Thursday, 9 March 2023

गलत आदमी-कहानी-देवेंद्र कुमार

 

  गलत आदमी-कहानी-देवेंद्र कुमार

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मैं रिक्शा में बाजार जा रहा था। एकाएक आवाज आई, “सर, प्रणाम। और एक स्कूटर रिक्शा के पास आकर रुक गया। मैंने रिक्शा वाले से रुकने को कहा। स्कूटर सवार ने मेरे पैर छू लिए। मैंने उसे पहचान लियावह मेरा पुराना छात्र यशपाल था। उसने कहा, “मैंने तो आपको दूर से पहचान लिया था,” फिर वह मेरे परिवार के हालचाल पूछने लगा। मैंने यशपाल के घरपरिवार की जानकारी ली। यशपाल ने बताया कि एक अच्छी नौकरी के लिए उसका सिलेक्शन हो गया है। मैंने उसे आशीर्वाद दिया। यशपाल ने एक बार फिर मेरे पैर छुए और चला गया।

अपने पुराने छात्र से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने रिक्शा वाले से आगे चलने के लिए कहा, पर वह रुका खड़ा रहा। मैंने कहा, “चलो रिक्शा बढाओ।

क्या आप उस लड़के को जानते हैं जो आपके पैर छू कर गया है?”

जानूंगा क्यों नहीं, वह मेरा पुराना छात्र है। हमेशा अव्वल आता था। ऐसे छात्रों पर टीचर को बहुत गर्व होता है।”—मैंने कहा, “खैर तुम रिक्शा आगे बढाओ।

आप जिसे इतना अच्छा बता रहे हैं, वह अच्छा नहीं गलत आदमी है।”—रिक्शा वाले ने कहा।

यशपाल के बारे में उसकी ऊल जलूल बातों से मुझे गुस्सा गया। तुम ये क्या बकवास कर रहे हो। क्या तुम उसे पहले से जानते हो?” मैंने तेज स्वर में पूछा।

जी नहीं। मैंने तो बस दो दिन पहले इस लड़के को पहली बार देखा था बड़े बाज़ार के चौराहे पर।

तब फिर ऐसी गलत बात क्यों कह रहे हो एक अनजान लड़के के बारे में!

मैं आपको पूरी बात बतलाता हूँ।”—उसने कहा, “मैं सवारी के इन्तजार में चौराहे पर खड़ा था। तभी एक स्कूटर सवार तेजी से आया और एक बच्ची को धक्का मार कर चला गया। बच्ची गिर पड़ी और जोर जोर से चीखने लगी। बच्ची की माँ चिल्लाई तो लोग स्कूटर सवार के पीछे दौड़े, पर वह रुका नहीं, आगे निकल गया। कोई उसे पकड़ नहीं पाया। पर मैंने उसका चेहरा देख लिया था। आज जब वह मेरे पास आकर रुका तो मैं उसे तुरंत पहचान गया। रिक्शा चालक अमजद ने कहा। इसी बीच मैंने उसका नाम पूछ लिया था।

मुझे धक्का लगा। क्या अमजद सचमुच सच कह रहा है, शायद हाँ शायद नहीं। पर मेरा मन यह मानने को एकदम तैयार नहीं था कि यशपाल एक बच्ची को घायल करके इस तरह भाग सकता था। मेरे विचार से वह जो भी था उसे रुक कर घायल बच्ची को देखना चाहिए था। लेकिन यह भी तो हो सकता था कि अमजद को भ्रम हुआ हो। बच्ची को गिरा कर भाग जाने वाला यशपाल नहीं कोई और ही हो। मैंने अमजद से यही कहा, “मुझे लगता है वह कोई और रहा होगा। तुमने दूर से उसका चेहरा देखा था, फिर इतने विश्वास से कैसे कह रहे हो कि यह लड़का वही था।

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मैंने उसे ठीक पहचाना है। यह वही था। क्या आप जानते हैं कि यह लड़का कहाँ रहता है?”

मैं यशपाल से जाने कितने सालों बाद मिला हूँ। मुझे पता नहीं कि वह कहाँ रहता है लेकिन अगर कभी मिला तो उस घटना के बारे में पूछूँगा जरूर।”—मैंने अमजद से कहा।

ऐसे गलत लोगों को सज़ा जरूर मिलनी चाहिए।

तुमने ठीक कहा, वह जो भी था उसे रुक कर घायल बच्ची को डाक्टर के पास ले जाना चाहिये था। मैंने कहा, पर मेरा मन अब भी यह मानने को तैयार नहीं था कि बच्ची को घायल कर के भाग जाने वाला यशपाल था।

अमजद ने रिक्शा आगे बढ़ा दी। मैंने पूछा, “अब बच्ची कैसी है? क्या तुम्हें कुछ पता है?”

हाँ मैं जानता हूँ दोनों माँबेटी को। यहीँ पास में रहती हैं।

तब तो तुमने जाकर जरूर बच्ची का हाल चाल लिया होगा।

अमजद कुछ देर की चुप्पी के बाद बोला, “नहीं मैं बच्ची का हाल पूछने नहीं जा सका। उस घटना के बाद एक लम्बी सवारी मिल गयी और मैं रात में बहुत देर से लौटा था।

मुझे ले चलो बच्ची के पास।”—मैंने कहा। मैं सोच रहा थामान लो अगर बच्ची स्कूटर से ही घायल हुई है तो मुझे उसकी मदद जरूर करनी चाहिए। यशपाल से झूठ सच का हिसाब बाद में भी लिया जा सकता है।

अमजद मुझे बच्ची के पास ले गया। बच्ची की माँ उसे गोद में लिए बैठी थी। अमजद को देखते ही वह रोकर बोली, “भैया तुम भी मदद को नहीं आए।

मैने देखाबच्ची का पैर सूजा हुआ था। अमजद चुप खड़ा था। मेरे पूछने पर बच्ची की माँ ने पूरी घटना के बारे में बताया। एक कमरे के उस घर में गरीबी की छाप थी। मैंने बच्ची के पिता के बारे में पूछा तो माँ ने कहा, “मुनिया के बापू परदेस में नौकरी करते हैं। दो दिन में आएँगे।

मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि अभी तक मुनिया की चोट का इलाज नहीं हुआ है। मैंने मुनिया की माँ से कहा, “मुनिया का इलाज तुरंत होना चाहिए। एक डाक्टर मेरे जानकार हैं। आओ इसे उनके पास ले चलें।

लेकिन... मुनिया की माँ ने कहना चाहा पर तब तक अमजद मेरे इशारे पर मुनिया को घर से बाहर ले आया। मुनिया की माँ उसे गोदी में लेकर रिक्शा में जा बैठी। डाक्टर का दवाखाना पास ही था। डाक्टर मुझे अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने मुनिया की अच्छी तरह जाँच की, पैर का एक्सरे किया। पता चला कोई फ्रैक्चर नहीं था। डाक्टर ने घाव साफ़ करके पट्टी कर दी। मुझे बताया कि कई दिन तक दवा लेनी होगी। मैंने उन्हें सारी बात समझा दीयही कि मुनिया की माँ इलाज का खर्च नहीं उठा सकती। मैंने कहा, “मुनिया के इलाज का सारा पैसा मैं दूँगा, लेकिन यह बात मुनिया की माँ के सामने नहीं आनी चाहिए।‘’

 डाक्टर साहब ने मुनिया की माँ को अंदर बुला कर कहा, “तुम्हें मुनिया के इलाज के पैसे नहीं देने होंगे। मैं उसका इलाज मुफ्त करूँगा। सुनकर वह डाक्टर के पैर छूने बढ़ी तो उन्होंने कहा, “यह सब छोड़ो, बस अपनी बच्ची का ध्यान रखो, बीच बीच में दिखाने आती रहो।

अब मुझे मुनिया की ओर से तो तसल्ली थी, लेकिन यशपाल को लेकर मन परेशान था। बार बार अमजद की कही बात मन में कांटे की तरह चुभ जाती थी। क्या सच मुनिया को घायल करके भाग जाने वाला यशपाल ही था। मन जैसे दो हिस्सों में बंट गया था। एक अमजद की बात को सही ठहरा रहा था तो दूसरा मन कहता था कि यह सच नहीं हो सकता। मेरा योग्य छात्र ऐसा कभी नहीं करेगा। मैं नहीं जानता कि यशपाल मुझे कब और कहाँ मिल्रेगा। बाजार आते जाते हुए मुझे कई बार अमजद दिख जाता है। लेकिन मैं उससे बच कर चलता हूँ। मुझे मालूम है कि वह मुझसे क्या पूछेगा। मैं यशपाल के बारे में बिलकुल भी सोचना नहीं चाहता लेकिन. ऐसा  कोई दिन नहीं जाता जब मन यशपाल के बारे में एक प्रश्न बार बार न  पूछे  -क्या बच्ची को टक्कर मार कर भाग जाने वाला मेरा योग्य छात्र यशपल था ? क्या वह फिर कभी मुझसे मिलेगा और मैं यह जान सकूंगा कि सच क्या है? काश  बच्ची का अपराधी यशपाल न हो। हाँ बच्ची का पैर अब ठीक है, कभी कभी मैं उससे मिलने चला जाता हूँ। वह मेरी कुछ न होते हुए भी मुझसे  गहरे जुड़ गई है. मैं इस नए सम्बन्ध को कभी टूटने नहीं दूंगा.  (समाप्त )


 

 

Tuesday, 7 March 2023

सिक्का और सांप-कहानी-देवेंद्र कुमार ==

 

सिक्का और सांप-कहानी-देवेंद्र कुमार

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बस्ती से कुछ दूर एक प्राचीन इमारत के खंडहर थे। शायद कभी किसी सामंत या नगर सेठ की हवेली रही हो, जो अब समय के थपेड़ों से टूट-फूट गई थी। काफी बड़े क्षेत्र में पत्थर बिखरे हुए थे। उसका इतिहास कोई नहीं जानता था। और जानने की कोई जरूरत भी नहीं थी। रात की क्या बात, लोग इस खंडहर से दिन में भी बचकर चलते थे। खंडहर के बाहर एक विशाल पेड़ था। लोग कहते थे, वहां रात में चोर-बदमाश आते थे, सियार जैसे जंगली जानवर वहां घूमते देखे जा सकते थे। लेकिन एक रात लोगों ने खंडहर की ओर से आती आवाज सुनी और चौंक गए। न जाने कौन भजन गा रहा था। सबको उत्कंठा हुई। सुबह देखा, पेड़ के नीचे एक साधु बाबा ने धूनी रमा रखी है। जल्दी ही पूरी बस्ती में यह खबर फैल गई। उस दिन पहली बार खंडहर के भाग जागे।

बस्ती वालों ने साधु बाबा से कई बार प्रार्थना की-‘‘महाराज, आप बस्ती के मंदिर में चलकर आसन लगाएं।’’ पर साधु बाबा हमेशा मना कर देते। कहते-‘‘मैं यही ठीक हूं, यदि तुम चाहो तो रात के समय खंडहर के किसी भी कोने में एक दीपक जला देना।’’

साधु बाबा के कहने पर खंडहर के हर कोने में दीपक जला दिए गए। धीरे-धीरे खंडहर ने एक पवित्र मंदिर का रूप ले लिया। यों ऊपर से उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया था, किंतु अब वहां रात को भी अंधेरा नहीं रहता था।घुप अंधेरे में खंडहर हल्के प्रकाश में चमकता

अब उस बस्ती के ही नहीं दूर-दूर से लोग वहां पहुंचने लगे। रविवार के दिन तो वहां मेला सा लग जाता। एक रोज बस्ती का माना हुआ बदमाश सिक्का भी भीड़ में दिखाई दिया। वह कुछ दिन पहले ही जेल से छूटकर आया था। चोरी, ठगी के न जाने कितने मुकदमे चल रहे थे उस पर। एक मुकदमे में सजा काटकर आता तो फिर कुछ कांड कर देता और दोबारा जेल के सींखचों के पीछे दिखाई देता। लोग उसकी छाया से भी बचते थें, उसे देखकर सब इधर-उधर हो गए। आपस में फुसफुसाने लगे। सिक्का ने साधु को नमस्कार किया और चला गया। उसके जाने के बाद लोगों ने साधु बाबा को सिक्का की करतूतें बताईं। सुनकर बाबा मुस्करा उठे। लोग चाहते थे कि बाबा सिक्का को वहां न आने दें। बाबा ने कहा-‘‘ईश्वर की बनाई दुनिया में अंधेरे और उजाले की लड़ाई हमेशा रहती है। मैं यहां कोई बंधन नहीं लगा सकता।’’

लोग चुप रह गए, पर उनके मन में आशंकाएं पलती रहीं। होली के दिन  विशेष उत्सव मनाया गया। दूर-दूर से लोग आए। पहले भजन-कीर्तन , रंग- गुलाल और फिर भोजन का कार्यक्रम था। एकाएक वहां एक औरत चीखने लगी। ‘‘बाबा, मेरा गलहार चोरी हो गया।’’ इधर-उधर ढूंढ़ा गया, पर हार का पता नहीं चला। किसी ने कहा-‘‘हार मिलने से रहा, अब तो यहां सिक्का चक्कर मारने लगा है। जो न हो जाए कम है।’’

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उस दिन यही चर्चा होती रही। सब सिक्का को कोस रहे थे। थोड़ी देर बाद सिक्का वहां दिखाई दिया। उसने साधु बाबा के चरण छुए और हाथ जोड़कर बैठ गया। लोग कहने लगे-‘‘देखो, कैसा बगुला भगत बना बैठा है। जरूर इसी ने हार उड़ाया है।’’ सिक्का के जाने के बाद भक्तों ने मिलकर बाबा से शिकायत की। वे चाहते थे, बाबा कोई उपाय करें।

साधु महाराज ने कहा-‘‘सिक्का चोर है, इसका मतलब यह तो नहीं कि हार उसी ने चुराया है।’’

‘‘तो फिर कहां गया?’’

इस पर बाबा मौन हो गए, आंखें मूंद लीं। हार का पता नहीं चला। सिक्का उसी तरह साधु बाबा के पास आता रहा।

कुछ समय बाद फिर समारोह हुआ. बाबा को खंडहर में आये एक वर्ष पूरा हो गया था. भीड़ जमा हुई.बाबा पेड़ के नीचे बैठे प्रवचन कर रहे थे। तभी एक चीख गूंजी-‘‘सांप...सांप...’’ लोग इधर-उधर भागने लगे। स्त्रियां और बच्चे रोने-चीखने लगे। भीड़ काई की तरह फट गइ। एक काला सांप लहराता हुआ नजर आया और झाडि़यों में घुस गया। एक आदमी चीख उठा-‘‘बाबा, मुझे सांप ने काट लिया... मैं मरा...’’

सब जैसे पत्थर की प्रतिमाएं बन गए...साधु महाराज आसन से उठ खड़े हुए- उन्होंने बढ़कर उस आदमी का पैर कसकर पकड़ लिया। पिंडली पर सांप काटे का निशान दिख रहा था।

 

फिर साधु बोले-‘‘कोई जल्दी से डाक्टर को बुलाओ।’’

‘‘बाबा, इतने बड़े संत हैं, कुछ कीजिए। मंत्र से विष उतार दीजिए...’’ कुछ लोग घबराकर बोले।

‘‘मैं जादूगर नहीं, भगवान का तुच्छ सेवक हूं। तुम जैसा हूं। समय मत गंवाओ, जल्दी जाओ।’’ साधु बाबा ने क्रोध से कहा।

तभी भीड़ को चीरकर सिक्का आगे बढ़ आया। उसने कहा-‘‘डाक्टर के आने तक तो बहुत देर हो जाएगी।’’ और अपना मुंह सांप काटे स्थान पर टिका कर चूसने लगा। वह चूसता जाता, थूकता जाता। दोनों ओर लोग तमाशबीनों की तरह खड़े थे। रोगी को अस्पताल ले जाया गया।दो दिन में वह आदमी स्वस्थ हो गया, जिसे सांप ने काटा था। कई दिन तक सिक्का की भी तबीयत खराब रही। लेकिन इससे आगे कुछ पता नहीं चला, क्योंकि उसी रात पुलिस उसे पकड़ कर ले गई। दिन में उसने कहीं से माल चुराया था, पुलिस उसके पीछे थी।

बाद में लोगों ने साधु महाराज से कहा-‘‘महाराज, हम आपसे न कहते थे कि सिक्का पक्का चोर है। देख लीजिए, आज फिर पकड़ा गया। हार भी उसने ने चुराया होगा।’’

बाबा धीरे से हंस दिए। बोले-‘‘हो सकता है, चुराया हो। सिक्का बुरा आदमी है। उसके मन में अंधेरा है लेकिन कहीं उजाले की नन्ही किरण भी है, यह उसने उस दिन अपने प्राणों पर खेलकर प्रमाणित कर दिया था। हो सकता है जेल से छूटकर वह फिर चोरी करे और पकड़ा जाए, लेकिन मेरा विश्वास है वह मन के अंधेरे से लड़ रहा है।

सब चुप खड़े थे। (समाप्त )