Tuesday, 1 February 2022

दूसरा सच -कहानी-देवेंद्र कुमार

 

  दूसरा सच -कहानी-देवेंद्र कुमार

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समुद्र के किनारे मछुआरों का एक गाँव था- टाना। टूटी-फूटी झोंपड़ियाँ समुद्र से थोड़ी दूर नारियल के झुण्ड  में बनी थीं। वहीं रहते थे भोले-भाले परिश्रमी मछुआरे। वे हर सुबह अपनी नौकाएँ लेकर समुद्र में निकल जाते, मछलियाँ पकड़ते और जब शाम को सूरज समुद्र के पानी को रंगीन बनाता हुआ डूबने की तैयारी में होता तो वे दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद, मछलियों से लदी नौकाओं में तट की ओर लौटते।

 

 

टाना का मुखिया था दीना। हट्टा-कट्टा। सब उसका सम्मान  करते। वह पूरे गाँव को अपना परिवार समझता। उनके सुख-दुख में बराबर की हिस्सेदारी बँटाता। सबके लिए वह गाँव का नहीं, सब परिवारों का मुखिया था। लेकिन दीना के सब सुख घर से बाहर थे, घर में था उसका सबसे बड़ा दुख, उसका इकलौता बेटा राजा।

 

 

राजा स्वभाव में अपने पिता से एकदम उल्टा था। बात-बात पर गाँववालों से लड़ता, शराब पीकर गालियाँ बकता। वह मछलियाँ पकड़ने भी नहीं जाता था। उसके धंधे थे ठगी और चोरी। अक्सर ही लोग दीना के पास राजा की शिकायतें लेकर आते तो वह दुखी हो जाता। दीना राजा को समझा-समझाकर हार गया था पर उसने अपनी आदतें नहीं बदलीं।

 

 

  दूसरी ओर गोपुरा था। गोपुरा एक अनाथ था। वह बहुत वर्ष पहले की बात है, समुद्र में भयंकर तूफान आया था एक रात। उसमें गाँव के कई लोग मर गए, गोपुरा के माता-पिता भी तूफान की भेंट चढ़ गए थे। बचा था केवल अबोध गोपुरा!  गोपुरा को दीना ने शरण दी थी। उसे राजा की तरह प्यार और संरक्षण दिया था। उसे यह बात कभी अनुभव नहीं होने दी कि उसका घर गोपुरा का घर नहीं है। लेकिन एक छत के नीचे एक-सा प्यार और स्नेह पाते हुए गोपुरा और राजा कितने अलग थे एक-दूसरे से।

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गोपुरा दीना का बहुत ध्यान रखता था। उसे पता था कि दीना क्यों उदास रहता है। उसने राजा को बहुत समझाने का प्रयत्न किया, कहा कि वह दीना का ध्यान रखे, उसे दुख दे। वह राजा को समझाता तो राजा उसे ही डाँट देता। वास्तव में वह गोपुरा से मन-ही-मन चिढ़ता था। उसे लगता था कि गोपुरा उसके अधिकार में हिस्सा बँटाने जाने कहाँ से चला आया है। वह गोपुरा का अपमान करने का कोई मौका हाथ से जाने देता। गोपुरा को दुख देकर उसे खुशी मिलती थी। वह चाहता था कि जैसे हो गोपुरा वहाँ से चला जाए।

 

उन्हीं दिनों की बात है, वह तूफानी रात थी। सब आराम की नींद ले रहे थे, पर गोपुरा अभी नहीं सोया था, क्योंकि राजा नहीं लौटा था। गोपुरा सोच रहा था, “इतने खराब मौसम में भी राजा बाहर क्यों घूम रहा है?”

 

राजा शराब के नशे में झूमता-झामता चला रहा था। एकाएक उसने तट से थोड़ी दूर एक नाव देखी तो चौंक पड़ा।यह किसकी नाव है? गाँव की तो हो नहीं सकती।इस तरह सोचता हुआ राजा नाव के निकट जा पहुँचा। उथले पानी में रुकी नाव लहरों के थपेड़ों से हिल रही थी।

 

राजा ने आगे बढ़कर झाँका तो चौंक पड़ा। नाव की तली में दो आदमी पड़े थे। एक छोटी लालटेन जल रही थी। दोनों आदमी शायद बेहोश थे। राजा  नाव में कूद पड़ा। उसने नाव की तलाशी ली तो एक पोटली में बँधे रुपए नजर गए। राजा का मन खिल उठा। वह रुपए लेकर घर की ओर चल दिया। उसने नाव में बेहोश पड़े व्यक्तियों के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। वह घर में घुसा तो गोपुरा जाग रहा था। उसने पूछा, “अब तक कहाँ थे, माँ बहुत चिंता कर रही थीं।

 

तट पर एक नाव...” राजा बुदबुदाया और बिस्तर में घुस गया। उसने आँखें बंद कर लीं।तट पर नाव...लेकिन किसकी?” गोपुरा ने आश्चर्य से पूछा। आधी रात के समय कौन-सी नाव गई थी। लेकिन उसे अपनी बात का उत्तर नहीं मिला। राजा सो गया था,  पर  गोपुरा लेटा रहा सका। वह दबे पाँव बाहर निकल आया। जल्दी-जल्दी चलता हुआ नाव के निकट पहुँचा। उसने एक ही दृष्टि  से सारी बात  भाँप ली। तुरंत उल्टे पैरों गाँव की ओर दौड़ा। उसने पुकारा तो कई लोग बाहर निकल आए। गोपुरा उन्हें लेकर दुबारा तट पर पहुँचा।नाव में पड़े बेहोश आदमियों को गाँव ले आया गया।

 

गाँव में वैद्य ने दोनों को दवाई दी। कुछ देर में उन्हें होश गया। उन्होंने बताया, वे दोनों पास के द्वीप पर जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने कोई चीज खाई थी, उसके बाद वे बेहोश हो गए थे। पता नहीं नाव कब बहकर किनारे लगी।  गाँव वालों ने उन्हें बताया कि वे सुरक्षित हैं। लेकिन तभी उन दोनों को पता चला कि उनके रुपए गायब हो गए हैं। वे घबरा उठे और पूछने लगे।

 

सबको गोपुरा पर संदेह हुए, क्योंकि सबसे पहले उसी ने गाँव वालों को बेहोश आदमियों के बारे में बताया था। पूछने पर गोपुरा ने कहा, “मैं सच कहता हूँ, मैंने कुछ भी नहीं चुराया।लेकिन यदि  उसकी बात सही थी तो फिर रुपए कहाँ गए?पूरे गाँव में इस बात की चर्चा फैल गई, जितने मुँह उतनी बातें। लोग कहने लगे, “तो गोपुरा भी राजा जैसा ही निकला।कुछ लोगों ने कहा, “हमें तो लगता है कि अब तक हम जिन अपराधों का आरोप राजा पर लगाते रहे वे सब गोपुरा की ही कारस्तानी थीं।स्थिति बदल गई। अब राजा के सारे अपराध गोपुरा के सिर मढ़  दिए गए थे।

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गोपुरा ने सब कुछ सुन लिया। उसका मन परेशान हो उठा। वह जानता था कि नाव को सबसे पहले उसने नहीं, राजा ने देखा था। हो सकता है, रुपए राजा ने लिए हों। लेकिन वह चुप ही रहा।यदि वह सच कहता तो राजा ही चोर सिद्ध होता। गोपुरा यह जानता था कि इससे दीना को कितना दुख होगा। वह सच बोलकर उन्हें और चोट नहीं पहुँचाना चाहता था।

 

वह चुप रहा और पूरा गाँव उस पर थू-थू करता रहा।गोपुरा और नहीं सह सका। चुपचाप घर से निकल आया और समुद्र के किनारे जाकर खड़ा हो गया। सूरज का लाल गोला पश्चिम में डूब रहा था। पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। सब ओर सन्नाटा था। एकाएक गोपुरा ने अपने आपको बहुत अकेला महसूस किया। उसे लगा दुनिया में उसका कोई नहीं है। उसकी आँखें डबडबा आईं।एकाएक उसे राजा नजर आया। वह एक तरफ खड़ा हँस रहा था। गोपुरा ने कहा, “राजा, पिताजी का ध्यान रखना, मैं जा रहा हूँ।

 

लेकिन कहाँ?”

 

गाँव को छोड़कर कहीं भी...मेरी इतनी बदनामी हो गई है कि अब एक पल भी रहना मुश्किल है। तुम चाहो तो एकदम नए सिरे से जीवन आरंभ कर सकते हो। तुम्हारे सब अपराधों का दोषी मुझे बना दिया गया  है। इस मौके को हाथ से मत जाने दो। अगर तुम सुधर सके तो पिताजी को बहुत सुख मिलेगा।

 

लेकिन तुमने चोरी नहीं की, फिर सच क्यों नहीं कह देते।राजा ने कहा।

 

अगर मैं सच बोलूँगा तो मुझे दूसरा सच भी बताना होगा कि चोरी किसने की। और मैं वह नहीं कर सकूँगा। देख रहे हो, पिताजी कितने बीमार हैं। अब उन्हें और चोट मत पहुँचाओ।कहकर गोपुरा जाने को हुआ, पर जा सका। राजा ने उसे रोक लिया और बोला, “तुम मेरे सारे अपराध अपने सिर पर लेकर मुझे निर्दोष दिखाना चाहते हो और यह भी चाहते हो कि मैं चुप रहूँ। मैं तो पिताजी की दृष्टि  में पहले से ही गिरा हुआ हूँ, लेकिन तुम भी ऐसे हो सकते हो, इसका झटका वह कभी नहीं सह पाएँगे।

 

मुझे जाने दो।गोपुरा ने कहा।

 

लेकिन राजा ने उसे कसकर पकड़ लिया। उसके होंठ फड़क रहे थे।नहीं जाने दूँगा। तुम्हें सच कहना होगा। एक सच तुम बोलोगे कि तुमने रुपए नहीं चुराए और दूसरा सच मैं बोलूँगा। यह सच बोलने का अवसर मुझसे मत छीनो। विश्वास करो, मैं सच बोलना चाहता हूँ। यदि तुम चले गए तो...राजा का गला रुँध गया था।

 

दोनों के आँसू रेत पर गिर रहे थे। राजा ने निर्णय कर लिया था, वह गोपुरा को नहीं जाने देगा।मैं सच बोलूँगा!” यह कहता हुआ वह गोपुरा का हाथ थामे गाँव की ओर बढ़ा जा रहा था।(समाप्त )

 

 

 

Saturday, 15 January 2022

गेंद का बचपन-कहानी-देवेंद्र कुमार

  

                 गेंद का बचपन-कहानी-देवेंद्र कुमार 

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  जया की रमा दादी पूजा कर रही थीं। रविवार का दिन था, घर के सब लोग बाहर गए थे, नीचे बच्चे शोर मचा रहे थे, इसलिए दादी का ध्यान बार बार भटक जाता था। तभी झन्न की आवाज के साथ पूजा की थाली उलट गई। जलता दीपक बुझ गया, पूजा की सामग्री बिखर गई। बच्चों द्वारा उछाली गई फुटबाल खिड़की से होती हुई पूजा की थाली में आ गिरी थी। रमा गुस्से से भर उठीं और जोर से चिल्लाईं –‘ शैतान बच्चे ठीक से पूजा भी नहीं करने देते। उन्होंने फुटबाल उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दी। थाली में पूजा की सामग्री फिर से सजाई, बुझा हुआ दीपक दोबारा जलाया और पूजा में ध्यान लगाने का प्रयास करने लगीं। लेकिन पूजा में मन नहीं लगा। मन उड़ कर न जाने कहाँ जा पहुंचा। 

 

  आँखों में एक छोटी लड़की की छवि उभर आई। वह गाँव की कच्ची, धूल भरी गलियों में सहेलियों के साथ गेंद से खेल रही है,झूला झूल रही है,हंस रही है, रो रही है, माँ की गोदी में लेटी हंस रही हैऔर फिर रमा ने उस लड़की को पहचान लियायह तो वह खुद थी। फिर उनका अपना बचपन सामने जीवंत हो उठा। उनकी आँखों से आंसू बह चले। उन्होंने अपने हाथों को फुटबाल खिड़की से बाहर फेंकते देखा। होंठो से निकला-वह फुटबाल नहीं, मेरा बचपन मेरे पास आया था, जिसे मैंने अपने ही हाथों से दूर फेंक दिया। अब वह कभी लौट कर नहीं आएगा। पूजा अधूरी रह गई, दादी देर तक अपने बचपन की उबड़ खाबड़ गलियों में भटकती रही।

      

    पर आखिर कब तक अपने बचपन की गलियों में भटकती रह सकती थी रमा दादी। कुछ देर तक आँखें मूंदे बैठी रहने के बाद, वह उठ कर खिड़की में से नीचे झाँकने लगीं। उन्होंने देखा बच्चे चुप खड़े थे, शोर थम गया था। वे रह रह कर दादी की खिड़की की ओर देख रहे थे। रमा ने कहा,  ’बच्चो , वह फुटबाल कहाँ है जिसे मैंने गलती से नीचे फेंक दिया था।

                                                 

 

  ‘गलती सेबच्चों ने अचरज से कहा। रमा दादी की बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी।

 

  ‘हाँ,मुझे फुटबाल को नहीं फेंकना चाहिए था। क्या तुम सब उस फुटबाल को खोज कर मेरे पास ला सकते हो। बदले में मैं तुम बच्चों को एक नई फुटबाल इनाम में दूँगी। 

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    नई फुटबाल के लालच में बच्चे तुरंत खोज में लग गए।  लेकिन उनकी पुरानी फुटबाल कहीं न मिली। जब बच्चे निराश होकर लौटे तो रमा खिड़की में ही खड़ी थीं। उन्होंने कहा-नहीं मिली न, मुझे पता था कि मैंने जिस फुटबाल को अपने से दूर फेंका था, वह अब मेरे पास कभी वापस नहीं आएगी,पर इसे छोड़ो, तुम्हें नई फुटबाल जरूर मिलेगी। फिर उन्होंने एक बच्चे को ऊपर बुला कर नई फुटबाल के लिए पैसे दे दिए। फुटबाल--प्रेमी बच्चे रमा के विचित्र व्यवहार को कभी समझ नहीं पाए।   रमा के मन के भीतर भला कौन झांक सकता था। 

 

   इस बात को कई दिन बीत गए। अपने बचपन की यादें रमा को आराम से नहीं रहने दे रही थीं,वह ठीक से पूजा में ध्यान नहीं लगा पा रही थीं। उस दिन पूजा के बाद रमा सोसाइटी के पार्क में जा बैठीं।सामने माली रामधन क्यारी में काम कर रहा था। पास में उसका छह -सात का बेटा राजू घास पर फुटबाल लुढका रहा था। फुटबाल कई जगह से कटी हुई थी इसलिए घास पर ठीक से लुढ़क नहीं रही थी।

 

   रमा उठ कर राजू के पास जा खड़ी हुई। उन्होंने कटी हुई फुटबाल को उठाया तो लगा जैसे यह वही फुटबाल है जिसे उन्होंने खिड़की से बाहर फेंक दिया था। रमा ने फुटबाल को दोनों हाथों में कस कर पकड़ लिया। फिर रामधन से कहा-मैं तुम्हारे बेटे के लिए नई फुटबाल मंगवा दूँगी। अगर तुम कहो तो इस फुटबाल को मैं ले जाऊं।

   

  रामधन ने हैरान स्वर में कहा-माँजी, ले जाइये,वैसे भी यह फुटबाल मेरी तो है नहीं।मुझे तो यह एक क्यारी में पड़ी मिली थी।

    

   रमा फुटबाल को सावधानी से हाथों में थामे हुए अपने फ़्लैट में आ गईं, और फुटबाल को पूजा की थाली के पास रख दिया। फिर देर तक उसे देखती रहीं। आँखों के सामने फिर से अपने भूले बिसरे बचपन के अनेक चित्र तैर गए। देर तक अपने बचपन में खोई बैठी रहीं।लगा जैसे सामने फुटबाल नहीं बचपन के दरवाजे की जादुई चाबी रखी थी।

 

  अगली दोपहर रमा पार्क में गईं तो उनके हाथ में रामधन के बेटे राजू के लिए नई फुटबाल थी। उन्होंने इधर उधर देखा पर रामधन नहीं दिखाई दिया, राजू भी नहीं था। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद उन्होंने सोसाइटी के गार्ड से पूछा। पता चला कि रामधन के गाँव में किसी रिश्तेदार की शादी है, परिवार के साथ वहीँ गया है। दो दिन में वापस आ जायेगा। एक हफ्ता बीत गया, पर रामधन नहीं लौटा। गार्ड ने बताया कि गाँव में राजू बीमार हो गया है, इसीलिए रामधन अभी कुछ दिन के लिए गाँव में ही रुक गया है। 

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  रमा को चिन्ता ने घेर लिया। उन्हें लगा कि गाँव जाकर राजू का हाल चाल लेना चाहिए। वह समझती थीं कि राजू के कारण ही उन्हें बचपन की गलियों में ले जाने वाली फुटबाल फिर से मिल सकी थी। उन दोनों के बीच जैसे एक अनोखा सम्बन्ध बन गया था।

 

  रमा ने बेटे नरेश से पटल गाँव चलने को कहा तो वह चौंक उठा। बोला—‘ पटल गाँव में तो हमारा कोई सम्बन्धी रहता नहीं है, फिर वहां क्यों जाना है!

 

   ‘मेरा कोई तो है वहां, बस सवाल मत पूछ, ले चल मुझे। रमा ने कहा। पटल गाँव ज्यादा दूर नहीं था। नरेश की कार गाँव में पहुंची तो लोग जमा हो गए। रामधन रमा दादी को देख कर चौंक पड़ा, फिर रमा को राजू के पास ले गया। राजू बिस्तर पर लेटा था। रमा ने राजू का सिर सहलाया और एक नई चमचमाती फुटबाल उसके हाथो में थमा दी। नई फुटबाल पाकर राजू बहुत खुश हो गया। रमा ने रामधन से कहा-तुम्हारे बेटे को अच्छे इलाज की जरूरत है। तुम मेरे साथ वापस चलो। मैं एक अच्छे डाक्टर को जानती हूँ। उनकी दवाई से राजू और भी जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।

 

  अपने शहर पहुँच कर रमा ने कार डाक्टर अनु के क्लिनिक के बाहर रुकवा ली। वह डॉ.अनु को अच्छी तरह जानती थीं। क्लिनिक के वेटिंग हाल में रामधन और राजू को बैठा कर रमा कक्ष में जाकर डॉ. अनु से मिलीं,उन्हें राजू के बारे बताया। फिर कहा-राजू का पिता इलाज का खर्च नहीं उठा सकेगा। दवा के पैसे मैं दूँगी,लेकिन यह बात उसे पता नहीं चलनी चाहिए। उसके स्वाभिमान पर चोट लग सकती है’ डॉ, अनु की मेज पर रुपये रख कर रमा बाहर आ गईं। 

 

   डॉ. अनु के इलाज से राजू जल्दी स्वस्थ हो गया। और फिर एक दिन उन्होंने राजू को नई फुटबाल के साथ खेलते देखा। रामधन ने कहा-माँजीडॉ. साहिबा बहुत अच्छी हैं। रमा मुस्करा कर अपने फ़्लैट में चली आईं। पूजा की थाली के पास रखी पुरानी फुटबाल को देख कर मन फिर से पीछे की यात्रा पर निकल पड़ा। सचमुच वह फुटबाल अतीत के दरवाजे की जादुई चाबी थी। घर में सब को पता था कि पुरानी फुटबाल को  उसकी जगह से हिलाना नहीं है। इस बारे में रमा किसी प्रश्न का उत्तर देने वाली नहीं थीं।  (समाप्त) 

Thursday, 13 January 2022

बूढ़ी छड़ी-कहानी-देवेंद्र कुमार

 

बूढ़ी छड़ी-कहानी-देवेंद्र कुमार

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अजीब है बाबा की छड़ी। घर में किसी ने कभी बाबा को छड़ी लेकर चलते हुए नहीं देखा। घर के बच्चे कई बार मजाक में पूछते हैं, ‘‘बाबा, क्या आप सिर्फ दिखाने के लिए छड़ी रखते हैं?’बाबा हंसकर कह देते, ‘‘अरे, छड़ी लेकर चलते हैं बूढ़े लोग, पर मैं तो बूढ़ा नहीं हूं।’’  लेकिन बार-बार पूछने पर भी यह कभी न बताते कि जब छड़ी लेकर चलते नहीं तो रखते किसलिए हैं? बच्चे तो बच्चे, घर के बड़े लोग भी नहीं जानते कि आखिर छड़ी का रहस्य क्या है? और छड़ी भी कैसी-एकदम पुरानी, बदरंग! उस पर जगह-जगह लकीरें और दरारें साफ दिखाई देती हैं।

 

घर के लोगों ने देखा है-छड़ी बाबा के कमरे में एक कोने में रखी रहती है। बाकी हर चीज की जगह कई-कई बार बदल जाती है, लेकिन छड़ी का ठिकाना वहीं रहता है। लगता है बाबा के लिए उनकी छड़ी कुछ विशेष है।बाबा का नाम रंजन राय है और उनका इकलौता बेटा है सुरेश। सुरेश की पत्नी दया खूब पढ़ी-लिखी है, पर वह नौकरी नहीं करती। दिन में कई बच्चे घर पर ही पढ़ने आ जाते हैं। उन्हें बहुत ध्यान से पढ़ाती है। पूरी बस्ती में लोग उसे मैडम पास कराने वालीकहकर सम्मान से बात करते हैं|

 

 एक दिन दया को गुस्सा आ गया। एक बच्चा अपने काम में लापरवाही कर रहा था। फिर एक दिन उसने दूसरे बच्चों के सामने दया का अपमान कर दिया। दया ने कुछ सोचा फिर अपने ससुर के कमरे में गई और कोने में रखी छड़ी उठा लाई। उस समय बाबा घर में नहीं थे। छड़ी दिखाते हुए बच्चे को धमकाया, फिर एक बार मार भी दिया।उसी समय बाबा घर में लौट आए। उन्होंने दया के हाथ में छड़ी देखी, पर कुछ कहा नहीं। चुपचाप कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। दया ने तुरंत छड़ी को उनके कमरे के दरवाजे से टिकाकर रख दिया और बच्चों को पढ़ाने लगी।

दिन ढल गया, पर बाबा के कमरे का दरवाजा बंद ही रहा। दया चाय बनाकर ले गई। दरवाजा खटखटाया तो बाबा ने दरवाजा खोल दिया। दया उनका गंभीर मुंह देखकर जान गई कि मामला गड़बड़ है। चाय का प्याला तिपाई पर रखकर वह दरवाजे के बाहर रखी छड़ी उठा लाई और उसे कोने में रखने लगी,पर रख न सकी|                                                           1

 

तभी बाबा ने कहा, ‘‘दया, अब मैं इस छड़ी को अपने पास नहीं रखूंगा, अब मुझे इसकी जरूरत नहीं।’’ दया ने देखा बाबा की आंखों में आंसू थे, उनके होंठ कांप रहे थे। इस तरह अपने बूढ़े ससुर को छोटे बच्चों की तरह रोते हुए उसने शायद पहली बार देखा था। उसने कहा, ‘‘पिताजी, मुझसे गलती हो गई। मुझे आपसे पूछकर छड़ी यहां से उठानी चाहिए थी।’’

 

‘‘लेकिन यह छड़ी….’’ और बात को बीच में ही अधूरी छोड़कर रंजन राय फिर उदास हो गए।दया अचरज के भाव से अपने ससुर को देखती रह गई। आखिर उसने पूछ ही लिया, ‘‘पिताजी, पूरी बात बताइए, आप छड़ी के बारे में कुछ कह रहे थे।’’

 

 ‘‘यह छड़ी मेरे अध्यापक की है। बात मेरे बचपन के दिनों की है। वह अध्यापक मुझसे बहुत प्यार करते थे। मैं कक्षा में सबसे आगे भी रहता था । इस कारण क्लास के दूसरे साथी मुझसे नाराज रहते थे। एक बार उनमें से किसी ने मेरी झूठी शिकायत उनसे कर दी। सुनकर मास्टर साहब को बहुत गुस्सा आया। उन्हें लगा यह तो मेरी बहुत बड़ी गलती थी। बस, उन्होंने अपनी छड़ी से मुझे पीटना शुरू कर दिया।

 

‘‘फिर?’’

‘‘वह मारते हुए कहते जा रहे थे-तूने मेरा अपमान किया है। मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी है। मैं कहता रहा-जी, किसी ने मेरी झूठी शिकायत की है। आप पता कर लें।-आखिर उन्होंने छड़ी फेंक दी और खुद रो पड़े। क्योंकि वह मुझसे बहुत स्नेह करते थे।बाद में तो उन्हें पता चल गया कि शिकायत झूठी थी। इसके कुछ दिन बाद ही एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। तब मुझे बहुत रोना आया।’’उन्होंने आगे कहा, ‘‘इसके कुछ दिन बाद की बात है। मैं मास्टरजी के घर के सामने से जा रहा था। एकाएक मैंने घर के बाहर पड़ी छड़ी देखी। मैंने छड़ी को एकदम पहचान लिया । वह वही छड़ी थी जिससे पहली बार उन्होंने मेरी पिटाई की थी और फिर खूब रोए थे। शायद बेकार समझकर किसी ने उसे बाहर फेंक दिया था। मैंने चुपचाप छड़ी उठाई और घर ले आया। बस, तब से इसे सदा अपने साथ रखता हूं। इस बात को न जाने कितना समय बीत गया है। यह मुझे अपने प्रति मास्टरजी के स्नेह की याद दिलाती रहती है।’’ और रंजन बाबू की आंखों में फिर आंसू आ गए।

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दया की आंखें भी गीली हो गईं। उसने छड़ी उठाकर कोने में पुरानी जगह रख दी और कहा, ‘‘पिताजी, अब चाहे मुझे कितना भी गुस्सा क्यों न आए, मैं किसी बच्चे को हाथ नहीं लगाऊंगी।’’ दया जान गई थी कि रंजन बाबू के लिए वह छड़ी उनके अध्यापक के स्नेह, पिटाई और पश्चात्ताप का प्रतीक थी।

उस छड़ी के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चला। दया छड़ी का रहस्य जान गई थी। पर रंजन बाबू ने उससे कह दिया था कि वह इस घटना के बारे में किसी से कुछ न कहे। उसके बाद अनेक बार घर के बच्चों ने छड़ी के बारे में जानना चाहा, पर रंजन बाबू हमेशा की तरह चुप ही रहे। वह जानते थे कि उनके मास्टरजी की छड़ी का रहस्य दया के पास सुरक्षित था।                     ( समाप्त)