Tuesday, 13 December 2022

माँ नहीं -संस्मरण -देवेंद्र कुमार

 

 

माँ नहीं -संस्मरण -देवेंद्र कुमार  

 

जब भी अतीत की गलियों में जाता हूँ तो सबसे पहली छवि माँ की दिखाई देती हैऔर मैंने संस्मरण का नाम रखा है _  माँ नहीं’ । यह कैसी उलटबांसी है! माँ थी, जीती जागती, मुझे छूने को हाथ बढ़ाती , मेरी ओर आती हुईलेकिन माँ जितना मेरी तरफ बढती थी मैं उतना ही पीछे खिसक जाता था, मन करता था जाकर उनकी गोद में लेटकर आँखें बंद कर लूं , उनकी स्नेहिल उंगलियाँ मेरे माथे को थपकती रहें और मुझे गहरी नींद आ जाएलेकिन ऐसा न   हुआऐसा होना चाहिए था पर नहीं हुआ

मैंने नानी से सुना था मेरे पिता रामपुर में डाक्टर थे, मैं उन्हें नहीं देख सकाउन्हें न जाने किसने जहर दे दिया थातब मैं एक वर्ष का भी नहीं थामाँ मुझे लेकर दिल्ली आ गई थीं नानी के पासयह नानी का दूसरा दुःख थाक्या यह एक संयोग था ? मेरे नाना देहरादून में फारेस्ट अफसर थेउनकी मौत भी जहर दिए जाने से हुई थीकोई सम्पत्ति विवाद थानानी मेरी माँ को लेकर दिल्ली आ गई थीं तब मेरी माँ एक वर्ष की थीं 

माँ की दूसरी शादी कर दी गईमाँ ने इसका बहुत विरोध किया थावह मुझे पढ़ा- लिखा कर बड़ा करना चाहती थींये बातें बाद में नानी मुझे टुकड़ों टुकड़ों में बताया करती थींमाँ का दूसरा विवाह मंदिर में सादे ढंग से हुआ थाउस समय मुझे किसी के साथ कहीं भेज दिया गया थामाँ मेरे लिए जैसे एकदम गायब हो गईं थींमैं जब माँ को बुलाता था तब नानी कहती थीं –‘ कहीं काम से गई है तेरी माँ अभी आ जायेगी,’

माँ कुछ समय बाद आईं यह तो मेरी माँ नहीं थीउनके साथ एक अनजान आदमी थावह मेरा डाक्टर पिता नहीं थामाँ लाल साडी में थींउन्होंने कोठे में जाकर मुझे गोद में भर लिया और जोर से रो पड़ींमुझे प्यार करने लगींमैं उनकी पकड़ से छूट कर बाहर भाग आयामुझे माँ पर बहुत गुस्सा आ रहा थाआखिर मुझे छोड़ कर वह कहाँ चली गई थीं? और वह अनजान आदमी कौन था? क्या वही माँ को मुझसे छीनकर ले गया था? माँ दो दिन घर में रहीं और फिर उस आदमी के साथ चली गई इस बीच मैं माँ के पास नहीं गयावह जब भी मुझे गोद में भरतीं मैं छिटक कर दूर भाग जाताऔर तब मैं उन्हें रोते हुए देखता मैं नाराज़  क्यों न होतावह मुझे बिना बताये उस अनजान आदमी के साथ चली जो गई थीं

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बड़ा विचित्र था माँ का और मेरा सम्बन्ध मैं उन्हें अपना अपराधी मानता थाइसलिए जब वह कुछ दिनों के लिए मेरे साथ होतीं तो मैं उनसे दूर-दूर भागतामैं उन्हें देखता दिन में कई बार नानी से लिपट कर रोते हुएउनका सारा समय मुझे अपने पास बुलाने  और गोद में लेकर प्यार करने की कोशिश में बीत जाता थामेरी नानी कहती-‘ अरे, पूरनजी से नमस्ते तो कर ले।’ पर मैं कभी ऐसा न करतामाँ के नए पति का नाम पूरन चन्द्र थामैं उस आदमी को अपने पिता की जगह कैसे मान सकता थामुझे बाद में पता चला था कि उसकी पहली पत्नी मर गई थी और मेरी माँ को उसके पांच बच्चों की सौतेली माँ बनना पड़ा थाउसकी सबसे बड़ी लड़की मेरी माँ की उम्र की थी यह सब बहुत बाद में बताया था नानी ने

मैं नानी से पूछना चाहता था कि माँ मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गई थीं? यह बहुत बाद में समझ आया कि जबरदस्ती दूसरी शादी होने और मुझे साथ न जा सकने का कारण उनका औरत होना थावह अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकी थीं

 एक रहस्य मेरे सामने राघव ने खोला थावह हमारी गली के पास दूसरी गली में रहते थे मैंने उन्हें कभी अपने घर में आते नहीं देखा थावह जब जहां मुझे देखते तो प्यार करने लगतेएक दिन मैंने नानी से राघव के बारे में पूछा तो वह राघव को गालियाँ देने लगींकहा-राघव बहुत खराब आदमी हैउससे कभी मत मिलनाउनकी बात मेरी समझ में नहीं आई  एक दिन पता चला राघव को चोट लगी हैमैं नानी से छिप कर उनके घर चला गयाराघव ने मुझे माँ का फोटो दिखायामें हैरान रह गयाभला उनके पास मेरी माँ का फोटो कैसे था! उन्होंने खुद बताया कि वह माँ को पढ़ाने हमारे घर जाया करते थेवह माँ से शादी करना चाहते थेउन्होंने मुझे भी माँ के साथ ले जाने की बात कही थीपर उनके हमारे घर में घुसने पर रोक लगा दी गई, और फिर माँ की शादी उम्र में माँ से काफी बड़े ,पांच बच्चों के पिता के साथ कर दी गई थीपता नहीं ऐसी क्या मजबूरी रही होगीनानी ने इस बारे में कुछ नहीं बताया

माँ के इस तरह हो कर भी न होने का सबसे बुरा असर मेरी पढाई पर पड़ागणित के मास्टर जैमल सिंह बहुत मारते थेऔर गणित मेरी सबसे बड़ी आफत थाऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब मार न पड़ी होइसका आसान हल यही सूझा कि मैं स्कूल ही न जाऊंमैं स्टेशन चला जाता था और वहाँ सारा दिन बिता कर छुट्टी के समय घर पहुँच जाता था

इस बीच माँ वर्ष में एक बार कुछ दिनों के लिए आती रहीं और मैं सदा दूर ही भागता रहाअब तक यह समझ आ चुका था कि माँ पांच बच्चों के पिता से छूट कर कभी मेरे पास लौटने वाली नहींएक वर्ष माँ नहीं आईं शायद कोई बीमार थामैं उनसे मिलने को बैचैन हो उठानानी ने मेरी बैचेनी समझ लीबोलीं-‘ जब वह आती है तब उससे दूर भागता रहता हैअब क्यों बैचैन हो रहा है ।’ मैं भला क्या कहतापर हर बीतते दिन के साथ मेरी परेशानी बढती जा रही थीएक रात नींद खुल गई और ऐसा लगा कि अब माँ को कभी देख नहीं पाऊंगामेरी आँखों से आंसू बहने लगे नानी को पता न चलावह गहरी नींद में थींऔर मैंने निश्चय कर लिया कि माँ से मिलने जाऊँगा

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कैसे जाऊँगा ,किसके साथ जाऊँगा यह पता नहीं थाहाँ यह बात नानी को किसी कीमत पर नहीं बतानी थीमैंने बहुत सोचा पर माँ के पास गुप चुप पंहुचने का कोई तरीका नहीं सूझाउन दिनों माँ महू में रहती थीं जो इंदौर के निकट हैउस समय मैं इस बात को भूल गया था कि जब वह नानी के पास आती थीं तब मैं  उनकी छाया से भी दूर भागता थापता नहीं क्यों यह बात मेरे मन में जड़ जमा कर बैठ गई थी कि माँ बीमार होने के कारण ही उस बार नानी के पास नहीं आई थींमैं जितना सोचता उतनी ही चिंता बढती जाती

उस दिन मैं स्कूल न जाकर स्टेशन चला गयापुल पर खड़ा हुआ आती-जाती गाड़ियों को देखता रहाफिर मन में विचार कौंधा और मैं उछल पड़ाअरे अगर मैं रेल लाइन के साथ साथ चलता जाऊं तो गाडी की तरह महू पंहुच सकता हूँमैंने इसी तरह माँ के पास पहुँचने का इरादा बना लियारात में मैंने सोच लिया कि कैसे क्या करना हैमैं जानता था कि नानी को इस बात  की भनक भी नहीं लगनी चाहिएसुबह उठ कर मैंने बस्ते से किताबें निकाल कर कोठे में छिपा दीं फिर उसमें एक पाजामा -कमीज रख लींमेरे पास बस दो रूपये का नोट थानानी पूजा कर रहीं थीं और मैं माँ से मिलने निकल पड़ाउस समय मैं और कुछ नहीं सोच रहा थास्टेशन पहुँच कर मै रेल लाइन के साथ वाली पगडण्डी पर चलने लगामेरे पास से थोड़ी थोड़ी देर बाद गाड़ियां गुजरती जा रहीं थीं

जनवरी का महीना थाठंडी हवा चल रही थीधूप भली लग रही थीचलते हुए नानी की याद भी आ रही थीपता नहीं वह मुझे कहाँ- कहाँ ढूँढ रही होंगीकहीं उन्हें बिना बताये आकर मैने गलती तो नहीं कर दीलेकिन फिर माँ की याद आई और मैं बढता रहादोपहर ढलने लगी,धूप हलकी पड़ गईहवा ठंडी हो गई थीमैं एक स्टेशन के पास पहुंचा तो अँधेरा होने लगा थाअब याद नहीं कि वह कौन सा स्टेशन थाशायद ओखला था, मैं वेटिंग रूम में चला गयाइतनी बात समझ में आ रही थी कि रात के अँधेरे में रेल लाइन के साथ- साथ नहीं चला जा सकेगा

वेटिंग रूम सब तरफ से खुला हुआ थाबर्फ सी ठंडी हवा बदन में चुभने लगीमेरे पास ओढने को कुछ नहीं थामैंने देखा वहां बैठे सभी लोग चादर और कम्बल में लिपटे हुए थेइस तरह घर से आकर शायद   मैंने बड़ी भूल कर दी थीलेकिन अब भला क्या हो सकता थामैं घुटनों  में सिर दबा कर बैठा रहामेरे दांत किटकिटा रहे थेपता नहीं मैं कब तक इस तरह बैठा रहातभी किसी ने मुझे छुआ , एक आदमी मेरे पास खड़ा थाउसने मेरा हाथ पकड़ कर कहा-‘आओ बच्चे।’ वह मुझे वेटिंग हाल के कोने में ले गयाबोला-‘यहाँ बैठ जाओ।’ मैंने देखा वहां कम्बलों पर कई लड़के बैठे थेवे चाय पीते हुए कुछ खा रहे थेउस आदमी ने चाय का गिलास थमा कर कहा-‘ चाय पी लो।’ कुछ बिस्किट भी दिएमुझे ठण्ड और भूख दोनों परेशान कर रही थींमें चाय पी रहा था तो उसने मुझे कम्बल ओढा दियामुझे चैन मिला

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                   उसने पूछा-‘ घर से भाग कर आये हो?’

मैंने कहा-‘ नहीं, मैं भाग कर नहीं आयामैं माँ के पास जा रहा हूँ। ‘

साथ में और कौन है?’

कोई नहीं।’

माँ कहाँ है?’

  मैंने कहा-‘ महू। ‘

   वह मुझे घूरता रहा।’ जानते हो महू कितनी दूर है?’

   मैंने बता दिया कि कैसे जा रहा हूँ

मैं  भी महू से हूँ। ‘ फिर उसने बताया कि वह नाटक मण्डली लेकर जगह- जगह घूमता हैउसने वहां बैठे लड़कों की ओर इशारा कियामैंने देखा- उनमे कई मेरे जितने थेउस आदमी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा-‘ बच्चे , अपनी नानी के पास लौट जाओमाँ के पास इस तरह कभी नहीं पहुँच सकोगे। ‘

मैंने कहा-‘ मुझे माँ के पास जाना है।’ थकान से मेरी आँखें बंद हुई जा रही थींमैं कब सो  गया पता न चलाएकाएक इंजन की सीटी ने मुझे जगा दियामैं हडबडा कर उठ बैठामैरे उठते ही एक लड़के ने बिछा हुआ कम्बल समेट लियामैंने देखा- वे तैयार खड़े थेउस आदमी ने कहा-‘ बच्चे, हमें गाडी पकडनी हैजाओ नानी के पास लौट जाओ।’

मुझे माँ के पास जाना है।’ मैंने कहामैं उन्हें प्लेटफार्म पर लगी गाडी में सवार होते हुए देखता रहाअब मुझे आगे जाना था, जाने से पहले उस आदमी ने मुझे कुछ पैसे दिए थेकहा था-‘ नानी के पास लौट जाओ। ‘ मैं चुप खड़ा देखता रहालेकिन आगे जाना न हुआकुछ देर बाद मैंने नानी को वहां आते देखाउनके साथ हमारे कुछ रिश्तेदार भी थेनानी ने मुझे लिपटा  लिया और आंसू बहाने लगींमै हैरान था कि उन्हें मेरे वहाँ होने बात कैसे पता चलीउन्होंने बाद में बताया था कि गली के एक आदमी ने मुझे वहाँ देख लिया था और तुरंत जाकर नानी को खबर दे दी थी

माँ को भी इस बात की खबर मिल गई थीऔर दो दिन बाद वह नानी के पास आ गई  थींमुझे देख कर उन्होंने मेरी ओर हाथ बढाया तो मैं भाग कर गली में निकल आया , मैं उनसे नाराज थाउनसे बात नहीं करना चाहता था।।

                                            ( समाप्त )

 

 

 

 

Monday, 12 December 2022

मेरी माँ--कहानी--देवेन्द्र कुमार ================

 

 

              

                          मेरी माँ--कहानी--देवेन्द्र कुमार

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  मुझे बाज़ार जाने के लिए रिक्शा की तलाश थी। आसपास कोई रिक्शावाला दिखाई नहीं दे रहा था।   मैं इधर उधर देखता खड़ा था,तभी एक रिक्शा मेरी ओर आती नजर आई। रिक्शा चालक को देख कर मैं चौंक गया। वह तो कोई बच्चा लगा मुझे। वह रिक्शा चला नहीं पा रहा था। आखिर एक बच्चे को इस छोटी उम्र में रिक्शा खींचने की क्या जरूरत आ पड़ी थी। वह मुझसे रिक्शा में बैठने को कह रहा था, पर मैंने मना कर दिया। इतने में एक और रिक्शा आ गई। मैं  उस में बैठने लगा तो पहले वाला मुझसे  चिरौरी करने लगा। बोला-‘बाबू, मेरी रिक्शा में बैठ जाओ न। आज तो मुझे खाना भी नहीं मिला है। 

  मैंने बाज़ार जाने का विचार छोड़ दिया। लगा कि पहले इस बच्चे से बात करनी चाहिए। और मैं उसे सामने वाले ढाबे में ले गया।   उसके लिए खाना और अपने लिए चाय मंगवा ली। मैं उसकी कहानी जानना चाहता था। मैंने देखा वह खा नहीं रहा है। मैंने कहा-‘तुम कह रहे थे न कि सुबह से कुछ नहीं खाया है, फिर खा क्यों नहीं रहे हो!’

  ‘आप ने मेरी रिक्शा में सवारी तो की नहीं,मैं मुफ्त में नहीं खाऊंगा,’ वह बोला। उसकी बात मुझे                                                                          अच्छी लगी। मैंने कहा-‘ तुमने ठीक कहा, मुफ्त में किसी से कभी कुछ नहीं लेना चाहिए। मैं इस भोजन के बदले तुमसे कोई काम ले लूँगा। अब तो खा लो।’ वह खाने लगा। उसे खाते हुए देख कर लग रहा था कि वह सचमुच बहुत भूखा था। इस बीच मैं उसके परिवार के बारे में पूछता रहा।   उसका नाम जगन था। उसने बताया कि उसके पिता बहुत गुस्सैल हैं। बात बेबात उसके साथ मार पीट किया करते थे, इसीलिए वह घर से भाग आया है। माँ के बारे में पूछते ही उसकी आँखों में आंसू भर आये। बोला-‘पिता जितना मार पीट करते थे माँ उससे ज्यादा प्यार करती थीं। ’

  ‘तो माँ ने तुम्हें नहीं रोका यहाँ आने से?’

  ‘पिता के आगे माँ क्या करती भला। उनका प्यार मुझे पिटने से तो नहीं बचा सकता था।  इसीलिए मैं भाग आया। 

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  ‘माँ की याद तो आती होगी, कभी उनसे बात करते हो?’

  हम दोनों के पास मोबाइल नहीं है,बात कैसे हो? यहाँ मेरे गाँव के कई जने हैं,वही मेरी बात माँ को बताते हैं और उनका संदेसा मुझे लाकर देते हैं। जगन ने बताया ’वैसे माँ जल्दी ही मुझसे मिलने आएँगी,अभी हाल में उन्होंने कहलवाया है।‘ 

  ‘यह तो बहुत अच्छा होगा। मुझे भी मिलवाना अपनी माँ से।‘ फिर मैं चला आया। पर जगन की बात मन में घूमती रही। जहाँ मैंने जगन को खाना खिलाया था उस ढाबे का मालिक मुझे अच्छी तरह जानता था। मैंने जगन के बारे में उससे बात की तो वह जगन को काम पर रखने को राजी हो गया। ढाबे में ही उसके सोने का इंतजाम भी हो गया। मुझे तसल्ली हो गई थी और जगन भी खुश था। जब भी मैं ढाबे के सामने से गुजरता तो उसका हाल चाल पूछ लेता। ढाबे का मालिक जगन के काम से संतुष्ट था।   

  एक दिन जगन ने मुझे मोबाइल दिखाया। प्रसन्न स्वर में बोला-‘मालिक ने मुझे यह मोबाइल दिया है,अब मैं माँ से भी बात कर सकता हूँ।‘ 

  ‘पर तुमने कहा था न कि तुम्हारी माँ के पास मोबाइल नहीं है। फिर..’ 

  ‘हाँ यह तो है। ’-जगन ने कहा। तभी ढाबे वाले ने उसे आवाज दी और वह अंदर चला गया। पर माँ के प्रति उसकी ललक साफ़ झलक रही थी,क्या जगन अपनी माँ से कभी मिल पायेगा! मैं यही सोच रहा था। 

  उस दिन दरवाजे की घंटी बजी,देखा तो जगन खड़ा था। मुझे आश्चर्य हुआ, इससे पहले तो वह कभी नहीं आया था। मैं कुछ पूछता इससे पहले ही उसने उत्तेजित स्वर में कहा- ‘जल्दी चलिए, माँ आई है, ढाबे में चाय पी रही है। आप उनसे मिल लो।‘ 

  मैं उसके साथ ढाबे पर जा पहुंचा। जगन एक औरत को बाहर बुला लाया। मैंने नमस्ते करके उससे पूछा-‘क्या आप जगन की माँ हैं?

  ’हाँ।‘ उस  ने कहा। मुझे कुछ अजीब लगा। वह जगन से दूर खड़ी हुई थी जैसे उसे जानती न हो।   क्या यही प्यार था एक माँ का इतने समय से बिछड़े हुए बेटे के लिए!           

   ‘इसे अपने साथ ले जाओ या यहाँ इसके साथ रहो।’-मैंने कहा। जगन की माँ ने मेरी बात का कोई 

जवाब नहीं दिया। बोली- ‘मुझे काम है।‘ और फिर वह जगन की ओर देखे बिना चली गई। जगन ने जैसे मेरे मन को पढ़ लिया, बोला-‘माँ को कोई काम था इसलिए जाना पड़ा।‘ और ढाबे में चला गया।  मैं जगन की माँ के अजीब व्यवहार के बारे में सोच रहा था,तभी एक रिक्शावाला मेरे पास आया।  उसने कहा-‘तो जगन ने आपको अपनी नकली माँ से मिलवा दिया।’

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  ‘नकली माँ!’-मैंने अचरज के भाव से पूछा। 

  ‘और नहीं तो क्या। जगन ने जिस औरत से आपको मिलवाया, वह उसकी कोई नहीं है। वह मेरे एक साथी की माँ है। जगन ने मेरे साथी से कई बार कहा कि वह अपनी माँ को कुछ देर के लिए उस की माँ बनने को कह दे, ताकि उसे अपनी माँ कह कर आप से मिलवा सके। इसके लिए उसने हम सब को ढाबे में चाय भी पिलवाई। 

  ‘मेरे सामने इतना नाटक क्यों?’-मुझे जगन पर गुस्सा आ रहा था। 

  ‘बाबूजी, वह आपकी बहुत इज्जत करता है।आपने उसकी इतनी मदद जो की है।‘ 

  ‘झूठा,फरेबी।‘- मैंने कहा। 

  ‘जगन कई सालों से अनाथालय में रह रहा था, पर वहां से भी निकाल दिया गया उसे।‘रिक्शा वाले ने जगन के बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी दी |

  ‘लेकिन वह तो गाँव से भाग कर यहाँ आने की बात बता रहा था मुझे।‘गुस्सैल पिता और ममतामयी माँ के बारे में कहे गए उसके शब्द कानों में गूंजने लगे। और एक दिन मैं उस अनाथालय में जा पहुंचा जहाँ से जगन को निकाल दिया गया था। वहां के मैनेजर ने बताया कि जगन दूसरे बच्चों के साथ अक्सर झगड़ा करता था। वह कहा करता था कि गाँव में उसकी माँ रहती हैं और वह उनके पास चला जाएगा। इस पर दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।बस आपस में मार पीट हो जाती थी। एक बार किसी बच्चे ने उसे ‘बिना माँ का झूठा जगन’ कहा तो जगन ने उसे खूब मारा। उसकी शरारतों से तंग आकर जगन को  अनाथालय से निकाल दिया गया।   

  ‘क्या गाँव में उसकी माँ और गुस्सैल पिता की  कहानी झूठी थी ? आखिर सच क्या था?उस शाम मैं यह निश्चय करके ढाबे पर गया था कि उसके झूठ की पोल खोल कर रहूँगा और इसके बाद फिर कभी उससे नहीं मिलूँगा। मुझे देखते ही वह बाहर आ गया।बोला-‘माफ़ करना बाबूजी,उस दिन माँ को जरूरी काम था इसलिये वह जल्दी चली गई थीं उन्होंने कहा है कि अगली बार आयेंगी तब वह आपसे खूब बातें करेंगी।’

  यानि वह अब भी अपनी उस माँ की कल्पना में खोया हुआ था जो कहीं थी ही नहीं।शायद  मैं उसकी आँखों में ममतामयी माँ की छवि देख पा रहा था! पता नहीं क्यों मुझे अपना गुस्सा पिघलता हुआ लगा। वह अपनी 'माँ 'की  कल्पना में खोया हुआ था। और फिर  मैंने अपना इरादा बदल दिया। मैं उसके सपने को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था। मैंने कहा-‘ठीक है जब अगली बार तुम्हारी माँ आएँगी तो हम तीनों खूब बातें करेंगे।‘ 

  ‘वाह तब तो खूब मज़ा आएगा।’-कह कर जगन खिलखिला उठा। मुझे भी हंसी आ गई। मैं न चाहते हुए भी उसके सपने में शामिल हो गया था।  (समाप्त)       

 

             

                

              

                          

                

           

 

 

  

 

 

 


Tuesday, 6 December 2022

डबल ड्यूटी-कहानी-देवेंद्र कुमार

 

डबल ड्यूटी-कहानी-देवेंद्र कुमार

 

लखमा तेजी से हाथ चला रही है। आज उसे जल्दी घर जाना है। कोई  मेहमान आने वाला हैं। लेकिन काम तो पूरा करना ही है। लखमा बाज़ार में तीन दुकानों में सफाई का काम करती है।  पति मजदूर है। दोनों के काम करने पर भी घर मुश्किल से चलता है। एक बेटा है अमर|

दुकानों के बाहर बरामदे में पोंछा लगाते हुए लखमा की नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो कुछ आगे एक दुकान के बाहर सफाई कर रहा था। लखमा देखती रही- बच्चा सात आठ साल का लग रहा था। वह उसे देखती रही- बच्चा कोशिश कर रहा था पर सफाई उससे हो नहीं रही थी। पानी की बाल्टी खिसकाते हुए वह फिसल गया और बाल्टी उलट गई। अब लखमा रुक न सकी। उसने बढ़ कर बच्चे को गोदी में उठा लिया और सिर सहलाते हुए बोली-‘’ तेरा नाम क्या है?’’

‘’ जानी।’’ उसने कहा।

‘’ तू यह काम क्यों कर रहा है? यह तेरे बस का नहीं है। ‘’ पूछने पर लखमा ने जान लिया कि जानी की माँ रेशमा बीमार है। वह भी लखमा की तरह दुकानों में सफाई का काम करती है। और उसने ही जानी को सफाई करने भेजा था। ऐसी स्थिति से कई बार लखमा को भी गुजरना पड़ा था। वह जानती थी कि ऐसे में काम हाथ से निकल जाता है। इसीलिए जानी की माँ ने उसे काम करने भेजा होगा।

लखमा ने जानी से कहा-‘’ बेटा , तू रहने दे। जा बच्चों के संग खेल। मैं अभी निपटा देती हूँ। ‘’ जानी हंसने लगा और सडक पर खेलते बच्चों के बीच चला गया। हालांकि लखमा को घर जाने की जल्दी थी पर उसे जानी का अधूरा काम पूरा करना ही था। उसने जल्दी जल्दी काम निपटाया फिर घर की तरफ चल दी । उसने देखा जानी सड़क पर दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा था, लखमा के होठों पर मुस्कान आ गई। उसे अच्छा लग रहा था। पर घर पहुँच कर मूड बिगड़ गया, उसे घर लौटने में देर हो गई थी। इसलिए मेहमान बिना मिले चला गया था।

अगली सुबह लखमा काम पर पहुंची तो जानी फिर वहाँ दिखाई दिया। इसका मतलब था कि जानी की माँ अभी बीमार थी। ‘ मुझे न जाने कितने दिन डबल ड्यूटी करनी होगी। ‘ वह यह सोच कर पछता रही थी कि उसने क्यों यह मुसीबत अपने ऊपर ले ली। वह जानी को सफाई करते देखती रही। वह ठीक तरह से काम कर नहीं पा रहा था। पर लखमा ने उसकी मदद नहीं।। की। लेकिन पोंछा लगाते हुए जब जानी दो बार फिसल गया तो लखमा रह न सकी। उसने जानी का हाथ पकड़ कर जोर से अपनी ओर खींचा और चिल्ला कर बोली –‘’ कल तुझे मना किया था न कि तू यह काम नहीं कर सकता। बता फिर क्यों आया ?’’

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हाथ खींचने से जानी रो पड़ा। सुबकते हुए बोला-‘’ माँ ने भेजा है। उनकी तबीयत ठीक जो नहीं है।’’

‘’ चल मैं चलती हूँ तेरी माँ के पास, चाहे जो हो बस तुझे यहाँ नहीं आना है।’’ लखमा ने कहा और जानी के साथ उसकी माँ से मिलने चल दी। उसने जानी का काम अधूरा छोड़ दिया। वह कुछ सोच रही थी।

जानी की माँ छोटे से कमरे में जानी के साथ रहती थी। उसका पति दूसरे शहर में नौकरी करता था और कभी कभी ही यहाँ आया करता था। बीमारी में जानी की माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। लखमा जानी की माँ को देख कर समझ गई कि उसकी तबीयत जल्दी ठीक नहीं होगी। उसने कहा –‘’ जानी की माँ , तुम काम की चिंता मत करो। पर जानी को मत भेजा करो। अभी तो इसके पढने – खेलने के दिन हैं। ‘’ जानी की माँ रेशमा ने कोई जवाब नहीं दिया|

अगली सुबह लखमा ने देखा कि जानी फिर वहां खड़ा था। लखमा को देखकर वह दूर चला गया, शायद जानी लखमा से डर गया था। लखमा उस दुकान वाले के पास गई जहाँ जानी सफाई कर रहा था। उसने कहा-‘’ जानी की माँ तो बीमार है। शायद वह काफी समय तक काम करने नहीं आ सकेगी ‘’ दुकानवाले ने कहा – ‘’ तो तुम कर लो उसकी जगह । हमारी दो दुकानें और हैं।’’ लखमा खुश हो गई । उसे अच्छे पैसे मिलने की उम्मीद हो गई। डबल ड्यूटी में मेहनत  ज्यादा थी पर पगार भी तो दुगनी मिलने वाली थी। हाथों के साथ दिमाग भी भाग रहा था। वह सोच रही थी कि अतिरिक्त पैसों से क्या कुछ हो सकेगा। अब जानी दुकान पर नहीं आता था। बस एक चबूतरे पर बैठा लखमा को देखता रहता था। लखमा सोचती थी जानी यहाँ क्या कर रहा है। रेशमा के पास क्यों नहीं बना रहता। मन हुआ कि जानी से रेशमा का हाल पूछे पर चुप रह गई।

लखमा ने महीने के आखिरी सप्ताह में रेशमा के बदले काम किया था। दुकानवाले ने पैसे दिए तो बोली-‘’ रेशमा के पैसे भी दे दो , उसे जरुरत होगी।’’ दुकानवाले ने कहा-‘’ रेशमा के पैसे उसी को दूंगा।’’ सुन कर लखमा सोच में पड़ गई। वह रेशमा के बारे में सोच रही थी। एक तो काम नहीं ऊपर से बीमारी का खर्च। पिछले काम के पैसे भी नहीं मिल रहे हैं। बाज़ार में जानी दिखा तो पूछा-‘’ यहाँ क्या कर रहा है ? माँ के पास क्यों नहीं टिकता?’’

‘’ माँ ने काम खोजने को कहा है। ‘’ – जानी बोला।

‘’ तुझे कौन काम देगा भला। ‘’ लखमा ने व्यंग से कहा। ‘’ चल मैं तेरी माँ से बात करती हूँ।’’ और उसके साथ रेशमा से मिलने चल दी। लखमा ने देखा कि रेशमा की तबीयत पहले से  ज्यादा ख़राब है। साफ़ था कि उसे तुरंत काफी पैसे चाहिएं ताकि ठीक से दवा - दारु और देख   भाल हो सके। लखमा ने कहा-‘’ तुम जानी को पढने भेजो

में क्या करूँ समझ में नहीं आता,’’ – रेशमा ने उदास स्वर में कहा।

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सब ठीक हो जाएगा । लेकिन सबसे पहले तुम मेरे साथ चलो। ‘’- कह कर लखमा ने रेशमा को अपने सहारे से बैठा दिया । पास रखी शीशी से बालों में तेल लगा कर सँवारने लगी। बोली – ‘’ अब तुझे मेरे साथ चलना है  फिर बता दिया कि दुकानदार उसी को पैसे देगा। फिर हाथ पकड़ कर दुकानदार के पास ले गई। कहा-‘’ रेशमा खुद अपने पैसे लेने आ गई है।’’

दुकानदार ने पैसे देते हुए कहा-‘’ तुम तो ऐसे सिफारिश कर रही हो जैसे तुम दोनों आपस में बहनें हों। लेकिन तुम दोनों के धर्म तो अलग अलग हैं , फिर बहनें कैसे हो सकती हो।’’ लखमा से पहले रेशमा बोल उठी-‘’ बहन होने के लिए  धर्म एक होना जरुरी नहीं।’’ और मुस्करा दी। लखमा सोच रही थी कि कहीं दुकानदार काम के बारे में उसकी बात रेशमा को न बता दे। तब तो रेशमा उसे लालची समझ बैठेगी। पर वैसा कुछ न हुआ। लखमा रेशमा को उसके घर ले आई। रास्ते भर वह कुछ सोचती रही थी। और फिर उसने फैसला कर लिया। रेशमा ने उसे अपनी बहन कहकर उसके मन को छू लिया था। लखमा को अपनी छोटी बहन याद आ गई जो गाँव में रहती थी। लखमा काफी समय से बहन से मिल नहीं पाई थी।

अगली सुबह काम पर जाने से पहले वह रेशमा के पास जा पहुंची। कहा-‘’ रेशमा-आराम कर, तेरा काम मैं संभाल लूंगी। पर एक शर्त है। आज के बाद जानी को काम पर मत भेजना । उसे पढना चाहिए। ‘’

‘’ कौन पढ़ाएगा जानी को?’’ रेशमा ने उदास स्वर में कहा।

‘’मैं इसे मास्टरजी के पास ले जाऊँगी जो मेरे बेटे को पढ़ाते हैं। ‘’ –लखमा ने कहा। उसने आगे बताया कि मास्टरजी बच्चों को पढ़ाने के पैसे नहीं लेते । किताबें और कॉपी पेंसिल भी अपनी जेब से देते हैं। वे उन बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं जो स्कूल नहीं जा पाते।

रेशमा को लखमा की बात माननी पड़ी। लखमा जानी को मास्टरजी के पास ले गई। और जब जानी पहले दिन मास्टरजी से पढ़ कर आया तो वह ख़ुशी से रो पड़ी। लखमा रेशमा के बदले काम करती रही।महीना पूरा हुआ तो लखमा ने रेशमा की दुकानों के पैसे लाकर रेशमा के हाथ में रख दिए। वह लेने को तैयार नहीं हुई। तब लखमा ने कहा-‘’ मान ले कल अगर मैं बीमार हो जाऊं तो क्या तू मेरी मदद नहीं करेगी?’’ इस बात ने रेशमा को चुप कर दिया। अब कहने को कुछ नहीं था, लखमा अपने घर की ओर चली तो मन पर बैठा बोझ उतर गया था।( समाप्त)