Saturday, 8 July 2023

मेरी बन्नो =देवेंद्र कुमार

 

मेरी बन्नो =देवेंद्र कुमार

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उसका नाम था रामदास, लेकिन अब लोग उसे सिर्फ ‘एक बूढ़ा आदमी’, ‘बुढ्ढा’ जैसे नामों से पुकारते थे। वह दुनिया में अकेला था। एक दुर्घटना में पत्नी और बच्चों की मृत्यु हो गई थी। उनके दुख में पागल की तरह इधर-उधर घूमता रहता था। धीरे-धीरे उसके घर का सामान गायब होने लगा। फिर एक दिन ऐसा भी आया, कुछ गुंडे उसके मकान में घुस गए। रामदास ने विरोध किया तो उन लोगों ने उसे मार-पीटकर भगा दिया। बेचारा रामदास बस्ती के बाहर वाले खंडहर में रहने लगा। वहाँ मलबे के ढेर थे। लोग घरों का कूड़ा वहाँ फेंक देते थे।

एक दिन खूब पानी बरसा। खंडहर में भी पानी भर गया।रामदास भीग गया। उसे उम्मीद थी कि कोई तो उससे कहेगा, “आओ बाबा, हमारे घर में आ जाओ।” पर रामदास की सुध किसी ने नहीं ली। उसी रात रामदास ने सोचा कि वह अब इस मोहल्ले में नहीं रहेगा, जहाँ कोई दुख में पड़े आदमी की मदद नहीं करता। वह वहाँ से चल दिया। भटकता-भटकता जंगल की तरफ बढ़ गया। चलता चला गया। रामदास थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। अब उसके बूढ़े पैरों ने चलने से इनकार कर दिया था। वह सोच रहा था, “क्या इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं, जो मेरी मदद करे।‘’

वहाँ भला सुनसान जंगल में उसके मन की पीड़ा कौन समझता। थकान और दुख से रामदास की आँखों से आँसू बह चले। वह सिसकने लगा।

जंगल में रहती थी वनदेवी। वह जंगल की रक्षक थी। मुरझाए फूल खिलाती थी, पशुओं को शिकारियों के शिकार बनने से बचाती थी, कोई पशु-पक्षी घायल हो जाए तो अपने जादू से उसे चंगा कर देती थी। वनदेवी ने रामदास को उदास बैठे देखा। सोचा, “मुझे इस बूढ़े आदमी की सहायता करनी चाहिए।”

उसने हाथ हिलाए तो रामदास के सामने स्वादिष्ट भोजन से भरी एक थाली दिखाई देने लगी। रामदास ने भोजन से भरी थाली को देखा तो चौंक उठा। वह समझ न पाया कि थाली वहाँ कौन लाया। और इस तरह थाली रखकर चुपचाप चला क्यों गया! ‘क्या भोजन लाने वाला मुझसे एक बार मेरा हाल भी नहीं पूछ सकता था। मैं कोई भिखारी नहीं हूँ।’ रामदास ने सोचा और निश्चय कर लिया कि वह उस थाली को छुएगा भी नहीं।

रामदास को जोरों की भूख लग रही थी। पर वह था स्वाभिमानी। वह वहाँ से उठा और दूर जाकर बैठ गया। यह देखकर वनदेवी मुस्कराने लगी। वह समझ गई कि इस तरह रामदास कोई भी सहायता नहीं लेगा। उसने कुछ सोचा और फिर देखते-देखते वह एक छोटी लड़की के रूप में बदल गई।

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अब एक छोटी लड़की जंगल में खड़ी थी। उसने साधारण कपड़े पहन रखे थे। उसके दोनों हाथों में एक-एक फल था। फिर वह रामदास की ओर चल दी।रामदास ने देखा एक छोटी लड़की धीरे-धीरे उसकी ओर आ रही है। वह आश्चर्य से देखता रह गया। भला वह लड़की उस निर्जन जंगल में कहाँ से आ गई।रामदास उठा और उस लड़की के पास जा पहुँचा। लड़की के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “बेटी, तेरा नाम क्या है? इस जंगल में अकेली क्यों घूम रही है?”

छोटी लड़की बनी वनदेवी ने कहा, “मेरा नाम तो वनदेवी है, पर सब मुझे बन्नो कहते हैं।”

“वाह, बन्नो तो बहुत प्यारा नाम है। पर यह तो बता तेरा घर कहाँ है?” रामदास ने पूछा।

“मेरा घर तो यहीं है।” बन्नों ने कहा।

“यहीं कहा? तू किसके साथ रहती है?” रामदास ने कुछ आश्चर्य से पूछा। फिर बोला, “बेटी, जंगल में अकेली घूमना ठीक नहीं। चल मैं तुझे तेरे घर पहुँचा दूँ।” रामदास ने वनदेवी का हाथ पकड़ लिया।

वनदेवी कैसे बताती कि वह सचमुच कौन है! वह चुप खड़ी रही। उसकी चुप्पी से रामदास कुछ और ही समझा। उसे लगा, यह लड़की अनाथ है, अकेली है। कोई इसकी देखभाल करने वाला नहीं है। उसने कहा, “बेटी, मैंने पूरी बात समझ ली है। कोई फिक्र नहीं, मैं तो हूँ! तू मेरे साथ रहेगी आज से।”

वनदेवी मन ही मन मुसकराने लगी, ‘वाह, मैं तो इसे दुखी जानकर मदद करने आई थी, पर यहाँ तो यह बेसहारा बूढ़ा खुद मेरी ही मदद करने को तैयार है!’

तभी आकाश में बादल घिर आए, बिजली चमकी और तेज बारिश होने लगी। रामदास को अपनी नहीं, बन्नो की चिंता होने लगी। उसने झट अपना कुरता उतारा और बन्नो के बदन पर लपेट दिया। कहने लगा, “यह तो गड़बड़ हो गई। यहाँ तो कोई जगह भी नहीं है, जहाँ बारिश से बचा जा सके। चलो किसी घने पेड़ की तलाश करें। उसके नीचे कुछ तो रक्षा होगी बारिश से।” और रामदास बन्नो का हाथ थामकर तेजी से चलने लगा।

वनदेवी ने देखा, रामदास बारिश में भीग गया था। एकाएक उसने कहा, “बाबा, वह देखो, वहाँ एक गुफा है।” रामदास ने बन्नो की बताई दिशा में देखा। सामने एक गुफा दिखाई दे रही थी। वह झटपट बन्नो को लेकर गुफा में पहुँच गया। बन्नो ने उसका कुरता वापस देते हुए कहा, “बाबा, इसे पहन लो, तुम बीमार हो जाओगे।”

“मुझे अपनी नहीं तेरी चिंता है। भला तू जंगल में अकेली कैसे रहेगी। यहाँ शेर-चीते हो सकते हैं, साँप निकल सकते हैं। ना, मैं तुझे यहाँ नहीं छोड़ूँगा। तुझे कहीं और ले जाऊँगा।”

“कहाँ ले जाओगे बाबा?” बन्नो ने पूछा। वनदेवी को रामदास की बातों में आनंद आ रहा था।

“कहीं भी। मैं मेहनत-मजूरी करूँगा, पर तुझे कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा।”

वनदेवी सोच रही थी, ‘कैसा विचित्र मनुष्य है। यह दुनिया से दुखी होकर जंगल में भूखा-प्यासा भटक रहा है, पर एक अकेली लड़की को देखकर चिंता कर रहा है। और अपने सारे दुख भूलकर उसके लिए कुछ भी करने को तैयार है।’

ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई आदमी वनदेवी की सहायता करने की बात करे। अब तक तो वनदेवी ही दुखियों की सहायता करती आई थी। उसका मन करुणा से भर उठा। कितना भोला-भाला और अच्छा इंसान है यह। इसके मन में दूसरों के लिए कितना प्यार है। पर इसके जीवन में कितना दुख है।

बारिश रुक गई। रामदास बन्नो का हाथ पकड़े हुए गुफा से बाहर आ गया। वह सोच रहा था, ‘बन्नो के लिए मैं कुछ भी करूँगा। लोगों से मदद माँगूँगा, कोई भी काम करूँगा। पर इस नन्ही-मुन्नी अनाथ बच्ची को कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा। आज से मैं इसका हूँ, और यह मेरी। मुझे दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मिल गया है।’

बन्नो बनी हुई वनदेवी सोच रही थी, “मैं इस भोले मनुष्य को छोड़कर कैसे जाऊँ! अगर जाऊँगी तो इसे बहुत दुख होगा। और वनदेवी ने निर्णय किया वह बन्नो के रूप में रामदास के साथ रहेगी और उसे कोई कष्ट नहीं होने देगी। वह सोच रही थी, ‘’रामदास के प्यार का जादू तो मेरे जादू से भी बड़ा है।”

रामदास ने देखा बन्नो चलती-चलती मुसकरा रही थी। वह भी हँस पड़ा। आज वह बहुत खुश था। उसे किसी से कोई शिकायत नहीं थी। उसे बन्नो जो मिल गई थी। और वनदेवी को मिल गया था एक भोला-भाला आदमी जिसके प्यार में अद्भुत ताकत थी।(समाप्त )

Friday, 7 July 2023

मिट्टी में क्या !-- देवेन्द्र कुमार

 

 

                                 मिट्टी में क्या !-- देवेन्द्र कुमार   

                               ==

जीतू कबाड़ी ठेले पर कबाड़ ले जा रहा था।  टूटे हुए गमले, पुराना फर्नीचर और वैसा ही दूसरा सामान। तभी एक ठेला पास आकर रुक गया। ठेले पर पौधे और गमले रखे थे। ठेले वाले का नाम शीतल था। उसने जीतू से कहा-‘ मुझे टूटे गमले दोगे?’

  जीतू ने हैरान स्वर में कहा—‘ ऐसा आदमी मैंने पहली बार देखा है जो कूड़े में फैंके जाने वाले टूटे गमलों को लेना चाहता है। आखिर क्या करोगे इन टूटे गमलों का।  ’

  ‘ मैं टूटे गमलों की मरम्मत करके उनमें पौधे लगाता हूँ।  ’ 

  ‘और फिर उन्हें बेच कर पैसे कमा लेते हो। भई वाह।  ’

  ‘नहीं नहीं, मैं मरम्मत किये गए गमलो को कभी नहीं बेचता, मांगने पर किसी को भी दे देता हूँ। 

हां पौधों के दाम जरूर लेता हूँ।‘ शीतल बोला। 

   ‘अगर ऐसा है तो ले लो अपने काम लायक टूटे गमले।‘   

  शीतल ने कई गमले छांट लिए और सड़क पर गमलों में भरी मिटटी निकालने लगा। तभी जीतू ने आश्चर्य से कहा—‘अरे यह क्या!’अब शीतल ने भी उधर देखा—गमले से निकाली गयी मिटटी में एक कान का झुमका नज़र आ रहा था। दोनों हैरान रह गए। तब तक सोसाइटी का गार्ड वेणु भी आ गया था और दिलचस्पी से यह सब देख रहा था। झुमका मिटटी में रहने के कारण मटमैला हो गया था पर निश्चय ही सोने का था। 

  तभी वेणु ने कहा—‘ यह झुमका जरूर लता मैडम का होगा। वह एक दिन इसके बाग़ में खो जाने की बात कह रही थीं। हमें उनके पास चलना चाहिए।‘ और फिर वह शीतल और जीतू को लता जी के पास ले गया। झुमके को देखते ही लता जी ने उत्तेजित स्वर में कहा—‘ कहाँ मिला,मैंने बहुत ढूँढा पर कुछ पता नहीं चला।‘  इस पर शीतल ने झुमका मिलने की विचित्र घटना उन्हें बता दी और पूछा—‘मैडम, आपका झुमका गमले में कैसे गिर गया था?’

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  लता ने बताया—‘पहले हमारे पड़ोस में जो सज्जन रहते थे उन्हें शायद पेड़ पौधों से, हरियाली से नफरत थी। और मुझे बचपन से ही पौधे अच्छे लगते हैं, सो मैंने सीढ़ियों पर रेलिंग से सटा कर कुछ फूलदार पौधों के गमले रख दिए। उन्होंने कहा कि मैं सारे गमले तुरंत हटा लूं, क्योंकि गमलों में पानी देने से गीली सीढ़ियों पर कोई भी फिसल कर चोट खा सकता है।   मैंने उन्हें बहुत समझाया कि मैं सीढ़ियों को गीला नहीं होने दूँगी। पर वे नहीं माने, तब मेरे हस्बैंड ने कहा कि इस तरह पड़ोसियों के बीच झगडा होना ठीक नहीं। आखिर मुझे उनकी बात मानकर गमले माली को देने पड़े।‘ 

   ‘आपको बुरा तो बहुत लगा होगा?’ जीतू ने पूछा। 

    ‘ऐसा लगा जैसे मेरी प्रिय चीज मुझसे छीन ली गई हो। मैंने माली कहा कि वह मेरे गमलों को अलग जगह में रखे। क्योंकि मैं अपने पौधों की देख भाल अपने हाथों से करना चाहती थी।‘ 

     ‘और फिर?’

      ‘फिर क्या, मैं हर दिन सोसाइटी के पार्क में जाकर अपने गमलों में पानी देती थी, उनके बारे में माली से पूछती रहती थी। शायद किसी दिन मेरा झुमका गमले में गिर गया होगा, मैंने बहुत ढूँढा पर कुछ पता नहीं चला, और मिलता भी कैसे।‘  –कह कर वह मुस्कराने लगीं। फिर उन्होंने सौ के दो नोट जीतू और शीतल की ओर बढ़ाते हुए कहा-‘ मेरा झुमका तुम दोनों के कारण ही मिल सका है। पैसे लेने से मना मत करना।‘   

     दोनों ने ही पैसे लेने से मना कर दिया। शीतल ने कहा-‘ मैडम जी, आपका झुमका मिलना तो  केवल एक संयोग था। हम ये पैसे नहीं ले सकते। हाँ, अगर आप मुझसे पौधे लेना चाहें तो उनके दाम मैं ख़ुशी से ले लूँगा।‘

      ‘ठीक है, तो फिर तुम मुझे वही गमला दे दो जिसमें मेरा झुमका मिला है।‘ 

     मैडमजी,वह गमला तो टूटा हुआ है,वह भला आपके किस काम का।‘ 

     ‘ मैं उस टूटे गमले को अपने कमरे में रखूंगी, वह मुझे इस घटना की याद दिलाता रहेगा।‘ 

      ‘आप ने बताया कि आपको पौधों से प्यार है,मैं सोचता हूँ कि  उस टूटे गमले को ठीक करके              

उसमें एक फूलदार पौधा लगाऊं और आप को भेंट कर दूं। –‘शीतल ने कहा|

                                       2 

    ‘वाह,इससे अच्छा क्या होगा भला। ’—लता ने कहा।फिर जीतू और शीतल विदा लेकर चले गए। 

     और फिर एक दिन शीतल एक फूलदार पौधे का गमला लेकर लता के पास आया। गमले के  टूटे हिस्सों को बड़ी सफाई से जोड़ा गया था। खिले फूलोँ वाला पौधा देख के लता बहुत खुश हो गई।   बोली—‘ मैं इस गमले को अपने कमरे में रखूंगी।‘ 

     ‘ मैडमजी, इन फूलोँ पर ऐसा जुल्म न करें, कमरे के बंद माहौल में ये फूल जल्दी ही मुरझा जायेंगे। इन फूलों को इनके भाई--बंधुओं के साथ रहने दें। तभी ये खुश और खिले रह सकते हैं।‘ 

       लता कुछ पल सोचती खड़ी रही,फिर धीमे स्वर में कहा—‘ तुम्हारी बात ठीक है।पहले वाले पौधों को तो मुझे विवश होकर अपने से दूर करना पड़ा था, लेकिन अब ऐसी कोई  मजबूरी नहीं है,

फिर गमले को लेकर नीचे बाग़ में उतर गई। शीतल पीछे पीछे था।  लता को देखते ही माली पास चला आया। लता ने कहा—‘यह मेरे लिए खास है।‘  माली ने मुस्करा कर कहा—‘ मैं सब सुन चुका हूँ। क्या आप अपने इस विशेष पौधे को कहीं अलग रखना पसंद करेंगी या...  ’ लता ने माली को बीच में ही रोक कर कहा—‘ इसे अलग नहीं इसके परिवार के बीच ही रहने दो, तभी तो यह खुश रहेगा,’ यह कहते हुए वह मुस्करा रही थी।  माली और शीतल के होंठो भी हंसी आ गई थी।  (समाप्त)

 

 

                                 मिट्टी में क्या !-- देवेन्द्र कुमार   

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जीतू कबाड़ी ठेले पर कबाड़ ले जा रहा था।  टूटे हुए गमले, पुराना फर्नीचर और वैसा ही दूसरा सामान। तभी एक ठेला पास आकर रुक गया। ठेले पर पौधे और गमले रखे थे। ठेले वाले का नाम शीतल था। उसने जीतू से कहा-‘ मुझे टूटे गमले दोगे?’

  जीतू ने हैरान स्वर में कहा—‘ ऐसा आदमी मैंने पहली बार देखा है जो कूड़े में फैंके जाने वाले टूटे गमलों को लेना चाहता है। आखिर क्या करोगे इन टूटे गमलों का।  ’

  ‘ मैं टूटे गमलों की मरम्मत करके उनमें पौधे लगाता हूँ।  ’ 

  ‘और फिर उन्हें बेच कर पैसे कमा लेते हो। भई वाह।  ’

  ‘नहीं नहीं, मैं मरम्मत किये गए गमलो को कभी नहीं बेचता, मांगने पर किसी को भी दे देता हूँ। 

हां पौधों के दाम जरूर लेता हूँ।‘ शीतल बोला। 

   ‘अगर ऐसा है तो ले लो अपने काम लायक टूटे गमले।‘   

  शीतल ने कई गमले छांट लिए और सड़क पर गमलों में भरी मिटटी निकालने लगा। तभी जीतू ने आश्चर्य से कहा—‘अरे यह क्या!’अब शीतल ने भी उधर देखा—गमले से निकाली गयी मिटटी में एक कान का झुमका नज़र आ रहा था। दोनों हैरान रह गए। तब तक सोसाइटी का गार्ड वेणु भी आ गया था और दिलचस्पी से यह सब देख रहा था। झुमका मिटटी में रहने के कारण मटमैला हो गया था पर निश्चय ही सोने का था। 

  तभी वेणु ने कहा—‘ यह झुमका जरूर लता मैडम का होगा। वह एक दिन इसके बाग़ में खो जाने की बात कह रही थीं। हमें उनके पास चलना चाहिए।‘ और फिर वह शीतल और जीतू को लता जी के पास ले गया। झुमके को देखते ही लता जी ने उत्तेजित स्वर में कहा—‘ कहाँ मिला,मैंने बहुत ढूँढा पर कुछ पता नहीं चला।‘  इस पर शीतल ने झुमका मिलने की विचित्र घटना उन्हें बता दी और पूछा—‘मैडम, आपका झुमका गमले में कैसे गिर गया था?’

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  लता ने बताया—‘पहले हमारे पड़ोस में जो सज्जन रहते थे उन्हें शायद पेड़ पौधों से, हरियाली से नफरत थी। और मुझे बचपन से ही पौधे अच्छे लगते हैं, सो मैंने सीढ़ियों पर रेलिंग से सटा कर कुछ फूलदार पौधों के गमले रख दिए। उन्होंने कहा कि मैं सारे गमले तुरंत हटा लूं, क्योंकि गमलों में पानी देने से गीली सीढ़ियों पर कोई भी फिसल कर चोट खा सकता है।   मैंने उन्हें बहुत समझाया कि मैं सीढ़ियों को गीला नहीं होने दूँगी। पर वे नहीं माने, तब मेरे हस्बैंड ने कहा कि इस तरह पड़ोसियों के बीच झगडा होना ठीक नहीं। आखिर मुझे उनकी बात मानकर गमले माली को देने पड़े।‘ 

   ‘आपको बुरा तो बहुत लगा होगा?’ जीतू ने पूछा। 

    ‘ऐसा लगा जैसे मेरी प्रिय चीज मुझसे छीन ली गई हो। मैंने माली कहा कि वह मेरे गमलों को अलग जगह में रखे। क्योंकि मैं अपने पौधों की देख भाल अपने हाथों से करना चाहती थी।‘ 

     ‘और फिर?’

      ‘फिर क्या, मैं हर दिन सोसाइटी के पार्क में जाकर अपने गमलों में पानी देती थी, उनके बारे में माली से पूछती रहती थी। शायद किसी दिन मेरा झुमका गमले में गिर गया होगा, मैंने बहुत ढूँढा पर कुछ पता नहीं चला, और मिलता भी कैसे।‘  –कह कर वह मुस्कराने लगीं। फिर उन्होंने सौ के दो नोट जीतू और शीतल की ओर बढ़ाते हुए कहा-‘ मेरा झुमका तुम दोनों के कारण ही मिल सका है। पैसे लेने से मना मत करना।‘   

     दोनों ने ही पैसे लेने से मना कर दिया। शीतल ने कहा-‘ मैडम जी, आपका झुमका मिलना तो  केवल एक संयोग था। हम ये पैसे नहीं ले सकते। हाँ, अगर आप मुझसे पौधे लेना चाहें तो उनके दाम मैं ख़ुशी से ले लूँगा।‘

      ‘ठीक है, तो फिर तुम मुझे वही गमला दे दो जिसमें मेरा झुमका मिला है।‘ 

     मैडमजी,वह गमला तो टूटा हुआ है,वह भला आपके किस काम का।‘ 

     ‘ मैं उस टूटे गमले को अपने कमरे में रखूंगी, वह मुझे इस घटना की याद दिलाता रहेगा।‘ 

      ‘आप ने बताया कि आपको पौधों से प्यार है,मैं सोचता हूँ कि  उस टूटे गमले को ठीक करके              

उसमें एक फूलदार पौधा लगाऊं और आप को भेंट कर दूं। –‘शीतल ने कहा|

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    ‘वाह,इससे अच्छा क्या होगा भला। ’—लता ने कहा।फिर जीतू और शीतल विदा लेकर चले गए। 

     और फिर एक दिन शीतल एक फूलदार पौधे का गमला लेकर लता के पास आया। गमले के  टूटे हिस्सों को बड़ी सफाई से जोड़ा गया था। खिले फूलोँ वाला पौधा देख के लता बहुत खुश हो गई।   बोली—‘ मैं इस गमले को अपने कमरे में रखूंगी।‘ 

     ‘ मैडमजी, इन फूलोँ पर ऐसा जुल्म न करें, कमरे के बंद माहौल में ये फूल जल्दी ही मुरझा जायेंगे। इन फूलों को इनके भाई--बंधुओं के साथ रहने दें। तभी ये खुश और खिले रह सकते हैं।‘ 

       लता कुछ पल सोचती खड़ी रही,फिर धीमे स्वर में कहा—‘ तुम्हारी बात ठीक है।पहले वाले पौधों को तो मुझे विवश होकर अपने से दूर करना पड़ा था, लेकिन अब ऐसी कोई  मजबूरी नहीं है,

फिर गमले को लेकर नीचे बाग़ में उतर गई। शीतल पीछे पीछे था।  लता को देखते ही माली पास चला आया। लता ने कहा—‘यह मेरे लिए खास है।‘  माली ने मुस्करा कर कहा—‘ मैं सब सुन चुका हूँ। क्या आप अपने इस विशेष पौधे को कहीं अलग रखना पसंद करेंगी या...  ’ लता ने माली को बीच में ही रोक कर कहा—‘ इसे अलग नहीं इसके परिवार के बीच ही रहने दो, तभी तो यह खुश रहेगा,’ यह कहते हुए वह मुस्करा रही थी।  माली और शीतल के होंठो भी हंसी आ गई थी।  (समाप्त)

Tuesday, 4 July 2023

 

 

                 भाई-- बहन —देवेन्द्र कुमार  

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     आखिर क्या हुआ था रचना को? बाज़ार में इस बारे में कई लोगों ने पूछा पर रामदास ने हाथ हिला दिया और ठेले को तेजी से धकेलता हुआ आगे चला गया। ठेले पर उसकी बेटी रचना बैठी थी। उसके माथे से खून निकल रहा था। रामदास बेटी को जल्दी से जल्दी डाक्टर के पास पहुँचाना चाहता था कुछ देर बाद रचना की मरहम--पट्टी करवा कर लौटा तो उसने तसल्ली से लोगों को बताया कि गिरन से रचना को चोट लग गई थी। रामदास सब्जी बाज़ार में शाम के समय मलाई-कुल्फी का ठेला लगाता था। सब्जी के खरीदार उसकी कुल्फी भी चाव से खाते थे।

        बाज़ार में धन्नी ताई अपने सही भाव और तौल के लिए मशहूर थी। वह रचना से बहुत प्यार करती थी। रचना को भी धन्नी ताई अपनी दादी जैसी लगती थी। उन्होंने रचना के सिर पर हाथ फिराते  हुए पूछा –‘’ क्या हुआ बिटिया?’’

         रचना ने कहा—‘’दादी, मैं भैया... ’’ लेकिन वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई । रामदास चिल्ला कर बोला—‘’क्या भैया भैया कर रही है।’’ और ठेले को तेजी से आगे बढ़ा दिया।  ठेले को घर के बाहर लगा कर वह रचना को लगभग घसीटता हुआ अंदर ले गया। रचना की माँ शोभा ने कहा  —‘‘एक तो बच्ची को इतनी चोट लगी है, ऊपर से तुम उसे इस तरह डांट रहे हो।’’ 

        रामदास ने कहा-- ‘’तुम्हें पता भी है कि मामला क्या है। यह धन्नी को अविनाश के बारे में बताने को ही थी कि मैंने रोक दिया, वर्ना पूरे बाज़ार में बदनामी हो जाती।’’  रचना की चोट के बारे में रामदास ने झूठ बोला था। रचना को चोट गिरने से नहीं लगी थी। रचना के भाई अविनाश ने उस पर गिलास फेंका था, जो उसके माथे से जा टकराया। रचना का माथा लहूलुहान हो गया। अविनाश रचना से चार साल बडा है। दोनों भाई-बहन हमेशा प्यार से रहते आये हैं, लेकिन इधर कुछ समय से अविनाश रचना से चिढने लगा है। रामदास और शोभा बेटे के इस बदले हुए व्यवहार का कारण नहीं समझ पा रहे थे। रचना भी हैरान थी।

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        कुछ समय पहले की घटना है। स्कूल में सीढियां उतरते समय अविनाश फिसल गया था। उसके  पैरों में चोट आ गई थी। दोनों पैरों पर प्लास्टर चढ़ने के कारण वह स्कूल नहीं जा पा रहा था। उसे दोस्तों के साथ मस्ती करना पसंद था,लेकिन अब तो घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था। वह बैठा हुआ देखता रहता था कि घर के सारे काम पहले की तरह चल रहे हैं, जैसे उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। शायद वह घर में होते हुए भी नहीं है। पर ऐसा बिलकुल नहीं था। माँ, पिता और रचना उसका पूरा ख्याल रखते थे। पर अविनाश सबसे नाराज़ ही रहता था, खास कर रचना से।  वह सदा गुनगुनाती रहती थी। रचना का गला सुरीला था। स्कूल की म्यूजिक प्रतियोगिता में वह कई बार पुरस्कार भी जीत चुकी थी।

          इस बार भी रचना कार्यक्रम की तैयारी कर रही थी। इसलिए वह स्कूल से आने के बाद  अभ्यास करती रहती थी। लेकिन अविनाश माँ से कहता था -–‘’मेरे सिर में दर्द होता है इसकी आवाज़ से, इससे कहो कहीं और जाकर गाना-–बजाना करे।’’  माँ ने उसे बहुत समझाया पर वह किसी भी तरह मानने को तैयार नहीं हुआ। भाई के इस बेतुके व्यवहार से रचना का मन बहुत दुखी हुआ। उसने सोच लिया कि इस बार प्रतियोगिता में भाग नहीं लेगी।

          रात को सब सो गए लेकिन रचना को नींद नहीं आ रही थी। अचानक उसकी रुलाई फूट पड़ी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अविनाश ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा था। माँ ने बेटी का रोना सुना तो पास आकर चुप कराने लगी। अविनाश भी जाग रहा था। रचना ने सिसकते हुए कहा—‘’भैया मुझसे इसीलिए खफा है न कि उसे चोट लगी है और मैं भली चंगी हूँ। लेकिन अब तो मैं भी भैया जैसी हो गई हूँ। क्या अब भी वह मुझ से नाराज रहेगा? ‘’ रचना के सिर में गिलास का कोना चुभने से गहरा घाव हो गया था। डाक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी। वह भी स्कूल नहीं जा सकती थी।

       माँ ने पूछा-–‘’क्या तू धन्नी ताई से अविनाश की शिकायत करने वाली थी? तेरे बापू तो यही  बता रहे थे।’’

      ‘’ नहीं माँ, बापू ने गलत समझा। मैं कभी भैया की शिकायत नहीं कर सकती। मैं तो उनसे यही कह रही थी कि चोट लगने से मैं भी भैया जैसी हो गई। पर बापू पूरी बात सुने बिना ही गुस्सा हो गए।’’

       फिर सन्नाटा हो गया। रचना की माँ सो गई पर रचना नहीं सो सकी। वह उठ कर अविनाश की चारपाई के पास जा खड़ी हुई। उसे लगा अविनाश सो गया है, पर वह जाग रहा था। उसने सुना—रचना धीरे धीरे कह रहीं थी—‘’भैया, अब तो गुस्सा छोड़ दो। देखो ना, अब तो मैं भी तुम्हारे जैसी हो गई हूँ।‘’

                                    2

      एकाएक अविनाश उठ कर बैठ गया। उसने रचना का हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने रुंधे गले से कहा— ‘’नहीं रचना,कभी नहीं। मेरे जैसी मत बनना। जैसी हो वैसी ही रहना। मैंने कितनी बार बिना पूछे  बापू की जेब से पैसे लिए हैं। कई बार स्कूल  के बीच जाकर  दोस्तों के साथ फिल्म देखी है।’’ वह रो रहा था। रचना भाई से लिपट गई—‘’मेरा भैया बहुत अच्छा है। तुम कभी कोई गलत काम नहीं कर सकते।’’ दोनों की आँखों से आंसू बह रहे थे।

       उन दोनों की बातें माँ ने भी सुन ली थीं। वह आकर उन्हें प्यार करने लगी। अविनाश से कहा -–‘’बेटा,गलती सबसे होती है। तेरे बापू भी अपने बचपन की ऐसी ही बातें सुनाया करते हैं। जो हुआ उसे भूल जाओ, दोनों भाई-बहन प्यार से रहो।’’

         ‘’लेकिन माँ मैंने रचना के सिर पर गिलास फैंक कर मारा, इसे बहुत चोट लगी है।’’

          ‘’कहाँ है चोट! वह तो कब की ठीक हो गई।’’-- अँधेरे में रचना की हंसी सुनाई दी। माँ की हथेलियाँ दोनों के सिर सहला रही थीं।  ( समाप्त )