Monday, 17 August 2020

घंटी की आवाज़--कहानी--देवेन्द्र कुमार


घंटी का आवाज—कहानी—देवेन्द्र कुमार

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  अनुज और दयाल स्कूल से घर रहे थे। वे खुश थे कि दो दिन बाद स्कूल की छुट्टियाँ  होने वाली है। दोनों प्रोग्राम बना रहे थे कि छुट्टियों में कहाँ सैर की जाए। अनुज ने कहा—“भैया, छुट्टी की बात रसगुल्ले जैसी लगती है। छुट्टी का नाम लेते ही मुँह में रस भर जाता है।‘’
 घर तक शार्ट कट के लिए एक मैदान पार करते समय एकाएक दयाल लड़खड़ा गया। उसके मुँह से चीख निकल गई। अगर अनुज ने हाथ पकड़ा होता तो दयाल मुँह के बल गिर जाता। देखा जमीन पर एक डोरी पड़ी है। उसके दो छोरों पर छोटी-छोटी दो घंटियाँ बंधी हुई थीं, उन्हीं में पैर फंसने से दयाल लड़खड़ा गया था। अनुज ने डोरी में बंधी घंटियाँ उठाकर हिलाईं तो टन टन की आवाज आने लगी। शायद बच्चों का कोई खिलौना या मंजीरा जैसा कुछ था। दोनों बारी-बारी घंटियों को हिलाते और हँसते हुए घर गए। दयाल बड़ा और अनुज छोटा है। दोनों खाना खाने के बाद अपने कमरे में बैठकर डोरी से बंधी उन घंटियों को टनटनाते हुए उछलने लगे। वे हँस रहे थे। तभी उनका खेल रूक गया। देखा दरवाजे में खड़े बाबा उन्हें घूर रहे थे।
  बाबा ने पूछ लिया-यह कहाँ से लाए?”
  अनुज ने पूरी घटना बता दी तो बाबा ने कमरे में आकर घंटियों वाली डोरी उठा ली और उसे टनटनाने लगे। टन टन की आवाज सारे घर में गूँजने लगी। अनुज और दयाल हैरानी से बाबा की ओर देख रहे थे। आखिर बाबा यह खेल क्यों कर रहे थे!
  तभी बाबा ने कहा—“मुझे मेरे गाँव की याद दिला दी तुमने।
  गाँव की याद। अनुज ने पूछा।
  ‘’जब पशु सुबह चरने जाते हैं या शाम को थान पर लौटते हैं तो इन घंटियों की टन-टन पूरे गाँव में गूँजने लगती थी। आज इतने समय बाद घंटियों की आवाज कानों में पड़ी तो गाँव में बीता समय याद गया। वहाँ जन्म, बचचन के दिन, फिर बड़े होने के बाद भी काफी समय तक गाँव में रहा।
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  बाबा, हमें भी बताइए अपने बचपन के बारे में। उस समय कैसा था आपका गाँव, और आज कैसा है? क्या आपको कभी गाँव की याद आती है?” अनुज ने पूछा।
  याद आती है, बहुत याद आती है-.
  तो फिर आप वहाँ क्यों नहीं रहते। शहर में क्यों चले आए?” दयाल बोला।
  बाबा ने गंभीर स्वर में कहा—“यह तो लम्बी कहानी है। गाँव वाले शहर में क्यों चले आते हैं और फिर गाँव क्यों नहीं जाते-वे सब बातें।
  हम भी देखना चाहते हैं आपका गाँव।
  तभी अनुज और दयाल के पापा रमेश दफ्तर से गए। रात को खाते समय बाबा ने रमेश को बच्चों की इच्छा बताई तो बच्चों की मम्मी सुजाता बोली—“गाँव देखने का तो मेरा भी मन है।
  बस कार्यक्रम बन गया कि बच्चों की छुट्टियाँ गाँव में बिताई जायेंगी। गाँव में पुश्तैनी मकान था जो बंद पड़ा था। कभी-कभी साफ-सफाई करने के लिए बाबा वहाँ चले जाया करते थे। गाँव के लिए चलने से दो दिन पहले रमेश ने अपने दफ्तर के दो आदमियों को गाँव के मकान की सफाई करने भेज दिया। साथ ही कुछ जरूरी सामान भी था।
  कार से सब दोपहर में गाँव जा पहुँचे। गाँव में बाबा के आने की खबर पहले से ही थी। कार गाँव के मकान के सामने जाकर रूकी। दोनों बच्चे उत्सुक आँखों से इधर-उधर देखने लगे। गाँव के बहुत सारे बच्चे इकट्ठे हुए थे।
    गाँव का घर बहुत बड़ा था। लम्बा-चौड़ा आँगन जो कच्चा था। वहाँ थे कई पौधे जो सूखे हुए थे। बच्चे सूखे पौधेां को देखने लगे फिर तुरंत दौड़कर गए और आँगन में लगे हैंडपम्प से पानी लेकर सूखे पौधों पर डालने लगे।
  बाबा बोले—“मैं माली से यहाँ नए पौधे लगाने को कह दूँगा।
  वे फिर सूख जाएँगे। रमेश बोले-क्योंकि हम लोग तो यहाँ एक ही सप्ताह रुकने वाले हैं।
  पापा, ऐसा कुछ कीजिए कि पौधे सूखने पाएं। बच्चे बोले।
  सुनकर बाबा हँस पड़े। बोले—“गाँव के पौधों की देखरेख शहर में रहकर नहीं हो सकती, पर तुम लोग कह रहे हो, तो कोई उपाय सोचना पड़ेगा।
  गाँव के कई लोगों ने बैठने सोने के लिए चारपाइयाँ भेज दी थीं। खुले आँगन में सब उन्हीं पर बैठे थे। गाँव के लोग बाबा और रमेश से मिलने रहे थे।
  आखिर मेहमानों का आना बंद हुआ। अब सूरज ढल चला था-आँगन में मौजूद नीम के दो पेड़ों पर परिन्दे अपने घोंसलों में उतरने लगे थे।
  अनुज और दयाल उत्सुक भाव से दोनों पेड़ों की ओर देख रहे थे। उन्होंने कहाबाबा, चाहे आप शहर चले गए हैं पर पक्षी तो इन घोंसलो में रहते ही हैं।
  बाबा ने कहा—“हमें अँधेरा होने से पहले भोजन कर लेना चाहिए, फिर मच्छर जाएँगे।
  सब जमीन पर चटाई बिछाकर बैठ गएफिर मिलकर भोजन किया। रात घिर आई, आकाश में तारे छिटक गए। बच्चे बड़े सब खुले आकाश के नीचे चारपाइयों पर जा लेटे। अजय और दयाल अपलक तारों भरे आकाश की ओर ताकते रह गए। अनुज बोला—“इतने सारे तारे एक साथ मैंने इससे पहले कभी नहीं देखे।
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  अनुज और दयाल को कब नींद गई पता ही नहीं चला। सुबह एकाएक पंछियों की चूं-चिर्र से दोनेां भाइयों की नींद टूट गई। लगा जैसे सुबह-सुबह हर पंछी दूसरे से हालचाल पूछ रहा हो।
  कुछ देर बाद पूरा परिवार गाँव की सैर पर निकल पड़ा। छोटे छोटे कच्चे मकान, संकरी गलियां, जगह-जगह कूड़ा बिखरा हुआ। मक्खी-मच्छर की बहुतायत थी, पर बस्ती से बाहर खुली हवा में दृश्य  एकदम बदल गया। गाँव के कुएँ पर पानी भरा जा रहा था। पोखर में बत्तखों के जोडे तैर रहे थे।
   बाबा ने कहा—“बच्चो, तुमने देखागाँव में कमियाँ हैं तो उसकी अपनी विशेषताएँ भी हैं। गंदगी है पर खुली जमीन और हरियाली खूब है।
  शहर में तो खेलने के लिए पार्क बहुत कम हैं। अनुज बोला। पर वहाँ बिजली, साफ पानी और अच्छी सड़कें हैं। आने-जाने के साधन हैं।
   और रोजगार हैं। रमेश ने कहा, “पढ़-लिखकर लोग शहर की तरफ इसीलिए जाते हैं कि वहाँ रोजगार मिलता है।   
  पर आप तो गाँव को एकदम भूल ही गए। बताइए तो कितने वर्ष पहले आए थे यहाँ?” दयाल ने पूछा तो रमेश मुसकरा उठे। बोले—“बच्चो, तुमने ठीक कहा, हम शहर में जाकर इतने उलझ जाते हैं, चकाचौंध में इतने खो जाते हैं कि गाँव की याद ही नहीं आती।‘’
 घूमफिर कर वे गाँव के स्कूल के पास जा पहुँचे थे। स्कूल की इमारत कच्ची-पक्की थी और ऊपर छप्पर था। अंदर बच्चे टाट पट्टियों पर बैठे पढ़ रहे थे। अनुज ने देखा ब्लैकबोर्ड एकदम टूटा हुआ था।
  घर लौटकर उसने बाबा से कहा—“बाबा, आपने देखा गाँव का स्कूल।
  हाँ देखा, सुविधाएँ बहुत कम हैं। अध्यापक शहर में रहते हैं। वह रोज नहीं आते।
  अनुज ने कहा—“बाबा, मैं सोच रहा हूँ अपने इस मकान में तो कोई रहता नहीं।
   हाँ, फिर...
   और स्कूल की इमारत एकदम टूटी फूटी है। अगर स्कूल यहाँ आ जाए तो...
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  वाह! क्या बात कही है।और बाबा ने अनुज का कंधा थपथपा दिया।
   सुजाता ने भी इस बात का समर्थन किया तो बाबा ने कहा—“तब तो बात बन गई। मैं मुखियाजी से इस बारे में बात करता हूँ।
  तब तक मैं मास्टरजी को ड्राइवर के साथ शहर भेजकर ब्लैक बोर्ड तथा दूसरी जरूरी चीजें मंगवा देता हूँ। अगर स्कूल हमारे शहर जाने से पहले ही इस मकान में चलने लगे तो बहुत अच्छा रहेगा। कहकर रमेश बाहर चले गए।
  बाबा तुरंत मुखिया के पास चले गए। लौटे तो बहुत खुश थे। उन्होंने कहा—“बच्चो, तुम्हारी इच्छा पूरी हुई। मुखियाजी को यह प्रस्ताव बहुत पसंद आया है। कमरों की दीवारों में मरम्मत की जरूरत है। उसके लिए मैं कुछ दिन यहीं रुक जाऊँगा।‘’
  उसी शाम मास्टरजी शहर से ब्लैकबोर्ड दूसरी जरूरी चीजें लेकर लौट आए। वह भी स्कूल के लिए नई जगह पाकर खुश थे।
  आखिर शहर लौटने का दिन गया। मुखिया सहित कई गाँव वाले इन लोगों से मिलने आए। कार चलने लगी तो मुखिया ने बाबा से मजाक किया-आपने यह तो बताया नहीं कि स्कूल के लिए इस मकान का किराया कितना देना होगा?”
  बाबा हँसकर बोले—“पौधे सूखने पाएँ और परिन्दे आँगन के पेड़ो पर अपने घोंसलों में बेखटके आते-जाते रहें। यही किराया होगा।
  एक सम्मिलित ठहाका गूँज उठा। कार शहर की ओर चल दी। अनुज और दयाल मुड़-मुड़कर पीछे छूटते गाँव की ओर देख रहे थे, जो हरियाली में कहीं खो गया था। उन्होंने पूछा—“अब हम फिर कब आएँगे?”
  बहुत जल्दी। बाबा ने कह दिया।
  शहर और गाँव के बीच टूटा संबंध फिर से जुड़ गया था।(समाप्त )

Saturday, 15 August 2020

सबसे अच्छा चित्र-कहानी-देवेन्द्र कुमार


 सबसे अच्छा चित्र—कहानी—देवेन्द्र कुमार
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  हमारे पड़ोस में एक चित्रकार परिवार रहने आया है। चित्रकार का  नाम अजित है। लोग कहते हैं कि उनके बनाये चित्र बहुत पसंद किये जाते हैं। कई शहरों में उनके चित्रों की प्रदर्शनियां हो चुकी हैं। मैंने कुछ सोचा और फिर एक दिन उनके दरवाजे की घंटी बजा दी। द्वार अजित ने खोला। बोले-‘आइये, अंदर आइये। मैं पत्नी के साथ  आप के पास आने की सोच रहा था।पर इधर मेरी पत्नी रमा कुछ अस्वस्थ हैं, इसीलिए नहीं आ सका।’
  मैंने कहा-‘ आपका बहुत नाम सुना है। आपके बनाये चित्र देखना चाहता हूँ।’ कमरे में एक  सात आठ  साल का बच्चा बैठा ड्राइंग बनाने में लगा था। मैंने अजित से पूछा –‘ यह आपका बेटा है?’
  अजित ने कहा-‘है तो नहीं पर बनाने की कोशिश कर रहा हूँ।’और मुझे दूसरे कमरे में ले गए। मुझे उनकी बात समझ में नहीं आई।उस कमरे में दीवारों पर अनेक चित्र लगे हुए थे। कुछ में प्रकृति के विविध रूप दर्शाए गए थे तो कई  चित्र त्यौहार मनाते लोगों के थे।अनेक पोर्ट्रेट भी थे जिनमें उदास और प्रसन्न  चेहरे दिखाए गए थे। मैं मुग्ध भाव से उन चित्रों को देखता रहा।फिर मैंने पूछा कि वह आजकल किस विषय पर चित्र बना रहे हैं।
  अजित बोले –‘इधर मैं नए चित्र नहीं बना रहा हूँ। बल्कि उनसे मिलने की कोशिश कर रहा हूँ,जिन्हें मैंने अपने चित्रों में उतारा है।’ मैं कुछ पूछता तभी वह बोले-‘ मैं आपको सबसे अच्छा चित्र दिखाता हूँ जिसे मैंने नहीं बनाया है।’और अजित ने एक पेंटिंग को उलट दिया।मैंने देखा कि एक आदमी का रेखाचित्र बना हुआ था जिसका केवल एक पैर नज़र आ रहा था।लगता था जैसे किसी बच्चे ने ड्राइंग बनाई हो। मैं अचरज से देखता रह गया।उनकी बात मेरी समझ नहीं आ रही थी।पता नहीं क्यों अजित उसे  सबसे अच्छा चित्र बता रहे थे!         
    मैं कुछ पूछ्ता इससे पहले हो अजित ने कहा-‘आप सोच रहे होंगे कि मैं इस  ड्राइंग को सबसे अच्छा चित्र क्यों कह रहा हूँ। इसके पीछे एक कहानी है। सच कहूं तो इसने मुझे एक नया रास्ता दिखाया है। एक दिन मैं चित्र बना रहा था तभी कामवाली रत्ना की बेटी जूही मेंरे पास आकर बोली-‘कागज दो,ड्राइंग बनानी है।’मैंने उसे अपना बनाया  पुराना चित्र दे दिया और उसे उलट कर कहा-‘इस खाली जगह पर बना लो।’ कुछ देर बाद मैंने देखा कि उसने एक आदमी का रेखा चित्र बनाया था जो बैसाखी के सहारे खड़ा था। तभी रत्ना ने बताया कि वह वीरू है जो उसकी गली के मोड़ पर बैठ कर भीख मांगता है।उसकी एक टांग दुर्घटना में कट गई थी।लोग उससे बच  कर चलते हैं पर जूही को वीरू से बहुत लगाव है,यह उसे बाबा कहती है।दिन में एक बार तो उससे जरूर मिलती है।घर में जब भी कोई पकवान बनता है तो वीरू को देने जाती है।
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  अगले दिन जूही  माँ के साथ आई तो उदास थी। मैंने पूछा तो रत्ना ने बताया कि कल पुलिस वीरू को पकड़ कर ले गई।बस जूही तभी से उदास है, कह रही है कि बाबा से मिलना है। क्या आप पता लगा देंगे कि वीरू जैसे लोगों को पुलिस कहाँ रखती है?’ 
  मैं इलाके के थाने के अफसर  को जानता हूँ। वहां से मालूम हुआ कि भिखारियों को ‘अपना घर’  नामक संस्था में भेजा गया है। मैं रत्ना और जूही के साथ वहां गया तो वीरु मिल गया। वह साफ़ सुथरे कपडे पहने हुए बांस की टोकरी बना रहा था।जूही भाग कर उससे लिपट गई।कहने लगी-‘ बाबा,तुम यहाँ क्यों आ गए,वापस चलो।’ तब रत्ना ने उसे समझाया कि यहाँ तेरा बाबा आराम से रहेगा।उसे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। वीरू ने कहा-‘बिटिया,यहाँ मैं आराम से हूँ। दोनों टाइम खाना मिलता है, माँगना नहीं पड़ता।तुम जब चाहो आकर मुझसे मिल सकती हो।’  सुन कर जूही खुश हो गई। मुझे भी अच्छा लगा।
   ‘घर लौट कर मैं देर तक सोचता रहा-क्या केवल चित्र बनाना ही काफी है।मैंने समय समय पर जिन लोगों  के चित्र बनाये हैं उनमें कई चेहरे प्रसन्न थे तो कई उदास। उन चित्रों के बिकने से मुझे अच्छी खासी रकम भी मिली। क्या मुझे उनकी ख़ुशी या  उदासी में शामिल नहीं होना चाहिए था?यह पता नहीं करना चाहिए था कि उनमें से कुछ उदास थे तो क्यों!’
  मैंने कहा-‘आप सही  बात सोच रहे थे।’
 अजित ने बताया –‘ तभी मुझे एक बच्चा याद आया,जिसे मैंने पेड़ के नीचे खड़े रोते देखा था।’
   ‘कौन था वह बच्चा  और आपने उसे कहाँ देखा था?’-मैंने पूछा। तब अजित ने मुझे मोबाइल फोन पर एक बच्चे का फोटो दिखाया।वह रो रहा था। मैं उसे तुरत पहचान गया।’यह तो वही है जिसे मैंने बाहर के कमरे में ड्राइंग बनाते हुए देखा है।’
  ‘आपने ठीक पहचाना।यह वही बालक है।’-अजित बोले।फिर बताने लगे-‘ कुछ समय पहले मैं पर्रिवार के साथ बनगांव में एक रिश्तेदार से मिलने गया था, वहां से लौटते समय मैंने एक बालक को पेड के नीचे रोते पाया।मैं उससे  मिलना चाहता था,पर तब तक कार आगे निकल आई थी। मैंने घर लौट कर पत्नी से यह कहा तो उन्होंने मुझे फोन में उसका फोटो दिखा कर कहा-‘ मैंने उस बच्चे का फोटो क्लिक कर लिया है।मैं भी सोचती हूँ कि कभी बनगांव जाकर उससे मिला जाये।’
     ‘फिर।’
     कुछ दिन बाद मैं पत्नी के साथ बनगांव गया और बच्चे का फोटो दिखाया तो पता चला कि बच्चे का नाम परम है और वह मुखिया के घर में रहता है। हम मुखिया से मिले ।उसने बताया कि कई साल पहले परम उसे सड़क पर रोता हुआ मिला था।
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  मुखिया ने  जो कुछ बताया उससे यही पता चला कि उसे मुखिया ने अपने घर में जगह  दी है।उसका नाम परम भी  मुखिया ने रखा है। पता चला कि परम मुखिया की बकरियां चराने के साथ घर के और भी काम करता है। हमारे कहने पर मुखिया हमें गाँव के चारागाह में ले गया।तब परम बकरियों को उनके बाड़े की तरफ ले जा रहा था।रमा ने उसे झट पह्चान लिया।इसका फोटो उसने चलती कार से लिया था। परम की यह हालत देख कर रमा को बहुत दुःख हुआ। उसने मुखिया को बताया कि इतने छोटे बच्चे से यह सब कराना गैर कानूनी है,अगर पुलिस में शिकायत की जाये तो उसे जेल हो सकती है।
  यह सुनकर मुखिया घबरा गया।मैंने कहा-‘बचपन खेलकूद और पढाई के लिए होता है। ‘ हमने परम को अपने साथ शहर लाने  की बात कही तो मुखिया झट मान गया।और इस तरह हम परम को अपने घर ले आये।मैंने पुलिस को बता दिया है और वकील से कानूनी सलाह भी ली है।मैं  और रमा परम को गोद लेना चाहते हैं।परम स्कूल जाने लगा है और बहुत खुश है।’
  मैंने कहा-‘अगर उस दिन  रमा जी ने रोते हुए परम का फोटो न क्लिक न किया होता तो उसके जीवन  में यह बदलाव कभी न आ पाता ।’
  ‘ आप ठीक कह रहे हैं।।’-अजित बोले।और इसीलिए मैंने निश्चय किया है कि अब कुछ समय तक नए चित्र नहीं बनाऊंगा। सबसे पहले उन लोगों की खोज करूंगा जिनके चित्र बना कर मैं उन्हें भूल गया हूँ।’
  ‘ हो सकता है वे आपको न मिल्रें’ –मैंने कहा।
   ‘सब न मिलें पर कुछ लोग तो मिल ही सकते हैं,जिनके सुख दुःख मैं बाँट सकता हूँ। तभी मैं अपने को सच्चा कलाकार कह सकूंगा।’अजित ने कहा। ‘मुझे भरोसा है अपनी खोज यात्रा की सफलता पर।’
  सचमुच जूही की अनगढ़  ड्राइंग ने अजित के कलाकार को नया मार्ग दिखा दिया था। (समाप्त )  
  

Tuesday, 11 August 2020

तरकीब--कहानी--देवेन्द्र कुमार


तरकीब— कहानी-देवेन्द्र कुमार


तरकीब

  
  छोटे बाजार के मोड़ पर बालू दोसा कार्नर है। वहां हर समय ग्राहकों की भीड़ रहती है। उन्हें उस दुकान का दोसा खूब पसन्द आता है। ग्राहक आते हैं, दोसे खूब बिकते हैं। बालू खुश रहता है, क्योंकि रोज़ अच्छी आमदनी होती है। परेशान कोई होता है तो रमन और छोटू। क्यों भला?
   
रमन को भट्टी के सामने खड़े रहकर फटाफट दोसे तैयार करने पड़ते हैं- जरा भी फुरसत नहीं मिलती। बालू के आर्डर आते रहते हैं, और रमन के हाथ मशीन की तरह चलते रहते हैं। उसी तरह छोटू को भी जल्दी-जल्दी प्लेटें साफ करके देनी होती हैं। जरा देर हुई नहीं कि बालू चिल्ला उठता है।
   
रमन को गर्मियों में परेशानी ज्यादा होती है। दुकान छोटी सी है, गर्मियों में उस का चेहरा पसीने से भीगा रहता है। पसीना माथे से नीचे बहता है, बस  कभी कभी सिर को झटक कर पसीना गिरा देता है वह। कभी कभी मन में आता है- अगर थोड़ी देर आराम कर सकता तो...लेकिन मौका नहीं मिलता!       
   
रविवार था, दुकान के सामने भीड़ थी। दोसे बन रहे थे. रमन और छोटू काम में लगे थे। छोटू धुली हुईं प्लेटें रखने आया तो देखा रमन का चेहरा पसीने से भीगा था। वह दोसे बनाने में जुटा था। खूब गरमी थी! छोटू ने एक कपड़े से रमन के माथे का पसीना पोंछ दिया। रमन हंस पड़ा। छोटू भी मुसकराया पर बालू के माथे पर बल पड़ गए। उसने यह सब देख लिया था। दिन में छोटू जब जब बरतन लेकर आया उसने हर बार रमन के माथे पर आया पसीना पोंछ दिया। बस, दोनों हंस पड़ते थे, कुछ बोलते नहीं थे।
   
शाम को बालू ने छोटू को बुलाया। कहा-- ‘‘लगता है अब तेरा मन काम में नहीं लगता।                                                                  
तेरी  छुट्टी 
कर दूंगा. जब देखो रमन का पसीना पोंछता है। पैसे बरतन साफ करने के देता हूं या रमन का पसीना पोंछने के? आगे भी यह सब किया तो बस तेरी नौकरी खत्म।’’
   
छोटू चुपचाप बाहर आ गया। वह सोच रहा था। मैंने क्या गलत किया।
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अगले दिन धूप तेज थी। काम चल रहा था। ग्राहक जल्दी मचा रहे थे। रमन के हाथ मशीन की तरह चल रहे थे। छोटू सिर झुकाए बरतन धोने में लगा था। उसने बीच-बीच में जब रमन का चेहरा देखा-पसीने से भीगा हुआ। धुले बरतन लेकर आया तो देखा बालू देख रहा है। छोटू ने कुछ सोचा फिर रमन के माथे से बहता पसीना पोंछ दिया। और फिर  कंधे पर पड़े झाड़न से उसके चेहरे पर हवा करने लगा।
   
रमन को अच्छा लगा, पर उसने कहा--- ‘‘जा भाग, मालिक इधर ही देख रहा है।
   
शाम हुई। बालू उठा और छोटू से कहा, ‘‘आज फिर वही हरकत। आज तो सिर्फ पसीना ही नहीं पोंछा, उसे पंखा भी झल रहा था।जा तेरी छुट्टी। मैंने दूसरा छोकरा बुला लिया है।’’
   
रमन चुप लेकिन दुखी था। उस  के कारण छोटू की नौकरी जा रही थी। अब क्या करेगा, कहां जाएगा छोटू।‘’
   
छोटू ने कहा- ‘‘ठीक है मालिक, पर मैंने जो किया दुकान के फायदे के लिए।‘’ बालू सुन रहा था.
   
   
‘’मालिक, कल मैंने कई ग्राहकों को कहते सुना था—‘अरे देखो, देखो। देासे बनाते आदमी का पसीना दोसे के घोल में टपक रहा है। ऐसे गंदे दोसे कैसे खाएंगे हम।
  
‘’फिर?’   
    ‘‘
बस, वे लोग दोसा बिना खाए चले गए। मैंने सेाचा- यह तो ठीक नहीं हुआ। अगर दूसरे ग्राहकों ने सुन लिया तो गड़बड़ हो जाएगी। इसीलिए मैंने रमन के माथे का पसीना पोंछा था।’’
   
बात बालू की समझ में आ गई। बोला--‘‘ तो पहले क्यों नहीं बताया।’’
   
छोटू धीरे से हंसा। बालू के पीछे खड़ा रमन भी मुसकराए बिना न रह सका। छोटू ने कहा-- ‘‘उस दिन जब मैं धुली हुई प्लेटें अंदर रखने आया तो मैंने देखा मक्खियां दोसे के घोल पर मंडरा रही हैं। इसीलिए जब बरतन रखने जाता हूं तो झाड़न हिलाकर मक्खियों को उड़ाता हूं और आप समझते हैं......’’
   
बालू ने जान लिया अगर ग्राहकों में गंदगी की बात फैल गई तो नुकसान हो सकता है। बोला-‘‘अच्छा!’’   छोटू और रमन ने एक दूसरे की तरफ देखा पर हंसे नहीं क्योंकि बालू की नज़र दोनों पर थी। पर  दोनों की आंखें हंस रही थीं!                           
   
बालू ने फुर्ती दिखाई। बिजली वाले को बुलाकर कहा-‘‘ तुरंत दुकान में छोटा पंखा लगाओ। हवा सीधी रमन के मुंह पर रहे, भट्टी पर न लगे!’’                                      
   
पंखा लग गया। दोसे बनाते समय अब रमन के चेहरे पर उतना पसीना नहीं आ रहा था। दुकान में पहले की तरह भीड़ थी। दोसे बन रहे थे, छोटू के हाथ बरतन धोने में जुटे थे। अब उसे रमन का पसीना पोंछने की जरूरत नहीं थी। बालू पैसे गिन रहा था। उस दिन रमन और छोटू कई बार मुसकराए थे। तरकीब काम कर गई थी। और हां, दो दिन बाद बालू ने छोटू की पगार में दस रुपए बढ़ा दिए थे। वह सोचता था—‘है तो छोटा पर दिमाग खूब चलता है इसका।‘***    ( समाप्त )
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