‘फूल को मत छुओ। उसे देखो। देखो न हमारे हाथ कितने गंदे हैं।’’ कमल बोला। मेरी मां कहती है फूल कोमल होते हैं। उन्हें तो दूर से देखना चाहिए। छूना या तोड़ना नहीं चाहिए।’’
किशोर ने कहा-‘‘अरे हमने इस फूल  को तोड़ा कहां है। यह तो हवा में उड़कर अपने आप हमारे पास आ गया है। मैंने तो कभी किसी फूल को छूकर नहीं देखा है।’’ कहते-कहते किशोर ने फूल को उठाकर अपने गंदे गाल से लगा लिया। गाल कालिख से काला हो रहा था।
‘‘अरे ये फूल गंदा हो जाएगा। शीशे में अपना मुंह तो देख ले जरा।’’ कमल ने उसे चिढ़ाया। पर किशोर फूल को इसी तरह अपने गाल से सटाए खड़ा रहा, फिर जोर-जोर से सूंघने लगा। ‘‘वाह, कितनी अच्छी खुशबू है।’’
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‘‘क्या फूल की सारी खुशबू तू खुद ही सूंघ लेगा। जरा मुझे भी तो  छूने  दे इस फूल को।’’ कमल ने याचना भरे स्वर में कहा।
‘‘जरा अपना मुंह और अपनी हथेलियां तो देख।’’ कहकर किशोर मुस्कराया और उसने फूलदार टहनी कमल को थमा दी। ‘‘सचमुच बहुत अच्छी खुशबू है। न जाने गंदगी के इस ढेर पर इतना सुंदर, सुगंधित फूल कहां से आ गया।’’ कमल ने कहा। फिर दोनेां बारी-बारी से फूल को छूते और सूंघते रहे। वे गंदगी के ढेर से काम लायक चीजें ढूंढ़ने का अपना काम भूल चुके थे।
‘‘इस तरह हम फूल को बार-बार छुएंगे तो यह मुरझा जा जाएगा। इसकी खुशबू खत्म हो जाएगी।’’ किशोर ने कहा।
‘‘चलो, यहां से चलें और साफ-सुथरी जगह पर बैठकर इस फूल से इसका हाल-चाल पूछे।’’ कमल बोला।
‘‘मगर बोरी नहीं भरी तो बप्पा नाराज हो जाएंगे।’’ किशोर ने कहा.
पर  कमल ने जैसे किशोर की बात सुनी ही नहीं थी। उसकी आंखें कूड़े के ढेर पर कुछ खोज रही थी। कुछ दूरी पर एक टूटा हुआ गमला पड़ा था। कमल ने गमले को उठा लिया, फिर मिट्टी डालकर फूलदार टहनी को गमले में बिठा दिया।
‘‘ अब बन गई बात!’’ किशोर ने कहा।‘’ कई बार बाग से गुजरते हुए गमलों में लगे फूल देखे हैं मैंने  पर यह गमला तो टूटा हुआ है। फूल इसमें कैसे टिकेगा?’’
‘‘मैं इसे घर ले जाऊंगा।’’  कमल  बोला-‘‘और इसे मां को दे दूंगा। वह इसे संभालकर रखेगी। कुछ दिन बाद टहनी पर और भी फूल आ जाएंगे।’’

‘‘दम घुट जाएगा  बेचारे फूल का तुम्हारी झोपड़ी में। फूलों को हवा और धूप चाहिए।‘’—किशोर बोला||
‘‘तब क्या करें?’’
‘‘फूल को यहीं रहने दो। बोरी भरने का काम भी तो पूरा करना है। वरना डांट पड़ेगी।’’ कमल ने अपने भरी बोरी को हिलाकर देखा। वह फूल को भूल जाना चाहता था। पर आंखें  कि उस तरफ से हट ही नहीं रही थीं।
किशोर और कमल फिर से अपने काम में लग गए। पास में टूटे गमले में फूल हवा में हिलडुल रहा था।
‘‘मैं तो फूल से बात करूंगा।’’ कमल ने बोरी को एक तरफ रखते हुए कहा , ‘’ काम तो हम रोज ही करते हैं।’’
‘‘आओ फूल से बातें करें।’’
‘‘हां, दोस्ती करें। इस काम में हाथ गंदे करते हुए सारा दिन बीत जाता है।‘’
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‘‘सुबह-शाम का कुछ पता ही नहीं चलता।’’
‘‘मैं बप्पा से कहूंगा कि कूड़े में हाथ गंदे न करें।‘’ कमल ने कहा।
‘‘मैं भी यही कहूंगा।’’ किशोर ने हां में हां मिलाई। ‘‘लेकिन वह तो कूड़े वाला काम ही जानते हैं। हमसे भी यही करवाते हैं।’’
‘‘मैं तो फूलों का काम करूंगा।’’
‘‘फूलों का काम! कैसा काम!’’
‘‘कोई भी काम...फूलों के बीच रहूंगा। फूलों से बात करूंगा। कूड़े से नफरत है मुझे।’’
‘‘मुझे भी...आओ अपने इस दोस्त से बात करें।’’ और दोनों टूटे गमले को बीच में रखकर बैठ गए। कूड़े के विशाल ढेर से बदबू आ रही थी। नीले आकाश में परिंदे शोर कर रहे थे। टूटे गमले में लगा फूल खुश था, उसे दो नए दोस्त मिल गए थे। तीन फूल हंस रहे थे। ( समाप्त )

रोशनी का चौराहा--देवेन्द्र कुमार--बाल कहानी


देवेन्द्र कुमार,
E403,प्रिंस अपार्टमेंट्स,
प्लाट नं 54 ,
पटपडगंज, दिल्ली -110092
M -9910140071
बाल कहानी


रोशनी का चौराहा
                                               --देवेंद्र कुमार
कैसा होता है रोशनी का चौराहा,क्या करता है वह? कैसे और कब तैयार होता है ?

बरसात का मौसम नहीं था, फिर भी जोरों की बारिश शुरु हो गई. दोपहर ढलते ही झुटपुटा हो गया. अगले दिन इम्तिहान है इसलिये अरुण और गरिमा पढ़ रहे थे, पर उनका मन तो बाहर जाकर बारिश में भीगने का हो रहा था. वैसे दोनों अलग अलग बैठ कर पढ़ रहे थे,  पर दोनों का मन एक ही बात कह रहा था. उनके मम्मी-पापा और दादी भी दूसरे कमरे में बैठे थे. तभी मम्मी ने आकर खिडकियों के पर्दे हटा दिए. कहा-“अंधेरा हो गया दिन में, कम से कम लाइट तो जला लो. “और लाइट आन करके बाहर चली गईं, पर जाते जाते हिदायत कर गईं कि ध्यान से पढ़ाई करें.
दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और मुस्करा दिए. पर तभी लाइट चली गई. कमरे मैं अन्धकार छा  गया. दोनों खिड़की के पास जाकर खडे हो गए और फिर खिड़की खोल दी, हवा के तेज झोंके के साथ बूंदें अन्दर आकर उन्हें भिगो गईं . कुछ देर बाद मम्मी मोमबत्ती लेकर अंदर आ गईं पर उससे बात नहीं बनी, अब पढना मुश्किल था. पापा ने पुकारा-“ अरुण और गरिमा, बाहर आ जाओ.
दोनों बाहर के कमरे में चले आये. उन्होंने सुना पापा दादी से कह रहे थे-“ मां, यह तो मुश्किल हो गई, कल बच्चों का इम्तिहान है, अब कैसे होगा? “ दादी ने मुस्करा कर कहा- “रमेश, तुम शायद भूल गए कि गाँव के हमारे घर में बिजली नहीं थी और तुम भी शहर में आने से पहले कई साल तक लैंप की रोशनी में ही पढते थे.”  
अरुण के पापा ने कहा-“ मां, बचपन के वे दिन तो कब का भूल चुका हूँ, और अरुण तथा गरिमा तो कभी गाँव गए ही नहीं.” दादी ने कहा-“ पर मुझे वे दिन कभी नहीं भूलते. “ काफी देर हो गई पर लाइट नहीं आई. तभी दादी ने अरुण की माँ लता से कहा-“ लगता है बिजली जल्दी आने वाली नहीं.” कमरे में चुप्पी छाई रही, भला इस बारे में कोई क्या कह सकता था. तभी दादी उठ कर रसोई में चली  गईं, कुछ देर बाद एक थाली में आटा और गिलास में पानी लेकर आ गईं. लता, रमेश, अरुण और गरिमा चुपचाप उन्हें देख रहे थे, बात कुछ समझ में नहीं आ रही रही थी. भला बात बिजली की हो रही है और दादी हैं कि थाली में आटा लाकर न जाने क्या करने जा रही हैं!. ये चारों हैरानी से देखते रहे. दादी चुपचाप अपना खेल करती रहीं. वह एकदम चुप थीं, फिर कमरे में एक धुन गूंजने लगी. दादी न जाने क्या  गुनगुना रही थीं और उनके हाथ आटे में पानी मिला रहे थे.
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आखिर रमेश से चुप न रहा गया, उन्होंने कहा-“ माँ, यह क्या खेल कर रही हो, कुछ हमें भी तो बताओ.दादी ने कहा- “ लाइट नहीं है और कल बच्चों का इम्तिहान है इसलिए उनकी पढाई जरुरी है, देखो शायद कुछ हो जाए.” और फिर से आटा मांडने लगीं. सब चुप बैठे रहे, दादी के हाथ आटे पर चल रहे थे. देखते देखते थाली में आटे का एक बहुत बड़ा दीपक दिखाई देने लगा. दीपक आटे के ही बने हुए एक खम्भे पर टिका हुआ था. इस बीच लता जैसे समझ चुकी थी. वह रसोई में जाकर सरसों के तेल की बोतल ले आई. दादी ने आटे के दीपक में  तेल भर दिया. अब पता चला कि दादी क्या करना चाहती थीं. उन्होंने दीपक के चार कोने बाहर की तरफ बढ़ा दिए फिर रुई की चार बत्तियां तेल में भिगो कर हर कोने से कुछ आगे निकाल दीं. अब रमेश की बारी थी, वह किचन में जाकर माचिस ले आये और दादी के दीपक को जला दिया. कमरे में जल रही मोमबत्तियों का प्रकाश जैसे एकाएक कई गुना बढ़ गया.
कमरे में सम्मिलित हंसी गूँज गई, दादी के दीपक ने जैसे जादू कर दिया था. दादी धीरे धीरे मुस्करा रही थीं. उन्होंने कहा-“ गांवों में हमेशा ही बिजली की दिक्कत रहती है, ऐसे में रोशनी का  चौराहा ही बच्चों की पढाई में उनकी मदद करता है, “
“ मां, तुम इसे रोशनी का चौराहा क्यों कह रही हो?”- रमेश ने पूछा.
दादी ने हंस कर कहा-“ तो इसे और क्या कहूं?  जरा देखो तो कैसे अपने चारों हाथों से रोशनी  फैला कर अंधकार को दूर भगा रहा है.”
तब तक अरुण और गरिमा दूसरे कमरे से किताबें ले आये थे और पढाई में जुट गये थे. अब उन्हें पढने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी. मोमबत्ती और दीपक के प्रकाश ने मिल कर अन्धकार को भगा दिया था. बच्चे पढ़ रहे थे. रमेश और लता मां से गाँव के जीवन के बारे में बहुत सी बातें जानना चाहते थे, पर अभी अवसर नहीं था. बच्चे पढाई में डूबे थे और रोशनी का चौराहा अपने चारों हाथों से अंधकार को दूर भगा रहा था. ( समाप्त )


 

Friday, 3 August 2018

काली कलम--देवेन्द्र कुमार-- बाल कहानी


काली कलम

--देवेन्द्र कुमार


वर्ष में केवल एक दिन अजय के बाबा अपने हाथ में काली कलम पकड़ते थे.आखिर काली कलम के माध्यम से वह क्या कहना चाहते थे?
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आज के दिन बाबाजी को काली कलम की जरुरत पड़ती है, यह बात अजय को अच्छी तरह पता है.  आज१२ दिसम्बर है. आज के दिन बाबा काली कलम जरूर हाथ में लेते हैं.  शुरू में  उसे यह बात चकित करती थी पर अब नहीं. क्योंकि एक दिन उसने यह बात पापा से पूछी तो उन्होंने  बताया था. वह बोले – ‘इसके पीछे एक दुःख भरी घटना है. आज तुम्हारी दादी की पुण्यतिथि है.  आज ही के दिन उनका स्वर्गवास हुआ था.
पापा की बात सुन कर अजय को बहुत अचरज हुआ. वह सोचने लगा –‘भला दादी को याद करने का यह कौन सा तरीका हुआ? उसने पिछले साल १२ दिसम्बर को देखा था कि सुबह सुबह बाबा ने एक कागज लिया और फिर उस पर काली कलम से लकीरें खीचने लगे, उसके बाद लिखा -१२ दिसम्बर. इसके बाद बाबा कमरे से बाहर चले गये. मौक़ा देख कर अजय कमरे में चला गया और बाबा का  बनाया चित्र काफी देर तक देखता रहा, पर कुछ समझ में नहीं आया. बाबा ने कागज पर जो कुछ बनाया था वह ठीक नहीं लग रहा था. कागज पर बनी रेखाओं मे दादी कहीं नहीं दिख रहीं थीं.
उसने पापा से पूछा तो वह बोले ‘मैं तो बहुत दिनों से देखता आ रहा हूँ, पर मैने कभी तुम्हारे बाबाजी से इस बारे में बात नहीं की. मैं समझता हूँ कि वह तुम्हारी दादी के जाने से बहुत दुखी हैं और १२ दिसम्बर के दिन उन्हें इसी तरह याद करते हैं.’ अजय ने कहा – ‘पर पापा, बाबाजी ने जो कुछ बनाया है वह दादी का चित्र तो नहीं है.’ तब अजय के पापा ने कहा ‘दादाजी तुम्हारी दादी को इसी तरह याद करते हैं. यह बात तुम्हें पता नहीं, क्योंकि तब तुम बहुत छोटे थे.’
अजय बोला ‘लेकिन उन्होंने दादी का चित्र तो नहीं बनाया है.’
पापा बोले ‘हाँ तुम ठीक कह रहे हो, पर यह भी समझो कि तुम्हारे बाबाजी चित्रकार तो हैं नहीं, वह तो उन रेखाओं के माध्यम से अपनी भावना व्यक्त कर देतें हैं.’
लेकिन घर में दादी के कितने चित्र देखे हैं पुराने एल्बम में मैने. बाबाजी उन चित्रों को भी तो सामने रख सकते हैं टेबल पर अपने सामने,’ अजय ने कहा.
 “हाँ ,तुम ठीक कह रहे हो, पर यह सुझाव उन्हें कौन दे!’ अजय के पापा ने कहा.
अजय देर तक इस बारे में सोचता रहा. फिर पुराना एल्बम उठा लाया और देर तक देखता रहा. कुछ देर बाद बाबा के कमरे में गया तो देखा बाबा वहां नहीं थे. टेबल पर काली कलम से बना रेखाचित्र रखा था. अजय ने वह चित्र उठाया और उसकी जगह एल्बम रख दिया, फिर उसका वह पेज खोल दिया, जिस पर बाबा और दादी के कई चित्र लगे थें. उन सभी चित्रों में दोनों  साथ-- साथ खडे थे. फिर चुपचाप बाहर चला आया. यह बात उसने पापा को बताई तो वह नाराज होने लगे. तभी बाबाजी आ गए.  
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    घर में  चुप्पी छा गयी. सब सोच रहे थे कि अब न जाने क्या होगा. बाबा के कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही थी. अजय ने झांक कर देखा बाबा एल्बम के पेज पलट रहे थे, वह काफी देर तक एल्बम देखते रहे फिर पुकारा ‘यह एल्बम कौन रख गया यहाँ?     
पापा ने अजय की ओर देखा जैसे कह रहे हों - अब तुम जानो. अजय कुछ देर सकुचाता हुआ खडा रहा फिर अन्दर जाकर बोला - ‘जी,मैने रखा है. आज दादी की पुण्य तिथि हैं न इसीलिए देख रहा था. आप और दादी कितने अच्छे लग रहे हैं साथ साथ इन फोटोग्राफ्स में.’
बाबा के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, अजय को गोद में भर कर बोले ‘ये चित्र अलग अलग समय पर खीचे गये थे.’ इसके बाद बाबा देर तक अजय को अपने और उस की दादी के चित्रों का इतिहास बतलाते रहे, बीच बीच में वे मुस्करा भी देते थे. पूरे घर में उन दोनों की हंसी गूँज रही थी. अब बाबा उदास नहीं थे.
जब अगला १२ दिसम्बर आया तो बाबा ने पेपर और काली कलम को हाथ नहीं लगाया, उनकी टेबल पर चित्रों का एल्बम खुला हुआ रखा था. उन्होने अजय को पुकारा ‘अजय, क्या अपनी दादी से नहीं मिलोगे?     
        अजय मुस्कराता हुआ बाबा के पास चला आया. अब बाबा को काली कलम की जरुरत कभी  नहीं पड़ेगी, यह बात अजय पहले ही जान चुका था.( समाप्त )